अपराजिता -68

अपराजिता 68

कुसुम ने सख्ती से अपने होंठ भींच लिए। अपनी ताकत जमा की और राजेंद्र के बारे में यज्ञ को सब कुछ सच-सच बताने के लिए उसने अपनी आंखें खोली और यज्ञ की तरफ घूम गई…

“सुनिए.. !”

“सुनाइए न !”

यज्ञ का ऐसे उसे बार बार टोक देना, उसकी हिम्मत को तोड़े दे रहा था..
लेकिन वो ये भी समझ गयी थी कि इस चिपकू को सब सच बताये बिना इससे बचे रहना भी बहुत मुश्किल था..

“हम आपसे शादी नहीं करना चाह्ते थे !”

यज्ञ को अब भी ये सब कुसुम का मजाक लग रहा था.. वो बड़े मजे से टहलता हुआ कमरे में रखे नाश्ते की तश्तरी तक पहुँच गया…
उसने कुछ नमकीन पिस्ते उठाये और खाने लगा.. उसकी ये हरकते कुसुम का दिमाग गर्म कर रही थी..।

“हम आपसे नहीं किसी और से शादी करना चाह्ते थे.. !”

यज्ञ एक झटके से पलट गया, उसने कुसुम की तरफ देखा, कुसुम निर्भीक आँखों से उसकी तरफ देख रही थी…

” हमारे गांव दुर्गागंज में जो सरकारी अस्पताल है, वहां के डॉक्टर हैं, डॉक्टर राजेंद्र रघुवंशी। जब उनसे पहली बार मिले, तभी से वह हमारे दिल दिमाग में इस तरह बस गए थे कि हमने ठान लिया था कि हम उनसे शादी करेंगे। लेकिन हमारे घर वाले हमारी शादी के लिए तैयार नहीं थे क्योंकि डॉक्टर साहब ठाकुर नहीं है ना.. !”

यज्ञ की बोलती बंद हो चुकी थी। उसके हाथ में मौजूद पिस्ते जमीन में बिखर चुके थे। वह फटी फटी आंखों से सिर्फ कुसुम की तरफ देख रहा था। गुस्से में उसकी माथे की नसें तनने लगी थी। लेकिन कुसुम भी अपनी आन की लड़की थी। उसने भी अपनी आंखें यज्ञ की आंखों से हटाए बिना उस पर स्थिर रखते हुए आगे कहना शुरू कर दिया..

” शादी वाले दिन जब आपकी बारात हमारे दरवाजे पर लगी, हम घर छोड़कर भाग गए थे।
   डॉक्टर साहब हमारा इंतजार कर रहे थे। लेकिन दूर्वागंज से बाहर हम पहुंच पाए, उसके पहले ही चंद्रा भैया और उनके गुंडे आ गए और उन लोगों ने हमें पकड़ लिया। चंद्रा भैया हमें साथ लिए घर वापस आ गए। और उनके गुंडे पता नहीं डॉक्टर साहब को कहां ले गए? हमें कुछ समझ नहीं आ रहा..।
हमें तो अब यह भी समझ नहीं आ रहा कि हम करे तो करे क्या..?
आपसे हमारी जबरदस्ती शादी करवाई है चंद्रा भैया ने हम ये शादी नहीं करना चाहते थे… !”

यज्ञ के चेहरे पर नाराजगी साफ नजर आने लगी थी। कुसुम की सारी बातें सुनने के बाद उसने अपनी एक मुट्ठी भिंची और पीछे रखे टेबल पर जोर से मार दी।
    उसका गुस्सा सांतवे आसमान पर चढ़ गया था। उसके लिए यह बात बहुत बड़ी बात थी। जिस लड़की से उसका ब्याह हुआ था, वह असल में किसी और लड़के से प्यार करती थी। इस वक्त सही गलत क्या है, और क्या होना चाहिए, कि समझ से यज्ञ ऊपर उठ चुका था। उसका ठाकुरों वाला खून बलबलाने लगा था।

