अपराजिता -70
राजेंद्र और भावना सही समय पर डॉक्टर्स कॉलोनी पहुंच गए। गेट के कुछ पहले बस से सवारियां उतरी और बस, स्टैंड की तरफ मुड़ गई।
राजेंद्र भावना और सरना वहां से डॉक्टर्स कॉलोनी की तरफ बढ़ गए। कॉलोनी में अंदर जाकर पहली ही गली में मुड़ने के बाद चौथे नंबर पर राजेंद्र का मकान था। वहां तक पहुंचने के बाद सरना को अचानक लगा कि वह इन दोनों के साथ क्यों चला आया, बल्कि उसे इन दोनों को अकेले रहने का मौका देना चाहिए था। इसलिए गेट पर पहुंचते ही वह वापसी के लिए मुड़ गया, लेकिन राजेंद्र ने उसे रोक लिया..
” कहां वापस चल दिए सरना ?”
“कुछ काम था भाई.. आते हैं थोड़ी देर में.. !”
“ठीक है तो फिर दोपहर का खाना यहीं खा लेना.. !”
“अरे नहीं.. अभी तो यहां राशन पानी कुछ होगा ही नहीं, मतलब भावना क्या बनाएगी ?”
” बनाने की क्या बात है सरना,खाना तो गेंदा ने दे ही दिया है! तुम आ जाना और सुनो आते वक्त चाय बनाने का सामान दूध वगैरह लेते आना.. !”
भावना के ऐसा कहने पर सरना ने मुस्कुरा कर हामी भरी और मुड़ गया।
गेट खोलकर राजेंद्र अंदर दाखिल हो गया। उसके पीछे भावना भी चुपचाप चलने लगी। राजेंद्र दरवाजा खोलते हुए ही बोल पड़ा…
” गेट बंद करके आओ, वरना कुत्ते और गाये वगैरह अंदर घुस जाते हैं…!”
भावना ने चुपचाप जाकर गेट बंद कर दिया और वापस चली आई।
उसके आते तक में राजेंद्र अंदर चला गया था। कुछ देर के लिए भावना दरवाजे पर खड़ी रह गई।
यह कैसा अनोखा स्वागत था उसका, उसकी ही ससुराल में।
बाकी जो हो लेकिन दुनिया के लिए तो अब डॉक्टर साहब ही उसके पति थे, और वह अपने पति के घर में इस तरह घुस रही थी जैसे कोई चाहता ही ना हो कि वह यहां मौजूद रहे…।
जाने क्या सोचकर वह पल भर के लिए उस दरवाजे की चौखट पकङे ठिठक कर खड़ी रह गई, लेकिन राजेंद्र उसका स्वागत करने वापस मुड़ कर नहीं आया।
भावना चुपचाप अंदर दाखिल हो गई। अंदर जाने के बाद उसने एक बार फिर उस मुख्य दरवाजे को बंद कर दिया।
कहीं फिर अंदर से ही गोली ना चला दे कि दरवाजा बंद कर देना वरना कुत्ते घर के अंदर भी घुस आते हैं।
भावना मन ही मन सोचती अंदर चली आई। घर छोटा था, लेकिन साफ सुथरा खुला खुला सा और हवादार था…।
घुसते साथ छोटी सी पर्छी थी, जहां शू रैक रखा हुआ था। वहां से होकर एक मुख्य दरवाजा अंदर हाल में खुलता था। जहां इस वक्त नीचे एक गद्दा पड़ा हुआ था, और दो प्लास्टिक की कुर्सियां पङी थी।
उस गद्दे के सामने वाली दीवार पर एक टीवी लगा हुआ था। उस टीवी वाली दीवार के बगल से अंदर एक छोटा गलियारा था, जिसके दोनों तरफ दो बेडरूम बने हुए थे।
उस हाल में ही लंबाई में एक तरफ आगे बढ़ने पर एक दरवाजा छोटी सी रसोई में खुलता था..।
भावना इतनी देर में चारों तरफ घूम घूम कर हर एक जग़ह का मुआयना कर रही थी..।
हाल के बाद रसोई में उसकी नजर अटक गई..।
रसोई में अलग-अलग बंद शेल्फ बने थे। वह उन्हें खोल खोल कर देखने लगी, लेकिन उसकी उम्मीद के मुताबिक ज्यादातर शेल्फ खाली पड़े थे। सिर्फ गैस चूल्हे के ठीक नीचे बने शेल्फ में कुछ मसाले के खुले पैकेट थे जिन्हें रबर बैंड या फिर क्लच लगाकर बंद किया गया था। मसाले भी बहुत सामान्य से ही थे। राई, जीरा, सौंफ अजवाइन के अलावा हल्दी मिर्च और नमक इतने ही मसाले वहां मौजूद थे।
हां चीनी और चाय पत्ती जरूर दो छोटे-छोटे प्लास्टिक के डिब्बो में भरी हुई थी। यह डब्बे भी किसी दवाई के पुराने खाली पड़े डिब्बे थे ।
उसे वह अटपटी सी गृहस्थी देखकर हंसी आ गई..।
सरसो के तेल का खुला पाउच था जो ऊपर से क्लच लगा कर बंद किया गया था, वो एक भगोने में यूँ ही रखा हुआ था..
