अपराजिता -71
भावना की माँ ने नहाने के बाद भगवान के सामने दिया जलाया और हाथ जोड़ कर खड़ी हो गयी.. पल भर आंख बंद कर प्रार्थना करने के बाद वो अपना बैग कंधे पर लटकाये घऱ से निकल गयी..
पैदल ही वो पुलिस स्टेशन के लिए निकल गयी..
उन्ही के गांव में होने के बाद भी उन्हेँ पुलिस स्टेशन का अता पता मालूम न था, लोगो से पूछ ताछ कर वो पहुँच गयी..
स्टेशन पर अनिर्वान मौजूद था..
भावना की माँ को आया देख वो उन्हेँ पहचान गया..
“जी कहिये.. यहाँ कैसे आना हुआ ?”
“चंद्रभान के खिलाफ रपट लिखवानी है थानेदार साहब !”
“कहिये.. क्या लिखवाना चाहती हैं ?”
“यही की उसने हमारी बेटी की ज़बरदस्ती शादी करवाई है !”.
“लेकिन माताजी रजिस्ट्रार के ऑफिस में महीना भर पहले शादी के लिए अर्ज़ी दी जाती है, उसमे आपकी बेटी का नाम दर्ज़ है..
वहाँ डॉक्टर राजेंद्र और कुमारी भावना का नाम लिखा था उनके आधार कार्ड के नंबर के साथ..।
देखिये माता जी सरकारी काम में ज़बरदस्ती नहीं चलती.. क्या आपका कहना है कि एक महीने पहले ही उस दबंग बाहुबली नेता ने आपकी बेटी से उसका आधारकार्ड छीन कर उसका नंबर और नाम डॉक्टर राजेंद्र के साथ लिखवा दिया था..।
और अगर उसने महीना भर पहले ये काम किया था तो, आप ने उसी समय आकर यहाँ शिकायत दर्ज़ क्यों नहीं करवाई.. अगर आपको या आपकी बेटी को आपत्ति थी तो, आपको उसी समय यहाँ आकर कहना चाहिए था न..
देखिये, रजिस्ट्रार ऑफिस में हुई शादी के सारे कागज़ पत्तर देख कर आया हूँ.. मुझे भी इस नेता की कहानी सरना ने सुनाई है। और मैं खुद मौका देख रहा कि कब इसका गला मेरे हाथ में हो, लेकिन इस वक्त उसने बड़ी शातिर चाल चली है…
कोई पेंच ही ऐसा नहीं छोड़ा है कै हम उसे फांस सके ?
अपनी बहन की उसने ज़बरदस्ती शादी की, इसका भी कोई प्रमाण हमारे पास नहीं है.. !”
“आप एक बार कुसुम से बात कीजिये न… वो लड़की अब सच बोल देगी.. हम जानते हैं उसे.. !”
“ठीक है कर लेंगे.. आपके लिए इतना भी कर लेंगे..!”
अनिर्वान उसे ढांढस बांधता बैठा था कि थाने का फ़ोन बजने लगा..
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फ़ोन किसी हवलदार ने उठाया और बात करने के बाद तुरंत अनिर्वान की तरफ लपका…
“हुज़ूर चंद्रा का एक्सीडेंट हो गया है, सरकारी अस्पताल ले गए हैं.. ज़बरदस्त खून बह गया है..।
आत्महत्या की कोशिश है, या किसी ने जानबूझ कर धक्का दिया है, मालूम नहीं।
इसलिए अस्पताल से फ़ोन आया था..
“अरे.. ये कब हुआ ?”
“अभी.. आज ही सुबह !”
अनिर्वान तेज़ी से खड़ा हुआ, भावना की माँ के आगे हाथ जोड़ कर बाहर निकल गया..
भावना की माँ विस्मय से बैठी रह गयी..
“ये कैसा अनर्थ हो गया.. उसने चंद्रा का इतना बुरा तो नहीं चाहा था.. !”
अपना बैग संभाले वो भी थाने से बाहर की तरफ लपकी..
