अपराजिता -74
भावना ने अपनी प्लेट कप रसोई मेँ ले जाकर धुल लिया और रसोई साफ कर के बाहर चली आयी..
अब तक राजेंद्र बैठा टीवी देख रहा था..
“मैं उस कमरे मेँ सो जाती हूँ !”
भावना ने उस दूसरे बैडरूम की तरफ इशारा किया..
राजेंद्र ने चुपचाप हामी भर दी। लेकिन तभी उसे ख्याल आया, उस कमरे में तो फर्नीचर के नाम पर कुछ भी नहीं था। ना कोई पलंग, तखत यहां तक की गद्दा भी नहीं था। वह पीछे मुड़कर भावना की तरफ देखने लगा,
“उस कमरे में तो गद्दा भी नहीं है, किस पर सोयेंगी.. ?”
“गद्दा तो पुरे घऱ मेँ सिर्फ एक ही है.. और वैसे भी मुझे आदत है…. मैं ऐसे ही सो रहूंगी.. !”
“नहीं नहीं.. रुको! कुछ प्रबंध करता हूँ.. !”
लेकिन प्रबंध तो तब किया जाता, जब घर में कोई समान होता। राजेंद्र ने एक गद्दा और दो जोड़ी बेडशीट के अलावा कुछ भी नहीं खरीदा था। वह चाहता था कुसुम अपनी मर्जी से अपना घर संवारे। उसने दो दोहड़ रखे थे उन्हें निकाल लिया..।
वो भावना के साथ उस कमरे मेँ गया और उन दोहड़ को वहाँ बिछा दिया..
दोनों ने मिल कर उस पर चादर बिछाई और भावना के सोने का इंतज़ाम हो गया..
भावना चुप चाप एक तरफ को खड़ी हो गयी कि राजेंद्र बाहर निकल जाये..
राजेंद्र भी बाहर निकल कर अपने बेडरूम में चला गया..
भावना अपने बिस्तर पर लेटी हुई खुली खिड़की से चाँद को निहारती रही..।
पता नहीं निनाद कहाँ होगा ? पता नहीं माँ क्या कर रही होगी ? खाना खाया होगा दोनों ने, या नहीं.. ?..
सुबह से अपने दुख से दुखी भावना ने किसी से बात भी तक नहीं की थी। उसका अपनी मां से बात करने के लिए मन मचलने लगा। लेकिन उसे ध्यान आया कि उसके पास उसका फोन नहीं था। चंद्रा भैया के गुंडो ने उसे जब घर से उठाया था तब उसका फोन घर पर ही छूट गया। शायद मां के पास ही रह गया होगा। जब दोबारा वह राजेंद्र के साथ मिलने गई, तब भी तो उसे अपना फोन लेने का होश नहीं था।
जब इतने कीमती रिश्ते हाथ से फिसल गए तो फोन की क्या औकात? उसे फोन के बारे में ध्यान ही नहीं रहा आज जब मां से बात करने का मन कर रहा था, तब उसे अपना फोन याद आया था..।
अब कल सुबह राजेंद्र से बोलकर वह फोन लेने मां के पास चली जाएगी और इसी बहाने मां के साथ थोड़ा वक्त भी गुजार लेगी…
सोचते सोचते भावना की आंखें लग गई। ऐसा ही कुछ राजेंद्र के साथ भी हुआ। उसे सुबह से तबीयत में बदलाव लग रहा था, लेकिन रात होते तक में उसका सर बहुत भारी हो गया। उसे बिस्तर पर लेटे-लेटे नींद नहीं आ रही थी। करवटें बदलते हुए वह कुसुम के बारे में ही सोच रहा था। कुसुम के ससुराल में यह उसकी दूसरी रात थी।
पता नही, शायद आज इसकी सुहागरात हो? वह अपने पति के साथ होगी। लेकिन जितना वो कुसुम को जानता था, कुसुम ने जरूर अपने पति को राजेंद्र के बारे में सब कुछ बता दिया होगा।
या शायद नहीं भी बताया हो। पता नहीं वह बावली लड़की क्या कर रही होगी? लेकिन अब उसे समझौता कर लेना चाहिए। और अपने पति के साथ कदम से कदम मिलाते हुए अपनी जिंदगी में आगे बढ़ जाना चाहिए।
सोचते सोचते राजेंद्र की भी आंख लग गई, लेकिन उसकी तबीयत सही नहीं थी। इसलिए रात में बार-बार चौक कर उसकी नींद खुल जा रही थी। आधी रात के वक्त उसे जोर से ठंड लगने लगी और उसने ब्लैंकेट से खुद को पूरी तरह से ढक लिया फिर भी कांपते कांपते रात कटी..