    उसका बस चलता तो वह कुसुम के पास जाकर उसे दो तमाचे रसीद कर देता। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया…
किसी और लड़के से प्यार करती थी कुसुम।
पता नहीं दोनों किस हद तक आगे बढ़े होंगे ।
सोच कर ही यज्ञ की आंखों में खून उतर आया था। उसे इस वक्त कुसुम को देखकर नफरत सी होने लगी थी। कुछ देर तक वह अपनी जगह पर खड़ा रहा  कुसुम वैसे ही खड़ी उसे देखती रही।
और राजेंद्र के बारे में कुछ ना कुछ बताती रही। लेकिन अब यज्ञ को कुछ भी नहीं सुनाई दे रहा था।
वह आगे बढ़ा, और उसने कुसुम की बांह पकड़ ली..

“क्या कर रहे हैं आप ?”

“वही जो करना चाहिए.. !”

यज्ञ ने कुसुम की बांह पकड़ी और उसे खींचते हुए अपने कमरे से बाहर ले गया। आधी रात बीत चुकी थी, सब अपने-अपने कमरे में सोए पड़े थे..।
ग्यारह साढ़े ग्यारह का वक्त हो रहा था…।

यज्ञ कुसुम को खींचते हुए सीढ़ियों से नीचे लेकर चला गया।
    इत्तेफाक ऐसा था कि घर के नौकर भी अपने कमरों में जाकर सो चुके थे। हल्की ठंड का मौसम शुरू हो गया था। इसलिए घर के हाॅल में और आंगन में भी कोई नजर नहीं आ रहा था। यज्ञ कुसुम को साथ लिए बाहर वाले दरवाजे की तरफ बढ़ गया…।

गेट पर बैठा चौकीदार भी अपनी कुर्सी पर ऊँघ रहा था..

यज्ञ ने गेट खोला और कुसुम को खींचकर गेट से बाहर धक्का देकर गेट वापस बंद कर लिया।

तेज कदमों से चलता हुआ वह अंदर आ गया। और कुसुम अपने ससुराल की देहरी से बाहर हो गई।

     अपने कमरे की बालकनी में खड़ा अखंड यह सब कुछ देख रहा था। उसके लिए यह बहुत बड़े आश्चर्य की बात थी कि उसके छोटे भाई ने शादी की पहली रात ही अपनी दुल्हन को कमरे से बाहर निकाल दिया। अखंड तेजी से कमरे से निकल कर बाहर चला आया। वह सीढ़ियां उतर रहा था कि ऊपर चढ़ते यज्ञ से टकरा गया…

यज्ञ ने अपनी लाल-लाल आंखों से एक बार अखंड की तरफ देखा और एक किनारे से होकर आगे बढ़ गया। अखंड भी तेजी से पलट कर उसके पीछे-पीछे बढ़ गया। यज्ञ ने अपने कमरे का दरवाजा खोला अंदर दाखिल होकर दरवाजा बंद करने को था कि अखंड ने अपना हाथ बढ़ा दिया और भीतर दाखिल हो गया..

“यज्ञ ये क्या हो रहा है.. कुसुम को घऱ से क्यों निकाल दिया तुमने.. ?”

“वो इस घऱ में रहने के लायक नहीं है भैया ?”

“हुआ क्या है ? बताओगे हमे ?”

“वो शादी से पहले किसी और से प्यार करती थी… किसी डॉक्टर रघुवंशी से..
उसके घर वाले इस शादी के लिए तैयार नहीं हुए और सब कुछ जानते बूझते भी उन्होंने यह ढोल हमारे गले से बांध दिया।
चंद्रा ठाकुर हर बात जानता था और इसके बावजूद उसने हमें धोखे में रखकर यह शादी करवा दी.. !”

“किस धोखे में रख कर यज्ञ ?”