बर्तन भी बस नाममात्र के थे..।
तो क्या अब तक राजेंद्र ने कुछ भी खरीदारी नहीं की थी? या शायद कुसुम के आने का इंतजार कर रहा था।
हो सकता है वह चाहता रहा हो कि वह कुसुम के साथ जाकर ही उसके मन मुताबिक हर एक समान खरीद कर घर को सजा ले।
इसीलिए तो घर ऐसा खाली सुनसान वीरान सा पड़ा था। एक कड़ाही, एक छोटा भगोना, एक थाली, एक कटोरी, एक गिलास, एक चम्मच और दो चाय के प्याले के अलावा और कोई बर्तन उसे रसोई में नहीं रखा मिला।
हां यह जरूर हुआ था कि भावना के रसोई में घुसते साथ रसोई में अब तक अपना एकछत्र राज समझने वाले छिपकली और कॉकरोच में तहलका मच गया था। उन्हें भावना में अपना बैरी, शत्रु नजर आ रहा था और भावना उन्हें देखकर मन ही मन सरना को फोन लगाकर कॉकरोच स्प्रे मंगवाने के बारे में सोचने लगी थी।
वह बाहर निकाल कर बाथरूम कहां है, इस तलाश में गलियारे में आगे बढ़ती गई और एक दरवाजे को उसने हैंडल पकड़ कर झटके से अंदर की तरफ खोल दिया..।
राजेंद्र उस वक्त कमीज पहन रहा था। भावना को देखकर अचानक ही वह पीछे की तरफ मुडा और कमीज के बटन लगाने लगा।
भावना ने भी उसे सॉरी बोलकर दरवाजा वापस खींच लिया और चुपचाप बाहर की तरफ चली गई।
उसे बाथरूम जाना था, लेकिन अब बाथरूम ढूंढने की उसकी हिम्मत नहीं थी। कुछ 5 मिनट बाद ही राजेंद्र कमीज के बटन लगाकर शर्ट टक इन करके बाहर चला आया..
“मैं हॉस्पिटल जा रहा हूं।”
भावना ने राजेंद्र की बात का कोई जवाब नहीं दिया और अपना सवाल उससे पूछ लिया।
” बाथरूम कहां पर है ?”
