अपराजिता -81
भावना और राजेंद्र को घऱ लौटने में देर हो गयी.. भावना को भी अब नींद सी आने लगी थी, लेकिन राजेंद्र के दोस्त उन लोगों को जाने ही नही दे रहे थे..
देर रात घऱ पहुँचते ही राजेंद्र थका सा अपने कमरे में चला गया.. अगले दिन रविवार था और राजेंद्र की छुट्टी थी इसीलिए सुबह की कोई जल्दबाजी नही थी..
भावना अपने कमरे में चली आयी..
कपड़े बदल कर वो सोचने लगी.. अब राजेंद्र ठीक हो चुका था, क्या उसे राजेंद्र को छोड़ कर चला जाना चाहिए ?
यही सही रहेगा.. वो दोनों क्यों इस ज़बरन की शादी को निभाए? जब उन दोनों पर ऐसा कोई बंधन नही है.. !
कल ही सुबह डॉक्टर साहब से बात कर अपने घर चली जाउंगी, सोच कर उसके चेहरे पर राहत चली आयी..
उसकी माँ का दिया बैग उसने अब तक खोल कर नही देखा था..
वो भी अपना बिस्तर साफ़ कर सो गयी..
***
मायके में रहते दो तीन दिन बीत चुके थे.. मायके में सब पहले जैसा था, कुछ नही बदला था….
कुसुम कुमारी वहाँ आकर अपने पहले के रंग में लौट आयी थी..
एक शाम तो अपनी माँ के बार बार मना करने पर भी वो अपनी बुलेट उठाये गांव का चक्कर भी लगा आयी थी..
लेकिन उसके आश्चर्य का ठिकाना नही रहा जब अपने जेठ की गाडी उसने सरकारी औषधालय में सामने वापस खड़ी देखी..
ये चक्कर क्या था आखिर ?
वो घूमघाम कर लौट गयी, लेकिन जाकर सामने से पूछने की उसकी हिम्मत नही थी.. अगले दिन फिर वो उसी समय पर पहुंची लेकिन आज अखंड की गाड़ी वहाँ मौजूद नही थी..!
उसने राहत की साँस ली और घऱ निकल गयी..।
उसे मायके रहते पांच दिन बीत चुके थे, लेकिन ना उसके ससुराल से कोई फ़ोन आ रहा था और ना यज्ञ ही आ रहा था..
कहीं यज्ञ ने सबको बता तो नही दिया ?
कहीं उसके ससुराल वालों ने उसे छोड़ तो नहीं दिया? लेकिन अगर छोड़ भी दिया तो, इसमें उसका कोई नुकसान नहीं। बल्कि वह उनकी मंजूरी से अपने मायके में रहने लगेगी।
लेकिन पता नहीं क्यों यह ख्याल कुसुम को गुदगुदा नहीं पाया।
कुसुम को कहीं चैन नही था..।
वो तो मायके आने के लिए मरी जा रही थी, लेकिन पांच ही दिन में उसे ऐसी उकताहट सी हो जाएगी उसे मालूम ना था…
आखिर ऐसा क्या जादू था उसके ससुराल में ? कुछ ऐसा खास तो नजर नही आया..।
लेकिन जो भी हो रौनक तो लगी ही रहती थी….
घऱ की औरते साथ बैठ कर इधर उधर की बातें करती चाय पिया करती थी..
उसके ससुराल में तो खाना परोसना भी एक अयोजन उत्सव सा था..
बड़े तामझाम के साथ घऱ के मर्दों का परोसा हुआ करता था.. सलाद पापड़ चटनियाँ अचार तली मिर्चो के बिना उसकी सासु जी कभी खाना नही लगवाती थी..।
खाना भले ही घऱ पर महाराज जी से बनवाया जाता था लेकिन परोसती यज्ञ की अम्मा ही थी..