यज्ञ ने आश्चर्य से अपने बड़े भाई की तरफ देखा

“इसी धोखे में भैया कि उनकी बहन कुंवारी है.. !”

“पागल लड़के…तुमसे ये सब किसने कहा ?”

“खुद कुसुम ने !”

“क्या कहा उसने ?”

“यही कि वो किसी और से प्यार करती थी, और शादी करना चाहती थी.. !”

“तो ये बात कहाँ से आ गयी कि चंद्रभान ने तुम्हे धोखे में रखा कि उसकी बहन कुंवारी है ? अरे शादी तो तुमसे ही हुई है न ? और तुमने कैसे मन ही मन ये गणित भी लगा लिया कि वो किसी और से शादी करना चाहती थी तो इसका मतलब उसने सारी हदें पार कर दी होंगी… ।
हम मानते हैं कि वो किसी और से प्यार करती थी, और उसके घऱ वालो ने उसकी शादी उसकी मर्ज़ी के बिना तुमसे करवा दी, लेकिन अब क्या इसके बदले तुम उस मासूम की जान ले लोगे..।”

“मासूम तो कहीं से नहीं है वो ?”

“मासूम नहीं होती तो कभी अपनी शादी की पहली रात में अपने पति से अपने अतीत की सारी सच्चाई इस तरह बोल नहीं जाती..? अगर उसने कुछ भी गलत या अमर्यादित किया होता तो भी उसकी सच बोलने की हिम्मत नहीं होती..?
उसने तुमसे हर एक बात सच सच बोल दी है भाई… इसका मतलब जानते हो क्या है ?”

“क्या ?”

“ये की उसने पुरे मन से शादी में बताये वचन सुने है, और उन्हें निभा रही है..।
इसीलिए अपने पति से कुछ छिपाये बिना उसने सब सच बता दिया..। यज्ञ एक बात और अगर कुसुम ने उस लड़के के साथ प्यार में अपनी मर्यादाओं का मान न रखा होता तो वो तुम्हे कभी कुछ नहीं बताती..।
अपनी पत्नी पर विश्वास रखो !”

“क्या विश्वास रखे भैया ? हमने उसे घर से निकाल दिया है.. जाये उसे जहाँ जाकर मरना है !”

“पागल हो तुम.. मतलब तुम्हारी नजर में प्यार करना गुनाह है।
    तो इस हिसाब से हम भी तो बहुत बड़े गुनहगार हो गए। हमने भी तो किसी वक्त किसी लड़की से टूट कर प्यार किया था, और जिसकी बहुत बुरी सजा हमें मिली भी है, तो क्या हमें भी मर जाना चाहिए.. ?”

अखंड की बात सुनकर यज्ञ तड़प कर रह गया…_” भैया। “उसने लाचारगी से अपने भाई की तरफ देखा..

” कहना क्या चाहते हैं आप.. ?”

” कुसुम के जीवन में जो भी था, उसका अतीत था। उसके साथ जबरदस्ती की गई है। उसके भाई ने उसकी मर्जी के खिलाफ जाकर उसकी शादी कर दी। अपने मान सम्मान और समाज में अपने नाम को और नाक को बचाए रखने के लिए।
मैं चंद्रभान को भी उतना गलत नहीं ठहरा रहा।  क्योंकि आज भी हमारी रूढ़िवादी सोच जात बिरादरी और समाज से ऊपर उठकर नहीं सोच सकती।
आज भी इन गांव कस्बों में हम लोगों की सोच इतनी उत्कृष्ट नहीं हुई है कि, हमारी बहन बेटी अगर किसी गैर जात में शादी करना चाहे तो, हम खुशी से कर दें।
    चंद्रभान ने वही किया जो एक सामान्य भाई करता और अब तुम वह करो जो एक पति का कर्तव्य है..।”

“क्या करना चाहिए हमे ?”