राजेंद्र ने गलियारे की तरफ इशारा करते हुए उसे बाथरूम दिखा दिया। भावना चुपचाप उठकर अंदर जाने लगी कि राजेंद्र ने वापस उसे आवाज लगा दी।
” पहले आकर दरवाजा बंद कर लो। तुम इस कॉलोनी में नई हो..।
इस कॉलोनी के बाहर जो बस्ती है, वहां के लड़के अक्सर कूद कर कॉलोनी में चले आते हैं, और सुनसान पड़े घरों से कुछ भी सामान उठा कर ले जाते हैं। इसलिए इस बात का ध्यान रखना और दरवाजा बंद रखना। जब मैं आऊं तभी खोलना।
दरवाजे में मैजिक आई बना है, वहां से बाहर कौन खड़ा है यह देख सकती हो..।”
भावना ने राजेंद्र की बात पर हामी भर दी।
राजेंद्र मुडा और दरवाजे से बाहर निकलने लगा, कुछ सोच कर वह रुका और फिर वापस मुड़ गया।
“मैं शाम से पहले वापस नहीं आ पाऊंगा। वैसे भी देर से ही जा रहा हूं तो तुम सरना के आने पर खाना खा लेना।”
भावना ने राजेंद्र की बात पर हां में सर हिला दिया, और जमीन देखती खड़ी रही। राजेंद्र दरवाजे से बाहर निकल गया।
उसके निकलते ही भावना ने दरवाजा बंद किया और तेजी से बाथरूम की तरफ निकल गई।
राजेंद्र अभी अपने गेट तक पहुंचा ही था कि अस्पताल से उसके लिए कॉल आ गया।
राजेंद्र एक जनरल सर्जन था और अस्पताल से किसी इमरजेंसी केस के लिए उसके पास फोन आ रहा था। फोन अटेंड करते ही उसके कदम तेज हो गए। हॉस्पिटल उसकी डॉक्टर्स कॉलोनी से बस 10 मिनट के रास्ते पर था।
तेजी से एक तरह से भागते हुए ही राजेंद्र अस्पताल पहुंच गया…।
वो तुरंत आपातकाल विभाग की तरफ दौड़ पड़ा…।
आपातकाल विभाग के बाहर लोगो का मजमा लगा था.. लोगो को हटाते वो अंदर की तरफ बढ़ रहा था कि चंद्रा के एक गुर्गे ने उसे पहचान लिया..
वह तुरंत दूसरे के कान में फुसफुसा उठा..
“अबे यह तो रघुवंशी है, यह यहां क्या कर रहा है?”
“डॉक्टर है न.. हो सकता है गांव से तबादला ले कर यही आया हो !”
” इसे देखकर तो भैया जी और बौरा जाएंगे.. अबे इसे तो यहां से ठिकाने लगाना पड़ेगा..!”
“का करे.. पीछे से मुहं बांध कर खींच ले ?”
“हाउ.. और नहीं तो का.. !”
वह दोनों राजेंद्र की तरफ बढ़ने लगे कि तभी आपातकाल विभाग से निकलकर नर्स भागती हुई बाहर आई..
“सर जल्दी चलिए… पेशेंट इज़ सिंकिंग !”
राजेंद्र ने दौड़ सी लगा दी और उसके विभाग के अंदर घुसते ही नर्स ने दरवाज़ा उन दोनों गुर्गों कर मुहं पर बंद कर दिया..
अंदर पहुंचते ही राजेंद्र की नजर चंद्रा पर पड़ी और वह चौंक गया।
उसने तुरंत साथ खड़े स्टाफ से इसके बारे में जानकारी लेना शुरू कर दिया।
” क्या हुआ इन्हें?”
” सर घर वाले तो बता रहे हैं कि छत से गिर गया।”
“पुलिस को खबर दी?”
राजेंद्र के सवाल पर वहां मौजूद जूनियर स्टाफ एक दूसरे को देखने लगा।
“अभी दे देते हैं सर और सर यह इनके गांव की डॉक्टर हैं, उनके साथ यही आई है। वहां मौजूद नर्स कला ने रेशम की तरफ राजेंद्र का ध्यान आकृष्ट किया..।
राजेंद्र के देखते ही रेशम ने गर्दन झुका कर राजेंद्र का अभिवादन किया और फिर चंद्रा के बारे में उसे जानकारी देने लगी..
“सर मेरे पास यह लोग आए तब पेशेंट का बहुत ज्यादा खून बह चुका था। मैंने स्टिचिंग के लिए देखा, लेकिन मुझे लगा उस वक्त स्टिच करना काफी नहीं रहेगा। घाव जरा अंदरूनी था, और इसीलिए मैंने सिर्फ एक इंजेक्शन और प्राथमिक उपचार देकर इन्हें यहां रेफर कर दिया..।”
“ओके मैम.. आपने हिस्ट्री ली थी…?”
“जी सर, घर वालों का कहना है कि यह छत पर अपने कुछ लोगों के साथ कुछ हिसाब किताब कर रहे थे, और उस वक्त वहां मौजूद लोगों के कहे अनुसार इनका संतुलन बिगड़ा और यह छत से नीचे गिर गए..।”
“किसी तरह का नशा या कुछ और..”
