अपराजिता -90

अपराजिता -90

लेकिन उसने कुछ कहा नहीं चुपचाप आरव की तरफ देखकर उसे बाहर जाने का इशारा किया और थाली परोस कर बाहर ससुर जी के लिए थाली लिए चली गई।

खाना निपटने के बाद देर रात तक अथर्व आरव और रेशम नीचे हॉल में बैठे बातें करते रहे, और अपनी होने वाली बीवी के बारे में आरव,  रेशम को बहुत सारी  बातें बताता रहा..

आधी रात के वक्त अथर्व और रेशम अपने कमरे में चले आए..

अथर्व ने रेशम को अपनी बाहों में भर लिया और वह दोनों सुकून और चैन की नींद सो गए…

***

दिन बीत रहे थे, और एक एक कर भावना की माँ के सारे संस्कार पूरे हो गए…!

संस्कार पूरे होने तक भावना के चाचा जी वहीँ रुके थे..!!

   मामी का गुज़ारा घर की एकमात्र दुकान से ही था, उनका आवारा बेटा जो घर ही नहीं टिकता था, वो दुकान पे क्या बैठता..?
ऐसी कोई भारी आमद भी नहीं थी कि जिसके सहारे पन्द्रह पन्द्रह दिन दुकान बंद कर कहीं और टिका जाये..!
वो भावना को अकेले छोड़ कर जाना नहीं चाहती थी, लेकिन भावना उनकी मज़बूरी समझती थी। उसने उन्हेँ काफी कुछ देकर वापस भेज दिया..!!

उसकी माँ की कई सारी साड़ियां भी रखी थी, उनमे से कुछ उसने मामी को दे दी..
भोज में आया ढेर सारा राशन पड़ा था, उसमे से भी सामान उसने अपनी मामी के साथ भेज दिया..।

उसके चाचा वैसे भी फक्कड़ अवधूत थे, उन्हेँ वैसे भी संसारिक प्रलोभनों से कोई सरोकार ना था..।
उनके लिए इस संसार में सिर्फ शिव ही सत्य थे और उनकी आराधना उनका कर्म.. बाकी सब मिथ्या था..!
उन्होंने कभी खुद के लिए गृहस्थी नहीं जोड़ी थी..।
कई कई राते मसान में भूखे पेट सोकर काट देते थे, और फिर निकल जाया करते थे अपनी यात्रा पर..
लेकिन फिर कहीं ना कहीं से उनके शिव उनके पेट भरने का साधन जुटा ही दिया करते थे..।

इसलिए भावना के मुक्त हस्त से किये दान से उन्हेँ किसी तरह की कोई पीड़ा नहीं हो रही थी..।
वो वैसे भी जोड़ने में विश्वास नहीं करते थे.. !!

राजेंद्र इस सब में कुछ बोले बिना चुप ही रह जाता था। उसने भी इतने दिनों की छुट्टी का आवेदन डाल दिया था.. ।
लेकिन अब छुट्टियां समाप्त हो गयी थी.. !

घर भर की आंख की किरकिरी जिसे किसी प्रकार के आडम्बर में यक़ीन नहीं था, वो भावना के चाचा हर वक्त भावना के साथ मजबूती से खड़े थे..।

घर पर ऱोज़ के मिलने आने वाले हों, या तरह तरह के नए नियम कायदे में भावना को बांधने की इच्छा रखने वाले हो, सबके सामने किसी मजबूत किले से चाचा जी खड़े थे..।
उन्होने जितनी आवश्यकता थी, उतना ही भावना से करवाया..।

उनके गुरुदेव का हरिद्वार में आगमन होना था, इसके लिए उनके संगी साथी साधुओ का उनके पास फ़ोन भी आने लगा था, लेकिन अब भी वो भावना के साथ रुकना चाह्ते थे..!

इसी सब के बीच एक सुबह राजेंद्र अपनी छुट्टियां खत्म होने पर अस्पताल चला गया था..!
चाचाजी को फ़ोन पर किसी से बात करते सुन भावना ने उन्हेँ भी वापस जाने को मना लिया..।
वो भोली सी लड़की किसी को भी अपने कारण कष्ट नहीं दे सकती थी….

चाचा जी को भी उसने इस बात के लिए मना ही लिया की गुरुदेव से हरिद्वार में मिलने के बाद वापस आ जाये ..