” अपनी पत्नी को समय दो। उसके साथ जो हुआ वह बहुत गलत हुआ है, लेकिन अब इस बात का और कोई तोड़ भी तो नहीं है..।
या तो इतनी हिम्मत रखो कि उसे कल ही तलाक देकर उसके मायके वापस भेज दो। उसके बाद हो सकता है कि वह अपने उसी प्रेमी के साथ शादी करने के लिए घर वालों को मना ले, लेकिन जहां तक हमें लगता है यह रास्ता ज्यादा कठिन है।

एक लड़की का मन बहुत कोमल होता है। वह जहां जिस घर में रहती है, उसके हिसाब से अपने आप को ढाल लेती है। उन रिश्तो में खुद को ढाल लेती है इसीलिए ब्याह के बाद लड़कियां विदा होती है, लड़के विदा नहीं होते। क्योंकि लड़कों के लिए अपने घर परिवार को छोड़कर अपने आप को नई परिस्थितियों में ढालना बेहद मुश्किल होता है।

अगर चंद्रभान कुसुम और उसके प्रेमी को पकड़ नहीं पाता और कुसम अपने प्रेमी के साथ ब्याह कर भी लेती, तब भी जिंदगी भर खुश नहीं रह पाती। क्योंकि साल दो साल बाद जब उसके प्यार का बुखार जरा कम होता, तब उसे अपने घर, अपने माता-पिता, अपने भाई भाभी, अपने घर के रीति रिवाज की बहुत याद आती।
अपनी जात बिरादरी में ब्याह करने का नियम हमारे पूर्वजों ने इसीलिए तो बनाया है। क्योंकि अलग-अलग समुदाय के लोगों का खान-पान, रहन-सहन सब कुछ अलग होता है ।
अपने समुदाय से बाहर जाकर अगर हम ब्याह करते हैं, तो दोनों ही पक्षों को बहुत ज्यादा समझौता करना पड़ता है। और शायद उन्हीं समझौतो से बचने के लिए ऐसे कुछ नियम हमारे पूर्वजों द्वारा बनाए गए थे, जिन्हें हम आज समझ नहीं पाते। और अपने आप को क्रांतिकारी घोषित कर देते हैं।

खैर हमारा इतना सब समझाने का कारण बस यह है कि कुसुम भी धीरे-धीरे अपने उसे मासूम से प्यार को भूलकर तुम्हारे रंग में रंग जाएगी, उसे मौका तो दो..।”

” हमारे लिए बहुत मुश्किल होगा.. !”

“ऐसा तुम्हे लगता है.. लेकिन ऐसा होगा नहीं.. ! एक मौका तो दो उसे.. जाओ उसे मना कर वापस ले आओ !”

“मनाने का काम हमसे नहीं होगा !”

“सब होगा.. धीरे धीरे तुम्हे अपनी पत्नी के मन में अपने लिए प्यार जगाना होगा… और इसके लिए तुम्हे ही प्रयास करने होंगे..।
हो सकता है वो बार बार तुम्हारे प्रयासों को असफल करने की कोशिश करे, लेकिन तुम्हे अडिग रहना होगा यज्ञ..।
ये सिर्फ तुम्हारी अकेले की जिंदगी का सवाल बस नहीं है। तुम दोनों की जिंदगी से दो परिवार जुड़े हुए हैं। तुम्हारे पास दो ऑप्शन बचते हैं, या तो तुम उसे तलाक देकर अलग हो जाओ।
  लेकिन इसमें दोनों परिवारों की थू थू  होगी और तुम दोनों को भी ऐसा नहीं है कि जिंदगी की कोई बहुत सारी खुशी मिल जाएगी..।
अगर अलग होकर तुम दोनों खुश रह सकते हो तो बेशक अलग हो लो, लेकिन वो अपनी ज़िम्मेदारियों से भागना ही होगा.. बस और कुछ नहीं !