तेज़ी से चलती वो अनिर्वान की सरकारी जीप के बगल से होकर आगे बढ़ने लगी, उन्हे तेज़ी से जाते देख अनिर्वान ने उन्हेँ आवाज़ लगा दी..
“किस तरफ जा रहीं हैं… आइये बैठिये,आपको आपके घर उतार देंगे !”
“नहीं बेटा.. अभी तो अस्पताल ही जाना है… भले ही बद्दुआ बहुत दी है उसे, लेकिन ऐसे उसे मरता भी तो नहीं देख सकती… हमें अस्पताल जाना है.. !”
अनिर्वान ने उन्हेँ जीप में पीछे बैठने का इशारा किया और उनके बैठते ही गाड़ी आगे बढ़ा दी…
*****
रेशम बाहर फॉर्म हाथ में लिए चली आयी.. वह दूर्वागंज से चंद्रा की जीप में चंद्रा और सुजाता के साथ ही यहां तक आई थी, और इसलिए उसके बाहर आते ही सुजाता हड़बड़ा कर उसकी तरफ देखने लगी।
सुजाता भाग कर रेशम के पास पहुंच गई।
” अब कैसी हालत है इनकी?”
रेशम ने सुजाता की तरफ देखा, लेकिन रेशम के चेहरे पर कोई भाव नहीं आए।
” अभी तो ट्रीटमेंट शुरू भी नहीं हुआ, अभी मैं कैसे कुछ बता सकती हूं ?”
रेशम की यह बात सुनकर चंद्रा के पिता जोर से चिल्ला उठे।
” आप लोग इतनी देर से कर क्या रहे हैं? अभी आपके वह सीनियर आ के बोल गए हैं कि अपने मरीज को यहां से किसी बड़े अस्पताल में ले जाइए। हम लोग इस तैयारी में है, तो अब आप लोग जल्दी से चंद्रा को बाहर हमे दे दीजिए..।”
रेशम ने चंद्रा के पिता की तरफ देखा और वापस सुजाता की तरफ देखने लगी।
ऐसा लगा जैसे रेशम हर एक को अपनी बात समझाना चाहती है, लेकिन उसे यह समझ में आ गया था कि चंद्रा के पिता उसकी बात आसानी से मानने वाले नहीं है। लेकिन हो सकता है सुजाता उसकी बात समझ जाए।
” देखिए अभी मरीज की हालत इतनी स्टेबल नहीं है कि यहां से दूसरे अस्पताल ले जाया जा सके। मेरे सीनियर सर ने आपसे ऐसा कहा जरूर है, लेकिन इस वक्त डॉक्टर राजेंद्र रघुवंशी उन्हें देख रहे हैं। वह बहुत काबिल डॉक्टर है, और उनके साथ ही उनके दोस्त भी यहां आने वाले हैं। और उन दोनों के रहते आप लोग निश्चित हो सकते हैं..।”
” कैसे आपकी बात मान ले? आपके यहाँ के दो अलग-अलग डॉक्टर अलग-अलग बातें बोल रहे हैं। अभी कुछ देर पहले डॉक्टर जोशी, हम लोगों से कह कर गए हैं कि अपने मरीज को ले जाइए। उन्होंने तो कह दिया है कि उसकी अंतिम…”
कहते कहते चंद्रा के पिता रुक गए। उनका गला भर आया, लेकिन तब तक में कुसुम और यज्ञ भी वहां पहुंच गए थे..
कुसुम की मां की नजर कुसुम पर पड़ी और वह एकदम से उससे जाकर लिपट गई। उसे आया देख उसके पिता के चेहरे पर भी अलग से भाव आ गए।
यज्ञ कुसुम को छोड़कर रेशम की तरफ बढ़ गया।
” जी डॉक्टर, क्या बता रही थी आप? कैसी है अभी भाई साहब की तबीयत?”