****
अस्पताल से लौटने के बाद ढेर सारी रस्में निपटाते हुए कुसुम थकने लगी थी।
शारीरिक थकान से ज्यादा उस पर मानसिक थकान हावी थी। उसे इस नये घर में कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। जितना बड़ा घर था, उतने ही सारे लोग भरे थे। कोई किसी तरफ से पुकारता, कोई किसी तरफ से आवाज लगता।
उसे ठीक से बैठने भी नहीं मिल रहा था। उसका आधे से ज्यादा चेहरा घूंघट से ढक कर रखा गया था, जैसे पता नहीं उसे देखकर लोगों को कौन सी छूत की बीमारी हो जाएगी।
अपने आप को हर तरफ से ढके छुपे रखने की जिम्मेदारी उस पर ससुराल पहुंचते ही लाद दी गई थी। उसकी मां ने पहले ही उसे ढेर सारी समझाइशे दे रखी थी।
कम बोलना, धीमे बोलना, जोर से हंसना मत। इन बातों को याद करके वह खुद में परिवर्तन लाने वाली लड़की नहीं थी। आज अगर उसकी मनपसंद शादी हुई होती तो, वह इनमें से कोई भी बात नहीं मानती। बल्कि बातों का मजाक बनाती घूमती। लेकिन इस घर में उसका न जोर से बोलने का मन था, ना खिलखिला कर हंसने का..।
क्योंकि वह दुखी थी।
लेकिन एक बात उसे समझ में नहीं आ रही थी कि उसके इतने सारे दुख और शोक के बावजूद उसे भूख क्यों लग रही थी? दोपहर होते-होते उसे वापस भूख लगने लगी थी..।
लेकिन आसपास ढेर सारी औरतों से घिरकर बैठी कुसुम के पास एक चेहरा भी ऐसा नहीं था, जिससे वह खुलकर यह कह सके कि उसे भूख लग रही है।
उसने अपने घूंघट की ओट से इधर-उधर देखा, दूर कहीं उसे यज्ञ नजर आ गया।
वह उस तरफ से गुजर रहा था। इत्तेफाक से गुजरते हुए यज्ञ की नजर कुसुम पर पड़ गई, और उसने यूं ही इशारे से कुसुम से पूछ लिया कि क्या हुआ? पता नहीं कुसुम भी किस झोंक में उसे इशारे से अपना पेट दिखा गई। यज्ञ वहां से चुपचाप चला गया..
“बद्तमीज़.. जब मदद करनी नहीं थी तो पूछने की क्या ज़रूरत थी..?”
वह होंठो ही होठों में बुदबुदा उठी और उसके ठीक बगल में बैठी महा बुज़ुर्ग उसकी बुआ दादी ने पूछ लिया..
“कुछ कहा बहुरिया.. हमको ज़रा सुनाई कम देता है !”
“आप ना सुन सके इसीलिए हम धीमा बोल रहे हैं.. !”
धीमी सी एक फुलझड़ी और कुसुम छोड़ गयी और बुआ जी” हैं ,हैं का बोली?” करती रह गयी..
उसी समय नाचती डोलती सिम्मी वहाँ चली आयी और कुसुम को अपने साथ उठा लिया..
” चलिए भाभी अब कमरे में थोड़ा आराम कर लीजिए, आज शाम को आपकी रिसेप्शन है ना..!”