और हमेशा ही कुसुम ने ये बात ध्यान से देखी थी कि घऱ के आदमी अचार चटनी की तरफ देखते तक नहीं थे, बावजूद ऱोज़ टेबल पर उनका सजा होना आवश्यक था..।
उन लोगो के खाने के बाद ही औरते खाना खाने बैठती थी…
ऐसा लगता था उस घऱ में हर वक्त एक उत्सव मनाया जा रहा है..।
हर एक इंसान अपनी उमंग में झूमता नजर आता था, उसके जेठ जी के अलावा ! और इन सभी में सबसे चंचल चपल थी सिम्मी..
घऱ की सबसे छोटी लड़की थी, लेकिन हर वक्त इधर से उधर उछलती फिरती थी.. एक जग़ह बैठने में उसे चैन ही नही था..।
यही हाल सिम्मी की भाभी का था..।
द्विअर्थी बातें करने में उनका कोई सानी नही था.. खुद ही कोई भद्दा मजाक करेंगी और फिर खुद ही लोटपोट होकर हंसने भी लगेंगी.. !
उस समय कुसुम को उनके भद्दे मजाक और सिम्मी के बेहूदा सवालों पर खीझ उठती थी, लेकिन आज उन्हेँ याद कर वो मुस्कुरा ले रही थी..।
उसे लगा था मायके में रह कर वो बड़े आराम से अपने डाक साब से मन भर कर बात कर लेगी, लेकिन यहाँ तो डाक साहब को उसके मेसेज जा भी नही रहे थे..।
तो क्या डाक सब ने इतने दिनों से अपना मोबाइल खोल कर उसका मेसेज देखा ही नही..
लेकिन उस रात तो उनका जवाब आया था.. फिर अब क्या हुआ ?.
क्या उन्होने मेसेज खोलना ही बंद कर दिया ?
कुसुम ने इस बात पर तो विचार किया, लेकिन ये नही सोच पायी कि डॉक्टर साहब उसका नंबर ब्लॉक भी तो कर सकते हैं..?
ये बात उसके दिमाग से कोसो दूर थी.. उसके लिए ऐसा सोचना असम्भव था..।
लेकिन असल में हुआ यही था..
उस रात पार्टी से लौटने के अगले दिन सुबह राजेंद्र की बहुत देर तक नींद नही खुली थी..
बहुत देर रास्ता देखने के बाद भावना ने अपनी चाय बना ली.. उसी बीच उसे राजेंद्र के कमरे से आहट सुनाई दी और वो एक कप में चाय लिए उसके कमरे में पहुँच गयी..
बिस्तर पर राजेंद्र नही था..।
बाथरूम में होगा सोच कर भावना ने चाय टेबल पर रखी और निकल गयी.. उसी वक्त मोबाइल पर लगातार मेसेज नोटिफिकेशन आ रहा था…।
राजेंद्र बाथरूम में ही था, और भावना ने उसका फ़ोन खोल लिया… कुसुम के रात से भेजे मेसेज भरे पड़े थे..
जाने क्यों लेकिन भावना का कुसुम पर दिमाग ख़राब होने लगा..।
हद से ज्यादा पागल लड़की थी कुसुम..।
जब अपने भाई का आतंक देख चुकी है, तब तो उसे सुधर जाना था..।
कहते है दूध का जला छांछ भी फूंक फूंक के पीता है, और ये पागल एक बार दूध से जलने के बाद अब उबलती चाय अपने मुहं में छनवाने को तैयार बैठी है..।
लानत है इसके दिमाग पर..।।
चंद्रा तो भाई था, इसलिए कुसुम पर उसने आंच नही आने दी लेकिन कहीं यही सब यज्ञ को मालूम चला तो “ठुकरा के मेरा प्यार, मेरा इंतकाम देखेगी” की पीढ़ी का लड़का क्या इतनी आसानी से अपनी इस बौड़म बीवी को माफ़ कर पायेगा..?