रेशम ने अपने हाथ में पकड़ रखा कंसेंट फॉर्म यज्ञ और सुजाता की तरफ बढ़ा दिया।
” देखिए मैं आप लोगों को किसी मुगालते में नहीं रखना चाहती। उनकी हालत वाक्य ठीक नहीं है। तीसरी मंजिल से गिरने के कारण कुछ इंटरनल फ्रैक्चर भी हैं, और बात यह है कि ब्लीडिंग रोकना मुश्किल हो रहा है। ऐसा लग रहा है कुछ इंटरनल इंजरी हुई है,यानी कि शरीर के अंदर कहीं चोट लगी है। जिसके कारण ब्लीडिंग रोकने में हम लोगों को मुश्किल आ रही है, तो बस इसीलिए उनका ऑपरेशन करना पड़ेगा।
अगर आप लोग यह कंसेंट फॉर्म पर साइन कर देते हैं, तो हम तुरंत अपना काम शुरू कर देंगे…
” वैसे आप कुछ प्रोबेबिलिटी बता सकती हैं कि..
यज्ञ ने अपना सवाल किया और रेशम ने ना में गर्दन हिला दी..
” यह भी संभव है कि ऑपरेशन के बाद आपका मरीज बिल्कुल ठीक हो जाए। लेकिन यह भी संभावना है कि वह हमेशा के लिए पैरालाइज हो जाएं और बेड से ना उठ पाए।
अभी फिलहाल सिर्फ यही कहूंगी कि इन सारी बातों को सोचने की जगह आप सब भगवान से प्रार्थना कीजिए कि उनका ऑपरेशन सफल हो और हम लोगों को भी हमारा काम करने दीजिए।
अगर आप लोग अपनी सहमति दे देंगे तभी हम अपना काम शुरू कर सकते हैं।
इस वक्त मरीज के ऑपरेशन में जितनी देरी होगी, उतना ही उनके लिए रिस्क बढ़ता जाएगा..
इसी सारी बातचीत के बीच एक लंबा ऊंचा सा डॉक्टर तेज तेज कदमों से चलता हुआ आया और उस भीड़ के बीच से निकलकर आगे बढ़ने लगा।
आगे बढ़ते हुए रेशम को देखकर वह ठहर गया और रेशम की तरफ बढ़ गया..
” एक्सक्यूज मी, डॉ राजेंद्र रघुवंशी कहां मिलेंगे.. ?”
रेशम के सफेद चोगे और गले में लटके स्टैथो को देखकर वो समझ गया था कि ये यहाँ की डॉक्टर हैं..
” जी डॉ राजेंद्र ओआर में है सर। आप….?”
रेशम ने उससे उसका परिचय जानना चाहा और उस आगंतुक ने उसकी तरफ देखकर अपना नाम बता दिया..
” मैं डॉक्टर मृत्युंजय । मैंने और राजेंद्र ने साथ में ही एमबीबीएस कंप्लीट किया था..।”
” नाइस मीटिंग यू सर, मैं डॉक्टर रेशम.. !”