चाचाजी उसके बाद वहीँ से होकर गुजरते अपने साथियों के साथ हरिद्वार निकल गए..।

राजेंद्र सुबह ही अस्पताल चला गया था..।
चाचा जी के लिए भावना ने रास्ते के हिसाब से कुछ पूरियाँ बनायीं और साथ रख दी..।

आलू के गुटके, आम के अचार की फांक और मेथी की पूड़ियों को सलीके से बांध कर उसने उन्हेँ दिया और उनके पैर छू लिए..

“अरे क्या कर रही हो..? हम बेटियों से पैर नहीं छुवाते !”

“जानते हैं चाचा जी, लेकिन आपको देख कर मन से श्रद्धा जागती है..। भले ही आप महादेव के उपासक हैं, लेकिन हमें तो आप में ही महादेव नजर आते हैं। ऐसा लगता है हिमालय में किन्हीं ऊंची पर्वत कंदराओं के आगे अगर महादेव अपनी धूनी रमाये बैठे होंगे तो उनका चित्र बिल्कुल आप सा ही होगा।
आपके माथे पर पड़ती यह तीनों लकीरें और उन पर बीच में बना यह निशान बिल्कुल रूद्र प्रतिमा सा ही लगता है…।”

चाचा जी ने मुस्कुरा कर भावना के सिर पर हाथ रख दिया।

” देखो बेटा वैसे तो हमने कभी फोन रखने की जरूरत नहीं समझी, लेकिन अब इधर पिछले दो सालों से हम भी एक छोटा सा फोन रखने ही लगे हैं ।
हमें लगा परिवार वाले अगर हमसे संबंध जोड़ना चाहे, बात करना चाहे तो कहां करेंगे ?
क्योंकि हमारा कोई एक ठिकाना तो है नहीं। बस इसीलिए फोन रखने लगे हैं।
इसीलिए तुमसे भी कह रहे हैं  कभी कुछ भी जरूरत हो बस एक बार फोन कर देना। हम तुरंत चले आएंगे।
     और आज से अभी से हमें अपना चाचा नहीं अपना पिता ही समझो।
    नमन करते हैं हम अपने उस बड़े भाई को जिसने अपनी जिंदगी की आहुति दे दी अपने घर परिवार के लिए। और एक हम है, जो कुछ भी नहीं कर पाए।
लेकिन अब जो जा रहे हैं गुरुदेव से मिलने,उस के बाद अपने जीवन में बदलाव ले आएंगे।

हम यहीं तुम्हारे पास आ जाएंगे। जो थोड़ी बहुत खेती बाड़ी है, जिसे आधिया में दे रखा है, उसे हम संभाल लेंगे।
बस हमारे लौटते तक तुम अपना ध्यान रखना, और दामाद जी का भी।
दामाद जी बहुत अच्छे इंसान हैं, उनकी आंखों में हमने सच्चाई देखी है…।
जगह-जगह घूमने के बाद भांति भांति के लोगों से मिलने के बाद अब एक शक्ति तो हमारी आंखों में भी आ गई है, कि हम सामने वाले को देखकर पहचान लेते हैं! दामाद जी को देखकर ही हमें समझ में आ गया कि तुम्हारे लिए इससे अच्छा लड़का नहीं मिल सकता था।

जितने ही पढ़े लिखे हैं, उतने ही विनम्र और शांत स्वभाव के हैं। वह कभी तुम्हारा साथ नहीं छोड़ेंगे।तुम भी अपनी तरफ से कभी उन्हें कोई क्लेश मत देना।
पति पत्नी का रिश्ता जितना ही मीठा होता है उतना ही कठिन भी होता है। एक दूसरे के साथ निभाना, इतना आसान नहीं होता…
लेकिन इस ऊंची नीची पगडंडी को एक दूसरे के साथ और सहयोग से आसान कर लेना, यही आशीर्वाद देकर जा रहे हैं, सदा सौभाग्यवती रहो….!”

भावना को आशीर्वाद देकर चाचा जी निकल गये। उनके जाने के बाद भावना अंदर चली आई। घर को समेट कर उसने रसोई में बचे रख खाने को ठीक से ढांप ढूप कर रखा और नहाने चली गई।

  वो बाल धोकर छत पर चली आई। कपड़े सुखाने के बाद वह बालों को झाड़ती खड़ी थी कि रास्ते पर बाइक में से गुजरते दीपक की नजर भावना पर पड़ गई।

दीपक ने पहले भी भावना को कुसुम के घर पर कई बार देखा था। पहली बार देखने के बाद ही दीपक को भावना बहुत पसंद आ गई थी। लेकिन गांव टोले में अपनी पसंद को आसानी से जाहिर नहीं किया जा सकता था, और वह भी तब जब भावना कुसुम की सहेली थी।
    उस वक्त दीपक को यही लगा कि अगर वह भावना के साथ किसी भी तरह का गलत व्यवहार करेगा तो चंद्रा भैया इसकी टांगे तोड़ देंगे।
     हालांकि दीपक का दिमाग चारों तरफ दौड़ता था।