भावना बचपन से कुसुम को जानती थी.. कुसुम के पास दिमाग था, लेकिन सामाजिक व्यवहारिकता में वो शून्य बटा सन्नाटा ही थी…।
उस सब्जपरी को अब भी अपनी शादी का एहसास नही जागा था, बिलकुल वैसे ही जैसे उसे अपनी मुहब्बत का एहसास नही जगा था..।
भावना ने गुस्से में कुसुम का नंबर ही ब्लॉक कर दिया। यह सब पल भर में हुआ। भावना ने फोन वापस रखा और कमरे से बाहर निकल गई। बाथरूम से निकल कर राजेंद्र वापस सो गया…
भावना यूँ ही फ़ोन में नंबर ब्लॉक कर चली गयी थी। उसे लगा था, बाद में खोल देगी.. लेकिन उसके दिमाग से निकल गया..।
सुबह राजेंद्र देर से उठा…
उसकी चाय रखी हुई ठंडी पड़ गयी थी..
उसके उठने तक में भावना ने नहा कर खाने की तैयारी कर ली थी..
राजेंद्र बाहर वाली छोटी सी बालकनी में बैठा अख़बार पढ़ रहा था, और भावना उसके लिए चाय लेकर चली आयी..
“डॉक्टर साहब !”
भावना ने उसे सम्बोधित किया और बिना सर उठाये ही राजेंद्र ने हम्म कह दिया..
“हम कुछ कहना चाह्ते हैं !”
“बोलो !”..
“हम अपनी अम्मा के घऱ जाने की सोच रहे हैं !”
राजेंद्र का अख़बार पढ़ना रुक गया पर इसने सर उठा कर भावना की तरफ देखा नही.. चुप बैठा रहा, भावना उसके कुछ बोलने का इंतज़ार करने के बाद खुद बोलने लगी..
“छह महीने का वक्त बहुत होता है.. तब तक हम अपनी अम्मा के घऱ ही रह लेंगे..
सुन रहे हैं ना आप ?”
राजेंद्र ने बस हाँ में गर्दन हिला दी.. चाय का कप उठा कर उसने तुरंत उसमे मुहं डाला और अपने होंठ जला लिए.. होंठ जलते ही वो चौंक कर कप को दूर कर गया.. लेकिन तब तक जरा सी चाय छलक गयी थी..
भावना भी उसकी इस हड़बड़ी से घबराई लेकिन फिर खुद को संभाल कर बैठ गयी..
“जला तो नही ना.. पानी लाये ?”
“नही.. ! कब जाना चाहती हो ?”
“अभी ही निकल जाते हैं.. सुबह की बस भी मिल जाएगी !”
ना भावना ने राजेंद्र से छोड़ने चलने की बात कही और ना राजेंद्र ने ही ये कहा की वो छोड़ देगा…
“हम्म.. ठीक है !” कह कर राजेंद्र फिर अख़बार में डूब गया..
भावना उठ कर अंदर चली गयी.. जाने से पहले उसने राजेंद्र के धुले कपड़ो में इस्त्री मार दी थी.. उसके लिए सुबह और रात का खाना बना कर ढाप ढूप के रख आयी..
जिस कमरे में सोती थी उसे साफ सुथरा कर अपना बैग उठाये वो बाहर चली आयी…!
पिछली मुलाकात में उसकी अम्मा ने उसके हाथ में जो एक छोटा सा बैग रखा था, उसे भी भावना ने अपने साथ ले लिया..
अब तक उसने अपनी अरुचि के कारण बैग खोल कर देखा तक नही था..
वो अपना सामान उठाये बाहर तक आयी, उसने राजेंद्र की तरफ देखा, वो खोयी खोयी नजरो से बालकनी में बैठा बाहर के रास्ते पर नजर टिकाये बैठा था..
जाने से पहले भावना राजेंद्र से बहुत कुछ कहना चाहती थी…..