जय ने अभिवादन में गर्दन झुकाई और रेशम की दिखाई ओटी की तरफ बढ़ गया…
लेकिन जय और रेशम की इस बातचीत में डॉक्टर राजेंद्र रघुवंशी का नाम वही अपने माता-पिता के पास खड़ी कुसुम के कान में पड़ गया।
कुसुम तड़प कर रह गई।
उसने वहां खड़ी उस डॉक्टरनी की तरफ देखा और सोचने लगी, मुझसे ज्यादा किस्मत वाली तो यह डॉक्टरनी है, जो डॉक्टर साहब के साथ ऑपरेशन में जाने वाली है।
कुछ सोचते हुए उसकी नजर वहीं खड़े यज्ञ पर पड़ी लेकिन इस वक्त यज्ञ कुसुम को नहीं सामने खड़ी उस डॉक्टरनी की बातों को बड़े ध्यान से सुन रहा था..।
सुजाता ने वैसे तो आज तक कोई काम अपनी मर्जी से नहीं किया था। ससुराल आने के बाद, वह भी अपने ससुराल की परिपाटी निभाने को मजबूर थी। उसके ससुराल में रसोई के अंदर के सारे निर्णय उसकी सास लेती थी, और रसोई के बाहर के सारे निर्णय उसका पति, और उसका ससुर।
लेकिन आज जाने क्यों उसे सामने खड़ी इस नाजुक सी डॉक्टरनी की बात पर विश्वास करने को मन कर रहा था।
उसे लगा सामने खड़ी रेशम का हाथ पकड़ कर वह उसे मंजूरी दे दे और कह दे, जाओ कर लो ऑपरेशन क्योंकि मैं भी समझ रही हूं, एक-एक पल की देर उनकी जिंदगी पर भारी पड़ सकती है।
आज सुजाता में जाने कहां से इतनी हिम्मत आ गई थी। शायद अपने पति को मृत्यु शैया पर पड़े देखकर, उसके अंदर की स्त्री, अपने सौभाग्य को बचाए रखने के लिए जाग गई थी।
और इसीलिए आज उसने ना अपनी सास से पूछा और ना ससुर से। खुद ही आगे बढ़कर रेशम के हाथ से कंसेंट फॉर्म लिया, एक बार यज्ञ की तरफ देखा और यज्ञ के पलक झपक कर हामी भरते ही उसने कंसेंट फॉर्म पर अपने दस्तखत कर दिए।
आज सुजाता के अंदर वही हिम्मत आ गई थी जो, शायद माता पार्वती के अंदर उस वक्त आई थी जब उन्होंने निर्जला रहकर शिव के गले के गरल को उनकी देह में व्याप्त होने नहीं दिया था और अपनी कड़ी तपस्या और व्रत से उस गरल के प्रभाव को निष्क्रिय कर दिया था।
आज सुजाता भी अपने जीवन में आए इस कठिनतम क्षण को धकेलने के लिए की जान से जुटी थी। वह जानती थी कि इस वक्त उसके पति का भला अगर कोई कर सकता है तो, इन डॉक्टरों की टीम ही है। उसने रेशम के हाथ में कागज दिए और उसके सामने हाथ जोड़ दिए।
” आप से विनती करते हैं, कैसे भी करके कुछ भी करके इन्हें बचा लीजिए।”
रेशम ने सामने जुड़े सुजाता के हाथों को अपने हाथों में लिया और आंखों से उसे दिलासा देती हुई वापस मुड़कर तेजी से ऑपरेशन थिएटर की तरफ बढ़ गई। रेशम मुड़कर गलियारे में आगे बढ़ी और उसी वक्त अखंड तेज कदमों से वहां चलता हुआ चला आया..
अखंड वहां पहुंचा तब तक रेशम ऑपरेशन थिएटर के अंदर दाखिल हो चुकी थी। अखंड को बस एक झलक सी मिली, वह भी पीछे से।
लेकिन पता नहीं क्यों रेशम के वहां से जाने के बाद भी उस वातावरण में कुछ तो ऐसा था जो अखंड को बहुत अपना सा लगा।
लेकिन उसने अपने मन के उन ख्यालों को झटक दिया। दिल ही दिल में उसके एक विचार कौंध गया।
दिल को पसंद भी आई तो डॉक्टरनी, इसीलिए तो अस्पताल की खुशबू भी अपनी सी लगती है।
मन ही मन सोचता अखंड आगे बढ़कर कुसुम के पिता के पास पहुंच गया। अखंड के आते ही कुसुम जरा सिमट कर एक तरफ हो गई। चंद्रा के बारे में पूछताछ कर अखंड वापस यज्ञ के पास चला आया..
ऑपरेशन रूम में मृत्युंजय के पहुंचते ही राजेंद्र ने उसे चंद्रभान की सारी रिपोर्ट दिखाई, और दोनों दोस्तों ने मिलकर आगे कैसे क्या करना है, इसका निर्णय लेकर ऑपरेशन शुरू कर दिया…।
रेशम उन लोगों की मदद करती जा रही थी..