एक तरफ तो वह अखंड से बदला लेने के लिए इस जुगत में लगा था कि यज्ञ की बारात खाली हाथ लौटे और जिस तरह अखंड की बदनामी हुई, उसी तरह यज्ञ की भी बदनामी हो।
अगर यज्ञ की बारात बिना दुल्हन के लौट आई तो परिहारो के परिवार पर हमेशा हमेशा के लिए एक काला धब्बा लग जाता कि इस घर के लड़कों की किस्मत ही खोटी है।

उसे तो पूरी उम्मीद थी कि कुसुम और राजेंद्र शहर पहुंच जाएंगे और शादी करके कहीं दूर चले जाएंगे और उसके बाद जब यज्ञ बिना बारात के घर लौटेगा तो वह जरूर शर्म से अपना चेहरा छुपाए अपने घर पर फांसी के फंदे पर लटक जाएगा।
   और अगर यज्ञ फांसी के फंदे पर लटक जाता तब उस वक्त अखंड के दिल पर वही बीतती जो दीपक के दिल पर बीती थी जब उसने अपने भाई को खोया था।

यही दीपक का असली बदला था।

लेकिन उसने चंद्रा भैया को जितना सोचा था चंद्रा भैया उससे कहीं ज्यादा खतरनाक निकले थे।

चंद्रा भैया के कुछ खास लड़कों ने शुरू से कुसुम और राजेंद्र पर नजर रखी हुई थी और इसीलिए जब कुसुम घर से भागी तो चंद्रा भैया के दो लड़के कुसुम के पीछे उसी वक्त लग गए थे। और उन्होंने चंद्रा भैया को खबर कर दी थी कि कुसुम किस रास्ते से होकर गुजर रही है। इसलिए जब राजेंद्र और कुसुम आगे बढ़े तो एक चौक पर चंद्रा भैया अपने गुर्गों के साथ उनका इंतजार करते मिल गए।

लेकिन चंद्रा भैया के इस प्लान के बारे में दीपक को कुछ भी मालूम नहीं था। इस बात से दीपक का माथा ठनका  जरूर था कि चंद्रा भैया ने अपनी खास प्लानिंग के बारे में उसे क्यों नहीं बताया था..।
फिर उसने ध्यान नहीं दिया..।

लेकिन जब चंद्रा ने भावना और राजेंद्र की शादी करवाई तब दीपक भड़क उठा था, लेकिन चंद्रा के सामने बोलने की उसकी औकात नहीं थी..।

भावना को देखते हुए दीपक इन्ही ख़यालो में खोये उसके घर के सामने से होकर गुजर गया..

ऊपर धूप में काफी देर बैठे रहने के बाद भावना ने कपड़े समेटे और नीचे उतर आयी और आराम करने लेट गयी…

शाम ढले उसकी नींद खुली तो वो चौंक कर उठ बैठी..
उसने हाथ मुहं धोया और तुलसी पर दीपक जलाने चली गयी..

इत्तेफाक से उसी समय एक बार फिर भावना के घर के बाहर से गुज़रते दीपक की नजर उस पर पड़ गयी..

गांव खेड़े में वैसे भी लोगों को एक दूसरे की सारी जानकारी होती ही हैं…
वो भी भावना को अच्छे से जानता पहचानता था… भले ही भावना उसे नहीं पहचानती थी !

जब पहली बार उसने भावना को देखा था, तभी से वो सीधी सी लड़की उसकी आंख में चढ़ गयी थी…

दीपक की शादी काफी साल पहले हो चुकी थी, और उसकी पत्नी उसके वहशी स्वभाव के कारण उसे छोड़ कर दो साल पहले ही अपने मायके जा बैठी थी…!
बच्चे थे नहीं इसलिए ज़िम्मेदारी वाली कोई बात उसकी पत्नी ने उससे नहीं कही…
और पिछले दो साल से दीपक अकेला पड़ा खुद को शराब में डुबाये अपना जीवन काट रहा था..
उसके जीवन का एक ही उद्देश्य था, अखंड की बर्बादी !!
आज भावना को देख दीपक की सुप्त चेतनाये जागने लगी थी ..

दीपक ने अपने साथ के लड़को को भेजा और अपने घर पर शराब की बोतल खोले रात होने का इंतज़ार करने लगा..