एक ठंडी सी आह भर कर कुसुम अपनी जगह पर खड़ी हो गई।
उसके दोनों पैर सुन्न हो गए थे। इतनी देर तक एक ही जगह पर बैठने का उसे कभी अभ्यास नहीं था। अपने घर पर इधर से उधर उड़ती फिरती कुसुम जैसे सोने के पिंजरे में कैद होकर रह गई थी।
सिम्मी को देखकर ही उसे थोड़ी राहत मिलने लगी थी। लेकिन सिम्मी का बङबोलापन उसे अंदर तक त्रस्त कर जाता था।
कहीं कमरे में पहुंचने के बाद यह लड़की बैठ गई, तो फिर अपना कॉलेज पुराण शुरू कर देगी। लेकिन फिर भी इन कई जोड़ा अबोली, घूरती आंखों से बचने के लिए सिम्मी ही बेहतर ऑप्शन थी।
कुसुम सिम्मी के साथ अपने कमरे की तरफ चली गई। कमरे का दरवाजा खोलकर वह दोनों अंदर चली आई। कमरा साफ सुथरा कर दिया गया था। एक रात पहले की टूटी फूटी फूलों की लड़ियां हटा दी गई थी। बिस्तर भी साफ सुथरा सजा संवरा नजर आ रहा था। कमरे में पहुंचते ही कुसुम को अलग सा सुकून मिलने लगा। लेकिन दूसरे ही पल उसे लगा, यह कमरा उसका नहीं, यज्ञ का है।
यहां उसे राहत महसूस होनी नहीं चाहिए। लेकिन राहत मिल तो रही ही थी।
वह पहुंचते ही पलंग पर ढेर हो गई। और उसे ऐसे बिस्तर पर गिरते देख सिम्मी मुंह छुपा कर हंसने लगी..
” लगता है रात भर भैया जी ने आपको सोने नहीं दिया, इसीलिए कुछ ज्यादा ही थकी हैं..!”
अपनी उम्र से ज्यादा बड़ा जोक मारती सिम्मी पर कुसुम को इतनी जोर से गुस्सा आया कि लगा एक तमाचा धर दे।
लेकिन अपने आप पर उसने काबू कर लिया और पलंग पर करवट लेकर लेट कर सिम्मी की तरफ देखने लगी..
” क्या बताऊं नंद रानी, आपके भैया कितने बड़े जालिम है। शेर भी उनके सामने दुम दबाकर भागता होगा…। आप सच कह रही है, रात भर सोने नहीं दिया। कभी इधर कभी उधर। उफ क्या बताऊं?
आप छोटी है ना, और अभी आपकी शादी भी नहीं हुई। यह सब बातें आपसे बताना अच्छा नहीं लगता..।
लेकिन रात भर हमारी हालत बहुत खराब रही, और इस वक्त बदन ऐसा टूट रहा है कि लग रहा है आराम से खा पीकर सो जाएं। क्योंकि आज की भी तो रात आएगी ना..।”
सिम्मी को पहले तो कुसुम की बातों में मजा आ रहा था, लेकिन उसी समय बाथरूम का दरवाजा खोलकर यज्ञ बाहर निकल आया। पलंग पर अधलेटी पड़ी कुसुम के ठीक पीछे यज्ञ खड़ा उसकी सारी बातें सुन रहा था।
और सिम्मी सामने खड़े यज्ञ को देख घबरा गयी..।
सिम्मी नई उम्र की कॉलेज जाने वाली लड़की थी, उसे फालतू की बातें करना बेहद पसंद था, लेकिन यज्ञ और अखंड से वह जरा डरती और सकुचाती थी, इसलिए यज्ञ को देखकर वह ज़रा घबरा गयी..।
यज्ञ कुसुम के मुहं से ये सब सुन कर आश्चर्यचकित रह गया…
लेकिन दूसरे ही पल वो समझ गया कि ये सब कुसुम सिम्मी से पीछा छुड़ाने बोल रही है..।
वो धीरे से आगे बढ़ गया और सिम्मी के पास आकर खड़ा हो गया..
“ये सब क्या बोल रही हो..? अच्छा लगता है क्या, हमारे बैडरूम सीक्रेट्स सब को बताना.. !”
यज्ञ को सामने देख वो उचक कर सीधा बैठ गयी..।
और अपनी कही बात सोच कर बुरी तरीके से झेंप गयी..
और उसे इस कदर झेंपते देख यज्ञ के चेहरे पर मुस्कान चली आयी..
उन दोनों मिया बीवी को यूं खुद मेँ खोया देख सिम्मी भी झेंप कर वहाँ से वापस निकल गयी..