” नो सर, पेशेंट इस क्लीन।
मैंने चेक कर लिया था अल्कोहल या किसी तरह का कोई नशा नहीं किया हुआ था इन्होंने..।”
“गिरने के बाद वोमिटिंग..?”
“नहीं सर नहीं हुई है..।”
“गुड.।”.
रेशम से सारी पूछताछ करते हुए राजेंद्र चंद्रभान की जांच भी करता जा रहा था, उसने बाकी स्टाफ की मदद से चंद्रा को पलट कर लेटा दिया…
राजेंद्र के वहां पहुंचने से पहले से वहां एक सीनियर डॉक्टर मौजूद थे..
उन्होंने इतना ज्यादा खून बहता देखकर अपने हाथ खड़े कर दिए थे।
थोड़ी बहुत जांच पड़ताल करने के बाद उन्होंने रेशम से कह दिया कि यह केस उनके बस का नहीं है, और पेशेंट को या तो यहां से दिल्ली एयर बस के द्वारा भेज दिया जाए और या फिर घर वालों के साथ वापस कर दिया जाए..।
रेशम उनकी बात सुनकर चकित थी। क्योंकि उसे लग रहा था कि चंद्रभान की उम्र कम है और इसलिए इस केस को और चंद्रभान को बचाया जा सकता है !
लेकिन सीनियर डॉक्टर जोशी ने मरीज को हाथ न लगाने की जैसे कसम सी खा ली थी…
“डॉक्टर जोशी, अभी तो आपने इन्हे देखा तक नहीं, और कह दिया कि केस मुश्किल है !”
“हम्म यह मेरे इतने सालों का तजुर्बा कह रहा है डॉक्टर रेशम कि आपका मरीज अब ठीक नहीं हो सकता। ठीक हो भी गया तो जिंदगी भर बिस्तर पर ही पड़ा रहेगा ।ऐसे मरीज लेकर मैं अपने अस्पताल की बदनामी नहीं करना चाहता, आप चाहे तो किसी प्राइवेट हॉस्पिटल में ले जाइए। और या फिर जहां आपकी मर्जी, करें ले जाइए। मैं बाहर इस मरीज के परिजनों को इसकी खराब कंडीशन की सूचना देने जा रहा हूं..।
यह अस्पताल रेशम का नहीं था, और इसलिए यहां पर वह अपनी मर्जी से कोई निर्णय नहीं ले सकती थी। यहां तक कि अगर वह खुद होकर चंद्रभान का इलाज करना भी चाहे तब भी उसके लिए यह नामुमकिन था। जब तक इस अस्पताल का कोई डॉक्टर स्वयं होकर उसकी मदद ना करें। और इसलिए वह डॉ जोशी को बाहर जाकर परिजनों से बात करने से रोक नहीं पाई।
डॉक्टर जोशी बाहर निकल गए, और चंद्रभान के पिता को बुलाकर उन्होंने उनसे कह दिया कि चंद्रा को बचाना मुश्किल है और वह अब अपनी अंतिम सांसें ले रहा ह। अगर वह लोग चाहे तो उसे किसी दूसरे अस्पताल ले जा सकते हैं डॉक्टर जोशी ने इतना कहा और वहां से आगे बढ़ गए ।
हैरान परेशान से चंद्रभान के पिता वही दीवार से लगी बेंच पर ढह गए।
ऐसा लगा जैसे उनके ऊपर मन भर का बोझ रखकर किसी ने उन्हें झुका दिया था! हैरान परेशान थके से वह जमीन ताकते बैठे थे कि चंद्रा की मां उनके पास चली आई..
” चंद्रा के बाबूजी एक बार कुसुम को बुला लीजिए… हो सकता है उसे देखकर चंद्रा अपनी आंखें खोल दे..!”
आंसुओं से भीगी लड़खड़ाती सी आवाज में चंद्रा की मां ने उनसे कहा और अपनी जेब से टटोलकर जाने कैसे हिम्मत करके उन्होंने अपना फोन निकाला और कुसुम की ससुराल में फोन लगा दिया..