****

राजेंद्र को उतने दिन बाद अस्पताल जाने के कारण दिन भर साँस लेने की फुर्सत नहीं मिली थी….. ..
वो शाम तक काम में व्यस्त रहा और शाम को गांव लौटने की जगह अपने घर चला गया….
उसे लगा चाचाजी घर पर भावना के साथ हैं ही, वो नहीं भी गया तो भावना अकेली नहीं रहेगी..
लेकिन उससे एक चूक हो गयी, उसने सोचा ज़रूर लेकिन भावना को फ़ोन कर के उसका हालचाल पूछना भूल गया..।
उसे एक बार फिर यही लगा कि अगर कोई दिक्कत हुई भी तो भावना उसे फ़ोन कर ही लेगी..।

वो देर शाम अपने घर पहुंचा, तो आज इतने दिनों बाद उसे भी अपने घर में कदम रख बड़ा सुकून सा लगा..।
बीते कुछ दिनों से माहौल ही ऐसा भारी सा हो गया था की ना ढंग से कुछ खाया जा रहा था ना नींद ही आ रही थी…।
हाथ मुहं धोकर वो सीधे रसोई में चला गया.. आते वक्त वो दूध का एक पैकेट और चॉकलेट केक लेता आया था..
उसने अपने लिए चाय बनायी और केक के टुकड़े कर प्लेट में लिए बाहर चला आया..

उसकी रसोई अब भी साफ सुथरी थी और सारा सामान करीने से अलमारी में सजा था..।
ये उसी का घर था जो भावना के आने के पहले अजायबघर से कम ना था..।
और अब सुकून भरा आशियाना हो गया था…।
घर के हर कोने में भावना की छाप थी.. !

वो मुस्कुरा कर केक चाय में डूबा डूबा कर खाने लगा !!

सर्दियों के दिन थे, अँधेरा जरा जल्दी ही घिरने लगा था..
गांव में रात भी जल्दी होती है और रात होते ही गांव सुनसान पड़ जाते हैं..!

रात के 9 बजे तक भी जब राजेंद्र नहीं आया तो भावना गेट पर ताला डाल कर अंदर चली गयी..!
लेकिन उसकी नजर अपने ही आंगन के बकुल के पेड़ के पीछे छिपे बैठे दीपक पर नहीं गयी..

घर के अंदर आने के बाद मुख्य दरवाज़े को बस यूँ ही लगा कर वो रसोई की तरफ चली गयी..!
रसोई के पीछे के आंगन के दरवाज़े पर भी उसने ताला डाल दिया…

वो पलट कर अंदर आयी और रसोई समेटने लगी.. उसे बिलकुल भूख नहीं थी..!

वो रसोई साफ़ कर रही थी कि उसके घर की बिजली चली गयी..।

गांव में ये ऱोज़ का हाल था, इसलिए भावना आले में से मोमबत्ती निकाल कर जलाने लगी..

मोमबत्ती जला कर वो पलटी ही थी कि सामने खड़े दीपक को देख उसकी चीख निकल गयी..।

दीपक ने आगे बढ़ कर उसका मुहं ढक लिया..
भावना के हाथ से जलती मोमबत्ती नीचे गिर गयी..

क्रमशः

aparna…

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Meera Patel
Meera Patel
2 years ago

नही , ये नही , अरे अब अगर ये दीपक ने धीरेंद्र वाली गलती की न तो सच कहती हूं , इतने श्राप दूंगी की ये दीपक जल कर बूझ जायेगा 😡😠 अरे भावना को एक फोन कर के बता तो देना चाहिए था न की चाचा चले गए है । पर वो भी बताती क्यों ! जब के इतने दिनो से राजी वही था तो हॉस्पिटल का भी तो देखना था न , पर क्या शाम होते ही एक फोन नही कर सकती थी , अब राजी का स्वभाव तो है ही ऐसा सामने से कुछ नही कहेगा नही करेगा , सब भावना को ही तो देखना है ।
बस महादेव करे , वासुकी आजाये, बचाने , या फिर अखंड या यज्ञ ही आ जाए बचाने । कोई तो आए , या फिर ऐसा हो की चाचा ने राजी को ही फोन कर दिया हो की भावना अकेली है घर तो जरा जल्दी हो लौट आना हॉस्पिटल से … और राजी ही पॉच जाए । अरे अब आगे के पार्ट का इंतज़ार कैसे होगा 🥺🤯🤯🤯🤯🫨🫨 सिर्फ मेरे कान में केहदो dr साहिबा , की भावना ठीक है , और इस दीपक की तो मैं …🤬🤬🤬🤬🤬🤬