सिम्मी के बाहर निकलते ही यज्ञ को मस्ती सूझने लगी..
“क्या बात है..? हमें नहीं पता था, हमारा जादू इतनी जल्दी चल जायेगा आप पर !”
यज्ञ को अपनी तरफ शैतानी से मुस्कुराते हुए बढ़ते देख कुसुम छिटक कर खड़ी हो गयी..
“दूर रहिये हम से… आप जानते नहीं हम क्या है ?”..
“जानते हैं… एक नंबर की बददिमाग बद्तमीज़ बिगड़ैल सनकी और घमंडी लड़की हो.. !”
“जब इतना ही जानते थे तो, शादी क्यों की ?”
“क्यूंकि आपके घऱ वालो ने ये सब बताया नहीं था ना.. पहले तो कहा हमारी कुसुम गाय है.. पर वो लोग ये बताना भूल गए की इस गाय के सींग भी है.. !”
“हम्म… आपका क्या है.. मर्द है ना.. हम औरतें तो वाकई गाय होती है। जिस खूंटे से घऱ वाले बांध दें, उसी मे जीवन भर बंधी रह जाती है..।”
“तुम फिर भी खूंटे के आसपास चल फिर तो पाती हो, हम मर्द तो वो खूंटा है, जो शादी के बाद जिस एक जग़ह स्थिर हुआ तो, फिर कहीं नहीं हिलडुल पाता..।”
कुसुम पर बिजली गिरा कर यज्ञ बाहर निकल गया.. और उसके जाने के कुछ देर बाद सिम्मी खाने की थाली लिए चली आयी..
खाने की थाली देख कुसुम की भूख जाग गयी..
“भैया भिजवाए हैं, खा लीजिये भाभी !”
“अच्छा तो नीचे से उसे ऊपर भेजने के लिए सिम्मी को इस सनकी ने ही भेजा था.. हुंह… बड़ा आया ! एहसान करने और जताने का कोई मौका नहीं छोड़ सकता.. ! मन ही मन सोचती कुसुम पहला निवाला तोड़ने को थी कि तभी उसके दिमाग मे सुजाता और चंद्रा चले आये..।
उसने सुजाता को वीडियो कॉल लगा लिया.. सुजाता ने घऱ मे सबको उसे दिखाया और बताया की बाबूजी का खाना वो भेज चुकी है, और खुद भी खाने बैठी है..
उनसे बात कर कुसुम को ठीक लगा और वो खुद भी खाने लगी..।
सिम्मी वहीँ बैठी थी कि कुसुम को किसी चीज़ की ज़रूरत लगे तो ला सके, लेकिन कुसुम ने और कुछ नहीं लिया..।
खा कर वो थोड़ा आराम करना चाहती थी..।
कुछ देर में घर की काम वाली आकर उसकी थाली लेकर चली गयी..।
“आज शाम में आपकी शादी की पार्टी होनी है… आप क्या पहनेंगी भाभी ?”
कुसुम ने सोचा ही नहीं था कि उसे शाम को क्या पहनना है..?
वो अभी सोच रही थी कि सिम्मी की भाभी और यज्ञ की काकी ऊपर चली आयी..।
उन्हेँ देख कुसुम खड़ी हो गयी..
“बैठी रहो बहु.. तुमसे बस ये पूछने आये थे कि आज शाम तुम्हारी शादी की पार्टी होनी थी, अब तुम्हारे बड़े भाई के साथ इत्ती बड़ी दुर्घटना घट गयी है तो, घऱ के बड़े बुज़ुर्ग सोच में पड़ गए की पार्टी करें की नहीं..?तुम्हारे जेठ यानी अखंड ने पार्टी ना करने की सलाह दी है.. लेकिन बहुरिया तैयारी पूरी हो चुकी है..।
सुबह से महाराज लगे खाने की तैयारी कर रहे..।
गांव भर का न्योता है, एक एक घऱ जाकर मना करना तो बड़ा मुश्किल हो जायेगा ना। लोग आएंगे तो सब को क्या बताएँगे..?
बस इसीलिए कुछ लोगो ने अखंड को समझाना चाहा की पार्टी कर लेते हैं… तुम्हारी सासु माँ ने भी खूब समझाया लेकिन तुम्हारा जेठ ना आधे दिमाग का आदमी है..
काकी अभी अपनी बात पूरी कर पाती कि कुसुम ने उन्हेँ टोक दिया..
“काकी साहेब, आप लोग पार्टी कर लीजिये, भैया ठीक हैं अभी…।
इसलिए इतने सारे लोगों को निराश कर वापस भेजने का कोई औचित्य नहीं..। हमे आज की पार्टी से कोई दिक्कत नहीं..।”
कमरे के बाहर खड़ा यज्ञ भी ये बातें सुन रहा था, उसे लगा था कुसुम कोई बद्तमीज़ी भरा उल्टा जवाब देगी लेकिन वैसा नहीं हुआ..
और उसकी उम्मीद के विरुद्ध कुसुम ने पार्टी रद्द करने से मना कर दिया..
कायदे से देखा जाये तो कुसुम ने उसके घऱ परिवार की इज्जत रख ली थी ऐसा कर के..।
हालाँकि ठाकुरों के घर परिवार में किसी औरत से किसी बात की इजाजत लेने की कोई परंपरा नहीं थी। वह भी नई बहू से किसी बात की इजाजत लेना, तो ठाकुरों के नियमों के खिलाफ था। लेकिन अब इस परिवार में एक ऐसा ठाकुर भी आ चुका था, जो संवेदनाओं और भावुकताओं से भरा हुआ था।
अखंड की बात टालना, घर परिवार के लिए कठिन था। बस इसीलिए नई बहू से पूछने का यह सारा ड्रामा करना पड़ा था। वरना तो ना ही बड़े ठाकुर साहब को कोई फर्क पड़ता था, और ना अखंड की मां को।
लेकिन इन सब के बावजूद कुसुम ने इजाजत देकर यज्ञ के दिल दिमाग से एक बोझ कम कर दिया था। वह अपने भाई के खिलाफ भी नहीं जा सकता था, और अपने माता-पिता के खिलाफ भी नहीं।
मुस्कुरा कर वह वहां से बाहर चला गया।
कुसुम को आखिर आराम करने नहीं मिला। बातों बातों में शाम होने लगी थी, और उसके तैयार होने का फरमान आ गया था।
उसने अपना पिटारा खोला और पहनने के लिए साड़ियां देखने लगी। साड़ी पहनना भी उसे कहां आता था? पिटारे में से वह अपनी पसंद की साड़ी ढूंढने में समय व्यर्थ नहीं करना चाहती थी। उसका तो कायदे से इस सब में मन ही नहीं लग रहा था।
सबसे ऊपर रखी रानी गुलाबी साड़ी को ही उसने बाहर निकाल लिया। साड़ी कैसे पहनूं, वह इसी संकोच मे खड़ी थी।
सुबह भी सिम्मी की भाभी ने उसे साड़ी पहना दी थी। और उस समय उसे कहा भी था कि साड़ी पहनना सीख लो। अब खुद से बांधनी होगी।
लेकिन कुसुम का मन किसी काम में लगे, तब तो वह कुछ सीखती…।
उसने आड़ा टेढ़ा साड़ी को खुद पे लपेटने की कोशिश की और नाकाम होकर थक कर पलंग पर बैठ गयी..।
और एक बार फिर सिम्मी अपने हाथ में लहंगे का जोड़ा लिए अंदर दाखिल हो गयी…
“भाभी ये पहनना है आपको.. ?
गहरे मरून रंग के उस सुन्दर जामदानी लहंगे को देख कुसुम के चेहरे पर राहत के भाव चले आये.. कम से कम साड़ी लपेटने की झंझट से छुटकारा तो मिला..
“हाँ हम ये पहन लेते हैं… सिम्मी तुम ज़रा बाहर जाओगी.. हम कपड़े बदल कर तुम्हे बुला लेंगे..।”
सिम्मी ने हाँ कहाँ और दरवाज़े के बाहर निकल गयी..
कपडे बदल कर तैयार होने कुसुम आइने के सामने बेमन से बैठ गयी..। और वो कुछ करती उसके पहले सिम्मी अपनी भाभी के साथ दन्न से वापस धमक पड़ी..