राजेंद्र और जय के इस तरह जूझ के ऑपरेशन करने से वहां मौजूद स्टाफ भी खुश था। पहली बार उनके सरकारी अस्पताल में ऐसा कुछ देखने को मिल रहा था। इसलिए वहां मौजूद नर्स भी जय और राजेंद्र के निर्देशों का त्वरित गति से पालन कर रही थी..
बाहर मौजूद सारे लोग अब ऑपरेशन थिएटर के बाहर जल्ती लाल बत्ती के बंद होने का इंतजार कर रहे थे…
चंद्रभान के दो तीन गुर्गों को छोड़कर वहां अब सिर्फ घर के लोग ही मौजूद थे। चंद्रा के आदमी अस्पताल के बाहर बगीचे में बैठे इंतजार कर रहे थे…।
कुसुम यज्ञ और अखंड को वहां आए लगभग दो घंटे बीत चुके थे, लेकिन अब भी ऑपरेशन वैसे का वैसा चल रहा था। कुसुम अपनी मां की बगल में बैठी थी। उसके पिता यहां से वहां टहल रहे थे।
पता नहीं क्यों उन्हें इन नई उम्र के लड़के लड़कियों पर भरोसा ही नहीं था। दिखने में इतने छोटे दिखने वाले यह बच्चे सरीखे डॉक्टर क्या सच में इतना बड़ा ऑपरेशन कर सकते थे? उन्हें इस बात पर विश्वास ही नहीं हो रहा था।
और इसीलिए वह खुद में नाराज से बडबडाते हुए इधर से उधर घूम रहे थे। जब भी ऑपरेशन थिएटर का कोई दरवाजा खुलता और नर्स ब्लड के लिए या किसी इंस्ट्रूमेंट के लिए बाहर दौड़ लगाती तो सबकी सांस पल भर के लिए थम जाती।
लेकिन उनके पूछने पर भी वह नर्स बिना कोई जवाब दिया वापस ओटी में दाखिल हो जाती थी।
सुजाता एक किनारे चुपचाप बैठी थी। यज्ञ और अखंड दूसरी तरफ थे। एक कुर्सी में दादी चुपचाप बैठी अपनी सुमिरनी फेर रही थी…
कुसुम अपनी मां को दिलासा दे रही थी।
अचानक उसके गले में कुछ अटका और उसे ज़ोर से खांसी आ गई। कुछ देर के लिए अपने आप को उसने संभालने की कोशिश की, लेकिन खांसी का दौरा रुक ही नहीं रहा था। वह बार-बार अपने मुंह के सामने हाथ रखकर खांसी को दबा लेने की कोशिश कर रही थी। लेकिन हर बार नाकाम होती खांसी और दुगुने वेग से उसके गले को प्रभावित करने लगी थी। उसकी आंखों में से आंसू बहने लगे थे। चेहरा लाल हो गया था ।
उसे लगा अब उसे पानी पीना ही पड़ेगा। उसने अपने गले पर हाथ रखकर खांसी रोकने की कोशिश की, आंखें बंद कर उसने सांसों को भी नियंत्रित करने की कोशिश की। लेकिन खांसी रुकने का नाम नहीं ले रही थी। बड़ी मुश्किल से उसने आंखें खोली और पानी के लिए जाने को उठने वाली थी कि आगे ने उसके सामने डिस्पोजल ग्लास में पानी बढ़ा दिया।
कुसुम ने यज्ञ की तरफ देखा और चुपचाप पानी का गिलास थाम लिया। एक गिलास पानी पीने के बाद उसे थोड़ी सी राहत लगी और उसने गिलास वापस यज्ञ को दे दिया। यज्ञ दोबारा वही लगे वाटर फिल्टर से पानी भर कर ले आया…
अबकी बार जैसे ही कुसुम ने पानी का गिलास पकड़ा यज्ञ ने उसे टोक दिया,
” अब घूंट घूंट करके धीरे-धीरे पीना, एकदम से पियोगी तो वापस खांसी शुरू हो जाएगी। तुमने सुबह से कुछ खाया भी नहीं है ना, कुछ खाओगी..?”
यज्ञ के सवाल पर नीचे देखती बैठी कुसुम ने ना में गर्दन हिला दी। लेकिन पानी जरूर उसने घूंट घूंट करके ही पीना शुरू कर दिया..
यज्ञ उसके पास से हटकर अखंड की तरफ बढ़ गया। अखंड ने यज्ञ से कुछ कहा और वह दोनों लोग वहां से निकलकर दूसरी तरफ बढ़ गए। जाते-जाते वह लोग चंद्रा के दोनों लड़कों को भी अपने साथ ले गए। कुछ देर बाद ही अखंड और यज्ञ उन दोनों लड़कों के साथ वापस लौटे और वहां मौजूद हर किसी के लिए चाय के कप साथ लेते आए।
यज्ञ ने आगे बढ़कर कुसुम के पिता को कप थमा दिया, उन्होंने ले भी लिया लेकिन कुसुम की माँ ने मना कर दिया..
कुसुम खिड़की के पास खड़ी बाहर की तरफ देख रही थी..।
यज्ञ उसके पास भी चाय का कप लिए पहुँच गया, और उसकी तरफ बढ़ा दिया..
“लो.. !”
कुसुम ने न में गर्दन हिला दी..
यज्ञ का दिमाग घूम गया..
“चुपचाप कप पकड़ लो, हम नौकर नहीं हैं तुम्हारे !”
“हमें नहीं पीना !” कुसुम ने ठंडी सी आवाज़ में कहा..
“मत पियो, इसी कप में डूब मरो.. ! कम से जग़ह और समय देख कर तमाशा किया करो, यहाँ तुम्हारे घऱ वाले दुःख में मरे जा रहे और तुमको तुम्हारी अकड़ सूझ रही.. जो करना है करो चाय का, पीना है पियो वरना फेंक दो.. हम पर ताव मत दिखाओ !”
उसके हाथ में चाय का प्याला पकड़ा कर यज्ञ वहाँ से चला गया..
चाय का प्याला पकडे खड़ी कुसुम यज्ञ को जाते देखती रही.. उसकी आँखों में गुस्से की लहर दौड़ गयी..
उसका मन किया चाय के प्याले को वहीँ फेंक दे, लेकिन वहाँ मौजूद सभी के चेहरों पर छाया अवसाद उसे ऐसा करने से रोक गया…
उसका सर पर भी भारी सा हो रहा था, उसने चाय का प्याला मुहं से लगा लिया.।
यज्ञ अब सुजाता के पास खड़ा था..।
सुजाता ने चाय लेने से मना कर दिया.. “हमसे नहीं पी जाएगी !”
“कोई बात नहीं भाभी, हम समझते हैं !” बस इतना कह कर यज्ञ ने बिना किसी हूल हिज्जत के चाय का प्याला उसके सामने से हटा लिया..
“ओह्हो बड़ी, दुनिया भर का दुःख इन्हे समझ आ रहा, एक हमारे ही शत्रु बने बैठे हैं.. हुंह !” मन ही मन बड़बड़ाती कुसुम ने मुहं फेर लिया..
कुछ पलों में ऑपरेशन थियेटर का दरवाज़ा खुला और एक नर्स बाहर चली आयी..
“ऑपरेशन हो गया है.. अभी कुछ देर में डॉक्टर आकर और बताएँगे !”
“और क्या बताएँगे.. सफल हुआ की नहीं तुम यही बता दो ?”
कुसुम के पिता हड़बड़ाए से पहुंचे… और नर्स कंधे उचका कर चली गयी..
अखंड यज्ञ सुजाता सभी दरवाज़े तक पहुँच गए थे..
दादी पथराई सी आँखों से दरवाज़े को देख रही थी.. उनके घऱ का चिराग, उनकी मन्नतों का प्रसाद अंदर जीवन और मौत से जूझ रहा था…
क्रमशः
aparna…
***