आपातकालीन कक्ष में राजेंद्र के पहुंचते ही रेशम को थोड़ी सी उम्मीद दिखने लगी थी। वह भी राजेंद्र के साथ चंद्रा की तीमारदारी में जुट गई।
उन दोनों डॉक्टर ने स्टाफ की मदद से उसे अलट पलट कर जांचना शुरू किया। स्ट्रेचर में लेकर अंदर ही अंदर वह उसे जांच के लिए अलग-अलग विभागों में ले गए..
राजेंद्र और रेशम की तत्परता थी कि चंद्रभान के लगातार बहते खून का कारण पता चल गया और ऑपरेशन की तैयारी करने को कहकर राजेंद्र खुद ओटी के लिए तैयार होने निकल गया, उसने निकलते हुए अपने एक दोस्त को भी फोन लगा लिया..
“तू दस मिनट में पहुँच, मैंने ऑपरेशन कि सारी तैयारी करवा ली है.. ! मुझे आज तेरी हेल्प कि बहुत ज़रूरत पड़ेगी.. !”
उधर दूसरी तरफ मौजूद राजेंद्र के दोस्त ने हामी भरी और राजेंद्र फोन रख कर ऑपरेशन के लिए लगने वाली ज़रूरी चीज़ो कि तरफ ध्यान देने लगा..
रेशम भी तैयारियों को देख रही थी, कि राजेंद्र चला आया..
“थैंक्स डॉक्टर आपने प्राथमिक उपचार देकर इन्हे मरने से बचा लिया ! वैसे दूर्वागंज पोस्टिंग हुई है आपकी..!”
रेशम ने हां में से हिला दिया। राजेंद्र के चेहरे पर कई रंग आए और चले गए। रेशम समझ नहीं पाई कि राजेंद्र क्यों ऐसा पूछ रहा है कि तभी राजेंद्र ने खुद होकर जवाब दे दिया।
” यहां आने के पहले मैं खुद दूर्वागंज में पोस्टेड था। अच्छे लोग हैं वहां के, सीधे-साधे और बहुत जल्दी ही अपने डॉक्टर से जुड़ भी जाते हैं।
यह दूर्वागंज के ठाकुर हैं। काफी नाम है इनका, सबसे रईस जागीरदार, जमींदार ठाकुर चंद्रभान सिंह तोमर है ये !”
“ओह्ह.. मुझे तो अभी ज्यादा वक्त नहीं बीता सर, इसलिए ज्यादा जानती पहचानती नहीं हूँ.. !”
” एनीवेज आप अगर जाना चाहे तो जा सकते हैं, और रुकना चाहे तो सर्जरी में रुक भी सकती हैं!”
” सर मेरे गांव के पेशेंट है तो सर्जरी तक मैं रुकना चाहती हूं, और एक बात और कहना चाहती थी सर। आपके आने से पहले डॉक्टर जोशी ने इस केस को बहुत कॉम्प्लिकेटेड है कहकर उनके परिजनों से यह कह दिया कि वह इन्हें किसी प्राइवेट हॉस्पिटल में ले जाएं।
हो सकता है उनके परिजन उस तैयारी में भी हों, तो अगर हो सके तो आप एक बार बाहर जाकर उनके परिजनों से बता दीजिए कि आप इनकी सर्जरी प्लान कर रहे हैं।
आप दूर्वागंज में काम कर चुके हैं तो यह लोग आपको जानते भी होंगे..!”
” जानते हैं, बहुत अच्छी तरह जानते हैं.. और इसलिए मैं इन लोगों से कुछ कहने नहीं जा सकता।
बल्कि आप उनके घर वालों के साथ यहां तक आई हैं, तो आप जाकर इस कंसेंट फॉर्म पर उनके पिता या उनकी वाइफ के साइन करवा कर ले आइये.. !”
रेशम ने हामी भरी और कंसेंट फॉर्म लिए बाहर चली आयी…
उसी समय अस्पताल के मुख्य द्वार से अखंड की जीप अंदर दाखिल हो गयी..
यज्ञ और कुसुम को अस्पताल की सीढ़ियों पर उतार कर वो गाड़ी के साथ पार्किंग कि तरफ निकल गया..
क्रमशः
aparna…