वह अपनी और राजेंद्र की फूटी किस्मत के बारे में उससे बात करना चाहती थी। उसे यह बताना चाहती थी कि इन तीन-चार दिनों में राजेंद्र के साथ रहते हुए उसे कभी यह एहसास नहीं हुआ कि वह गलत जगह पर है। राजेंद्र का वह दिल से सम्मान करती है। और उसे सही मायने में अपना दोस्त मानने लगी है। अगर कभी राजेंद्र को जरूरत पड़े तो, वह बस एक आवाज की दूरी पर है।
वह जब बोलेगा तब वह उसकी मदद के लिए हाजिर होगी। लेकिन ऐसे दोनों का साथ रहना सही नहीं है। और बस इसीलिए वह जा रही है। मन में उसके ढेर सारे भाव चल रहे थे, विचार चल रहे थे। वह कहना बहुत कुछ चाहती थी, लेकिन उसे शब्द नहीं मिल रहे थे। लेकिन इतनी देर में उसके मन में एक बार भी नहीं आया कि राजेंद्र से वह कुसुम या चंद्रा भैया की बर्बरता के बारे में बात कर ले। बल्कि वो बात करना चाहती थी अपने और राजेंद्र के बारे में।
भावना खुद भी शायद अपने दिल में चल रहे जज़्बातों के भंवर को समझ नहीं पा रही थी, और उसी भंवर में घिरी जा रही थी..
कुछ पल तक वह वहीं खड़े राजेंद्र को देखते रही!
राजेंद्र का ध्यान उसकी तरफ नहीं था। वह भी बालकनी की जमीन पर बैठा अपने दोनों घुटनों को अपने हाथों के घेरे में लिए हुए बाहर की तरफ देख रहा था।
भावना ने धीरे से आवाज दी-“डॉक्टर साहब हम निकल रहे हैं।” राजेंद्र की जैसे तंद्रा भंग हुई, वो एकदम से मुड़कर खड़ा हुआ और भावना के पास चला आया.. भावना के मन में पल भर के लिए यह बात आई की हो सकता है राजेंद्र उसे बस स्टॉप तक छोड़ने चला आए।
लेकिन राजेंद्र राजेंद्र ही था। भावना अपना बैग उठाएं दरवाजे से निकल गई, और राजेंद्र ने दरवाजा बंद कर दिया, और अंदर चला आया।
लेकिन इस बार वह बालकनी में नहीं गया, क्योंकि वहां से उसे जाती हुई भावना नजर आ जाती। भावना चुपचाप सीढ़ियां उतरकर नीचे पहुंच गई।
रास्ते पर पहुंचने के बाद उसने एक उचटती सी निगाह उस फ्लैट पर डाली जहां चार दिन से रह रही थी, लेकिन राजेंद्र बालकनी में नजर नहीं आया।
वह समझ गई कि राजेंद्र अपने कमरे में चला गया होगा, या फिर छत पर खड़ा सिगरेट फूंक रहा होगा।
एक ठंडी सी आह भर कर वह अपने रास्ते पर आगे बढ़ गई। बालकनी की ठीक बगल वाली खिड़की पर खड़ा राजेंद्र भावना को जाते हुए देख रहा था। उसका मन जाने कैसा तो हो गया।
उसने वही टेबल पर पड़ी अपनी सिगरेट के पैकेट से सिगरेट निकाली और उसे जला लिया। सिगरेट का जलता धुआं, इसकी कड़वाहट राजेंद्र के अंदर के दर्द को रिस रिस कर पिघला रही थी….
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चंद्रभान की अस्पताल से छुट्टी हो गयी थी.. उसे घर ले आया गया था, और चंद्रभान के घर आते ही पूरा घर उसकी तीमारदारी में लग गया था।
यह बात सत्य है कि अगर कोई बीमार व्यक्ति घर में मौजूद हो तो पूरा घर अस्पताल बन जाता है, और घर के लोग अस्पताल के कर्मचारी।
ऐसा ही चंद्रभान के साथ भी था।
तबीयत में उसकी काफी सुधार था, लेकिन अब भी वह बिस्तर पर ही पड़ा था। उसके सारे जरूरी काम बिस्तर पर ही निपट रहे थे। उसका उठना बैठना अब भी दुभर था।
पीठ के बल गिरा था इसलिए उसकी रीढ की हड्डी चोटिल हुई थी और फिलहाल उसे सीधा बैठने और चलने में वक्त लगने वाला था..।
अस्पताल में फिर भी अस्पताल का स्टाफ उसकी देखभाल कर लेता था। लेकिन घर में ढेर सारे नौकर होने के बावजूद सुजाता हर वक्त चंद्रभान की सेवा में लगी हुई थी। यही हाल चंद्रा की मां का भी था। वह बेचारी दिन-रात चंद्रा को क्या खिलाना चाहिए, क्या पिलाना चाहिए इसी जुगत में लगी रहती थी। कुसुम को भी अपने रूआबदार भाई की ऐसी हालत देखकर अच्छा तो नहीं लग रहा था, लेकिन वह खुद भी क्या कर सकती थी? कुसुम वैसे भी खुश दिल लड़की थी। बहुत ज्यादा देर तक अपने गम और दुख को अपने ऊपर हावी होने देने वालों में से वह नहीं थी।
चंद्रा के घर लौटने की उसे भी खुशी थी। जब चंद्रा अपने कमरे में लेटा हुआ था तब कुसुम उससे मिलने गई। उस वक्त एक बारगी कुसुम का बहुत मन किया कि वह चंद्रा के सामने उसके डॉक्टर का जिक्र कर दे, लेकिन चंद्रा की हालत देखकर वह कुछ कहे बिना ही चुपचाप बैठी रही। कुछ देर तक चंद्रा के पास बैठने के बाद वह अपने कमरे में चली गई थी।
इन चार-पांच दिनों में ही कुसुम का मायका उसके लिए वाकई पराया हो गया था।
या तो माहौल ऐसा होने के कारण, उसे ऐसा महसूस हो रहा था।
उसका दबंग भाई घर में शेर की तरह गरजा करता था, उसकी आवाज से नौकर पत्ते की तरह कांपने लगते थे। आज वही शेर धराशाई हुआ एक छोटे से कमरे का हिस्सा बन गया था।
खुली खिड़की से जितना आसमान उसकी आंखें नाप पाती, बस उतना ही आसमान आज उसका हिस्सा था। और दस बाय दस का वह कमरा उसकी जमीन थी।
भगवान इंसान को उसकी औकात दिखा ही देते हैं।
एक समय था जब चंद्रा खुद को भगवान समझने की भूल करने लगा था। तब उसे लगने लगा था कि वह लोगों का भाग्य विधाता है। और उसने भावना और राजेंद्र को अपनी मर्जी से चलाया था और आज वही चन्द्रा भगवान के हाथ की कठपुतली मात्र बनकर रह गया था…।
सुजाता और कुसुम की मां की भाग दौड़ बढ़ गई थी। और इस समय कुसुम अब हद से ज्यादा ऊबने लगी थी।
वह अपने कमरे में बैठी गाने सुन रहे थे कि तभी नीचे कुछ शोर सा हुआ। उसे समझ नहीं आया कि क्या बात है ।
अभी कुछ देर पहले ही वह चंद्रा से मिलकर आई थी। अब अचानक इतना शोर कहां से उठ रहा है? वह अपने कमरे से निकल कर नीचे झांकने लगी। नीचे के खुले आंगन में उसे अपने घर के सदस्यों से घिरा यज्ञ नजर आ गया।
यज्ञ को देखते ही कुसुम का दिल धक से रह गया। उसका एक मन यज्ञ के साथ वापस अपने ससुराल लौटने को व्याकुल हो उठा, लेकिन दूसरे मन से उसे अपनी अकड़ भी तो दिखानी थी…।।
आखिर कुसुम कुमारी थी वो !!
क्रमशः
aparna