दूसरा तरीका है कि तुम दोनों कुसुम के अतीत को भूलकर अपनी जिंदगी को संवारने का प्रयास करो। हम जानते हैं, कुसुम के लिए अभी यह सब इतना आसान नहीं होगा। लेकिन अगर वह तुम्हारी तरफ से लगातार सकारात्मक प्रयास देखेगी, तो जरूर एक दिन वह भी तुम्हारे प्यार के सामने हार जाएगी और हम जानते हैं कि हमारा भाई एक बार जो ठान लेता है, वह करके रहता है।

अरे इतनी बड़ी-बड़ी डील्स अकेले कर लेते हो, एक छोटी सी डील नहीं कर पा रहे हो..।
हमे यकीन है, एक दिन तुम सब सही कर लोगे..।”

अखंड की बातें सुनकर यज्ञ का गुस्सा धीरे-धीरे बह गया था। उसे भी अपने क्षणिक आवेश का थोड़ा सा पछतावा हो रहा था। लेकिन वह और कर भी क्या सकता था? किसी भी पुरुष के लिए अपनी स्त्री के विवाह पूर्व संबंधो का ताना बना सुनना भयानक कष्टप्रद था.. ।

उसने अगर कुसुम की बात सुनने के बाद उस पर अपना गुस्सा निकाल दिया तो क्या अलग किया?
लेकिन अब उसके बड़े भाई जो कह रहे, उसे पूरी तरह सुनाने समझने के बाद उसे उनकी बात ही सही लग रही थी..।

उसने अखंड की तरफ देखा, अखंड अपनी जग़ह पर बैठा उसे देखता मुस्कुरा रहा था..
यज्ञ आगे बढ़ कर अखंड के सीने से लग गया..।

हमेशा अपनी अकड़ में रहने वाला लड़का बिलकुल बच्चो की तरह बिलख गया..
यज्ञ अपने भाई के सीने से लगा रोता रहा, और अखंड चुपचाप उसके बालों पर हाथ फेरता उसे बिना कुछ बोले ढांढस बंधाता रहा…

“अब जाओ उसे रोको.. पता नहीं कहाँ पहुँच गयी होगी.. ! जहाँ भी होगी, उसे चुपचाप वापस ले आना !”

यज्ञ ने हामी भरी और अखंड के कमरे से बाहर निकल गया..
सारा घर सुनसान सा पड़ा था..

यज्ञ ने अपनी गाड़ी निकाली और आगे बढ़ा दी.. हर एक गली चौबारे को देखते हुए वो आगे बढ़ रहा था..

कुसुम को जब यज्ञ ने घऱ से बाहर कर गेट बंद किया, तब कुछ पलो के लिए कुसुम भी सन्न रह गयी थी..

कुछ देर वहीँ खड़े खड़े वो सोचती रही, फिर धीरे से आंसू पोंछ कर मन ही मन कुछ तय कर वो आगे बढ़ गयी..

इत्तेफाक से मानौर से दूर्वागंज जाने के लिए आखिरी सवारी टेम्पो जा रही थी.. अपने चेहरे को आँचल से छुपाये वो भी उस टेम्पो में बैठ गयी…।

ज्यादातर कामगार थे जो दिन भर अपनी हड्डियां तोड़ कर मेहनत करते और पैसा कमाते थे। बस इसीलिए वापसी के समय ज्यादातर लोग ऊंघ रहे थे। इसलिए किसी का ध्यान दुर्गागंज की राजकुमारी पर नहीं पड़ा।

दूर्वागंज में ड्राइवर ने चौक पर अपनी सवारी गाड़ी खड़ी कर दी, और खुद भी गाड़ी से उतर गया। जब तक ड्राइवर पैसे के लिए हाथ बढ़ाता, तब तक में कुसुम तेजी से चलती हुई अंधेरी सी गली में गायब हो गई।

घर से निकलते वक्त उसके हाथ में कोई रुपया पैसा तो था नहीं, जो ड्राइवर के हाथ रख पाती।
   लेकिन वह जिस गली में मुङी थी, वह उसके मायके की गली नहीं बल्कि राजेंद्र के घर की गली थी। जाने क्या सोचकर वह उसी के घर की तरफ बढ़ गई…