“लाइए भाभी हम आपको सजा दें… ?”
कुसुम ने जैसे खुद को किस्मत के भरोसे छोड़ दिया था, इस वक्त अपना चेहरा सिम्मी के भरोसे छोड़ दिया, और चुप बैठ गयी..
सिम्मी ने अपनी सारी सौंदर्य कला ज्ञान का इस्तेमाल करते हुए कुसुम के चेहरे का रंगरोगन शुरू कर दिया..। उसकी भाभी भी बराबर उसका साथ दे रही थी..।
सिम्मी ने ब्यूटी पार्लर का कोई दस दिन का क्रेश कोर्स सरीखा कुछ कर रखा था…और उसकी भाभी तरह तरह के हेयर स्टाइल बनाने में उस्ताद थीं..
खूब लीप पोत कर भी दोनों को शांति नहीं मिल रही थी.. लग रहा था कुछ तो कम है, कहीं पर थोड़ा और काम बाकी है..।
आंखे बंद कर बैठी कुसुम ने खुद को शांत छोड़ दिया था…।
मन ही मन अपने साथ बीता सोचती बैठी कुसुम का ध्यान ही नहीं था कि उसके चेहरे पर क्या कलाकारी हो रहा है..
सिम्मी और उसकी भाभी को जब अपना परिश्रम सार्थक लगा तब उन्होने कुसुम का चेहरा छोड़ दिया..।
उसका लहंगा दुपट्टा सेट करने के बाद उन्होंने उसे आंखे खोलने बोला..।
इतनी देर में सिम्मी भाग कर यज्ञ को भी बुला लायी थी..
आइने के सामने खड़ी कुसुम ने खुद को देखा और पहली बार में पहचान ही नहीं पायी..
ठीक उसके पीछे खड़ा यज्ञ भी मुहं बाये उसे देख रहा था,
जैसे आज पहली बार अपनी दुल्हन को देख रहा हो..।
कुसुम की नजर यज्ञ पर पड़ी और उसकी त्योरियां चढ़ गयी..
उन दोनों को अकेला छोड़ कर सिम्मी और इसकी भाभी भी तैयार होने चली गयी थी…।
कुसुम की आँखों में झांकते हुए यज्ञ कुछ पल के लिए सब कुछ भूल कर रह गया था।
कुसुम वाकई खूबसूरत लग रही थी !!
कुसुम ने घूर कर उसे देखा और उसके पास आकर उसकी आंखों में देखने लगी..।
” हमें ऐसे घूर-घूर कर देखने की जरूरत नहीं है आपको..!”
” इस गुमान में मत रहना की यज्ञ सिंह परिहार किसी लड़की पर इस कदर मोहित हो सकता है, कि उसे घूर कर देखने लगे…।
तुम्हारी आँखों का मेकअप कुछ अजीब ही लग रहा था..इतना मेकअप पसंद नहीं हमें !”
यज्ञ ने जानबूझकर अपनी कैफियत कुसुम कुमारी पर थोप दी।
हालांकि उसकी नजर वाकई कुसुम के चेहरे से हट नहीं रही थी, लेकिन उसने क्योंकि कुसुम के ज्यादा मेकअप की बुराई की थी, इसलिए कुसुम चिढ़कर आईने के सामने खड़ी अपनी जुल्फों को और भी संवारने लगी..
” हमें तो बहुत पसंद है खूब सारा मेकअप पोतना।
और हमें इस बात की परवाह भी नहीं कि आपको क्या पसंद है..?”
यज्ञ हँस कर अपनी अलमारी की तरफ अपने कपड़े निकालने बढ़ गया..।
उसकी गाते गुनगुनाते रहने की आदत थी!
कुसुम को छेड़ने के लिए वह कुछ गुनगुनाने लगा और कुसुम मुंह फुला कर सिम्मी का इंतजार करती बैठी रही..
” रूठ न जाना तुमसे कहूं तो
मैं इन आंखों में जो रहूं तो….
तुम ये जानो या ना जानो
तुम यह मानो या ना मानो
मेरे जैसा दीवाना तुम पाओगी नहीं ….
याद करोगी मैं जो ना हूँ तो
रूठ न जाना तुमसे कहूं तो……
क्रमशः
aparna….
