अपराजिता -76
“हमने अपने जीवन में आज तक कभी किसी के लिए व्रत नहीं किया, लेकिन अपनी अम्मा को बाबूजी के लिए ढेर सारे व्रत निर्जला करते देखे, और महसूस कर पाते हैं उनके मन की श्रद्धा को। कोई भी काम करने के लिए यह जरूरी नहीं कि आपने उस काम को ही करके अनुभव प्राप्त किया हो। दुनिया में ऐसे बहुत से काम होते हैं जो हम नहीं कर पाए, लेकिन क्या हम उनके बारे में नहीं जानते…।
ताजमहल सच में नहीं देखा हमने, लेकिन जानते हैं कि वो खूबसूरत है.. !
आइफ़िल टॉवर भी नहीं देखा, पर मालूम है ऊँचा है..! और प्यार.. अपने माता पिता से भी तो करते हैं हम….!”
“हम्म इसका मतलब कोई लड़की नहीं आयी अब तक.. !”
“वैसे इससे आपको कोई मतलब नहीं होना चाहिए.. हम आपको इस सवाल का जवाब देने लायक नहीं समझते !”
यज्ञ ने मुंह फेरा और कुसुम की तरफ पीठ फेर कर पूरे बिस्तर पर फ़ैल कर सो गया..
दरवाज़े से कुसुम वापस लौट आयी और सोफे पर बैठ गयी..
कुछ देर बाद यज्ञ पलटा..
“सुनो ?”
वहीँ बैठे बैठे कुसुम ने यज्ञ को देखा “हम्म !”
“हमारे पैर की तरफ जग़ह खाली है.. तुम्हे सही लगे तो यहाँ सो सकती हो.. बस इतना ध्यान रखना की हमें छू ना जाओ.. !”
“पगला गए हैं क्या ? कुसुम कुमारी के इतने भी ख़राब दिन नहीं आये अभी की किसी भी ऐरे गैर के चरणों me गिर जाए !”
“अरे गलत सुन लिया तुमने, किसी ऐरे गैरे नहीं, यज्ञ सिंह परिहार के चरणों की बात कर रहे थे हम.. पर कोई बात नहीं, ज़मीन पर सो रहो, हमें कोई दिक्कत नहीं.. ! तकिया चाहिए तो बोल देना.. दिल के दिलदार हैं हम !”
“दिल के दिलदार… हुंह… बड़े देखे ऐसे दिलदार !”
गुस्से में मुहं फेर कर कुसुम सोफे पर लेट गयी..
सोफा बहुत आरामदायक था, कुछ देर बाद वही बैठे बैठे वो धीरे से लुढ़क गयी और सोफे पर ही सो गयी..
और कुसुम को जल्दी ही नींद लग गयी..
यज्ञ ने एक बार उठ कर झांक कर देखा और जब उसे तसल्ली हो गयी कि कुसुम सो गयी है, वो भी अपने बिस्तर पर आराम से सो गया !
सुबह भावना तड़के ही जाग गई! उसकी सुबह जल्दी उठने की आदत थी! आदत से मजबूर भावना हाथ मुहं धोकर रसोई में चाय बनाने चली गई..
आंगन में उसने तुलसी का एक पौधा देखा था। चाय का पानी चढ़ाकर वह तुलसी तोड़ने के लिए बाहर निकल गई। तुलसी और अदरक डालने के बाद चाय खौला कर वह दो कप में छान कर बाहर वाले कमरे में चली आई।
लेकिन राजेंद्र अब तक नहीं उठा था। भावना ने समय देखा साढे सात बज रहे थे। आठ बज रहे थे। वह इस वक्त तक अस्पताल निकल जाया करता था।
फिर आज कैसे नहीं उठा ? उसने राजेंद्र के कमरे में दस्तक दी। लेकिन कोई आहट नहीं सुनाई दी।
दो-तीन बार दस्तक देने के बाद भी जब अंदर से कोई आवाज नहीं आई, तब भावना दरवाजा खेल कर अंदर चली आई।
दरवाजा अंदर से बंद नहीं किया गया था। इसलिए आसानी से खुल गया।
भावना ने देखा, राजेंद्र अपने बिस्तर पर कंबल ओढ़ सिकुड़ा पड़ा था। वह धीरे से उसके पास चली आई।
कंबल हटाकर उसने राजेंद्र के माथे पर हाथ रखा, उसका माथा तप रहा था, और राजेंद्र एक तरह से बेसुध सा पड़ा था।
भावना ने धीरे-धीरे राजेंद्र को आवाज देनी शुरू की, लेकिन राजेंद्र को बुखार की तापिश में कुछ सुनाई नहीं पड़ रहा था। वह वैसे ही पड़ा रह गया। भावना ने तुरंत राजेंद्र का फोन लिया और उसके दोस्त का नंबर ढूंढने लगी…
पहला ही राजेंद्र का दोस्त था..। भावना ने तुरंत उसे फ़ोन कर राजेंद्र की हालत के बारे में बता दिया…।
राजेंद्र के दोस्त ने तुरंत भावना को दवाई का नाम बता दिया। भावना इधर-उधर ढूंढने लगी। उसे एक छोटा सा सफेद रंग का डिब्बा दिखाई दिया। खोलकर देखने पर राजेंद्र के दोस्त की बताई हुई दवाई उसमें मिल गई।
भावना ने राजेंद्र को सहारा देकर उठाया और दवा उसे खिलाकर पानी पिला दिया। उसे सहारा देकर बैठाने के बाद उसके सामने चाय ले आई।
घर पर एक छोटा पैकेट बिस्किट का पड़ा था। भावना ने बिस्कुट चाय में डुबाकर राजेंद्र के मुंह में रख दी, और उससे खाने की गुजारिश करने लगी।
” खा लीजिए डॉक्टर साहब! खाली पेट में दवा असर नहीं करेगी।”
अधखुली आंखों से राजेंद्र ने भावना को देखा और बड़े कष्ट से दो-चार बिस्किट खाने के बाद दो घूंट चाय पीकर वह वापस लुढ़क गया..
भावना ने उसे वापस ठीक से चादर ओढ़ा दी, और खुद कमरे के साफ-सफाई में लग गई। उसने राजेंद्र के कमरे की खिड़की खोल दी। जिससे सूरज की रोशनी और बाहरी हवा कमरे में आ सके।
लेकिन बाहर से आई ठंडी हवा का झोंका राजेंद्र को कहीं मुआफिक ना पड़ा तो यह सोचकर भावना परेशान हो उठी।
उसे लगा कमरे में पर्दा होना चाहिए था। जिससे बाहर की रोशनी और हवा छनकर अंदर आ पाती..।
फिलहाल उसने अपने लहंगे में ओढ रखे दुपट्टे को मोड करके पर्दे की शक्ल दी और खिड़की पर बांध दिया। उसका यह उपाय कारगर साबित हुआ और तेज ठंडी हवाओं से राजेंद्र का बचाव हो गया..
कमरे को ठीक-ठाक कर भावना राजेंद्र के दोस्त का इंतजार करने लगी। राजेंद्र के दोस्त ने भावना से कहा था कि वह नहा धोकर राजेंद्र के लिए दवाइयां लेकर तुरंत आ जाएगा..
भावना उसका इंतजार कर रही थी कि दरवाजे पर दस्तक हो गई।
भावना ने जाकर दरवाजा खोल दिया , लेकिन भावना की उम्मीद से हटकर राजेंद्र का दोस्त नहीं बल्कि उसकी मां दरवाजे पर खड़ी थी…
क्रमशः
aparna..