राजेंद्र के घर पहुंच कर वह दरवाजे पर दस्तक देने ही वाली थी कि खुली खिड़की से उसका ध्यान अंदर की तरफ चला गया।

यह वही समय था जिस वक्त भावना  चक्कर खाकर गिरी थी और राजेंद्र उसे अपनी बाँहों का सहारा दिए पलंग पर लिटा रहा था..।

भावना के बगल में बैठा राजेंद्र उसके माथे पर हाथ रख कभी उसका ताप देख रहा था तो कभी उसकी कलाई थाम कर उसकी नब्ज जाँच रहा था..
हैरान परेशान सी कुसुम ने घऱ पर इधर उधर नजर दौड़ाई, लेकिन उसे न तो सरना नजर आया और न कोई और.. तो क्या राजेंद्र के घऱ पर वो दोनों अकेले ही थे..?

भावना की तबियत बिगड़ने पर राजेंद्र इतना परेशान क्यों हो गया था ?
तो क्या इसका मतलब उसके भैया ने जो तस्वीर उसे दिखाई थी, वो सच थी ?

राजेंद्र और भावना वाकई ब्याह कर चुके हैं ?
लेकिन क्यों ?

भावना ने ऐसा क्यों किया ? क्या भावना राजेंद्र से प्यार करने लगी थी ? ऐसा था तो उसने कभी कुसुम से सच कहा क्यों नहीं ?
.लेकिन क्या भावना ये सच कुसुम से कह देती तो कुसुम उसे राजेंद्र से शादी करने देती ?
नहीं न..! तो फिर कैसे और क्यों भावना कुसुम को कुछ भी बताती ?

तो क्या कुसुम और राजेंद्र के घऱ से भागने वाली बात भावना ने ही चंद्रा को बता दी थी.. !

कुसुम का सर घूमने लगा.. उसे लगा सारी पृथ्वी उसी के इर्द गिर्द घूम रही है..
वो अपना सर पकड़ कर कुछ पलों के लिए खड़ी रह गयी…

अब… ?
अब उसका क्या होगा ? क्या उसे अपने मायके लौट जाना चाहिए ?
लेकिन वहाँ भी उसका अपना कौन है ?
सोच सोच कर उसका सर फटने लगा…

वो भारी कदमों और बोझिल मन से वापस मुड़ गयी..
वो जैसे ही मुड़ी एक लम्बी सी कार ठीक उसके सामने आकर रुक गयी..
चौंक कर वो एक कदम पीछे हट गयी और ड्राइविंग सीट का कांच नीचे उतर गया…

“आओ बैठो अंदर !” पूरी ख़डूसियत के साथ यज्ञ ने अपनी नवेली बीवी को आदेश दे दिया..

यज्ञ का चेहरा देखते ही उसे कुछ देर पहले की यज्ञ की नाराज़गी याद आ गयी..

उसने गुस्से से दूसरी तरफ मुहं फेर लिया..
यज्ञ ने उसकी तरफ देखा..

“चुपचाप आओ और बैठो.. ! दुबारा नहीं कहेंगे हम !”

यज्ञ ने हॉर्न पर हाथ रखा और ज़ोर से बजा दिया..

पैर पटकती कुसुम आयी और कार का पिछला दरवाज़ा खोल दिया उसने..

“हम आपके ड्राइवर नहीं हैं… कायदे से आकर सामने बैठिये !”

कुसुम ने पिछला दरवाज़ा ज़ोर से बंद किया और सामने का दरवाज़ा खोल कर यज्ञ की बाजु वाली सीट पर बैठ गयी..

यज्ञ ने हल्के से उसे देखा और गाड़ी वापस मानौर की तरफ बढ़ा दी..

क्रमशः

aparna…

4.7 3 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Newest
Oldest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments