अपराजिता -54

अपराजिता -54

उस हवेली से बाहर निकल कर उसने चैन की सांस ली। आज एक बार फिर ऐसा लग रहा था जैसे वह फांसी के एकदम करीब पहुंच गई है, और किसी भी क्षण उसके गले में फंदा डालकर इस दुनिया का जेलर उसे उसकी सांसों से मुक्ति दे देगा।
भारी मन से वह अपने घर की तरफ बढ़ने लगी कि तभी दुबई से उसके नंबर पर कॉल आने लगा…

भावना ने फ़ोन उठा लिया..

इतनी सारी भाग दौड़ में वह शारीरिक और मानसिक रूप से थक कर चूर हो गई थी, इसलिए कुछ आगे बढ़कर तालाब के किनारे बनी सीढिओं पर जाकर वह बैठ गई। उसे लग ही रहा था कि आज भी उसके पिता का नहीं बल्कि निनाद का फोन होगा और वही हुआ, फोन निनाद का ही था…

“कैसी है आप ? ” उसने भावना से पूछ लिया..

“ठीक हूँ.. और आप ?”

“अच्छा हूँ.. !”

कुछ देर के लिए दोनों तरफ ही ख़ामोशी सी छा गयी… दोनों के पास ही अपनी बात रखने के लिए शायद शब्द नहीं थे, या फिर वह दोनों ही उचित शब्दों को ढूंढ रहे थे। कुछ देर खामोश रहने के बाद निनाद ने ही ठाकुर साहब के परिवार और कुसुम के बारे में पूछ लिया, और इतनी देर से भरी बैठी भावना ने सुबह से चल रही एक-एक बात निनाद को बता दी।
       बताने के बाद वह सोचने भी लगी कि अचानक उसे हो क्या गया है।
   जो लड़की कुसुम कुमारी के अलावा और किसी से ढंग से बात भी नहीं किया करती थी, इस अंजान लड़के के सामने कैसे और क्यों अपना दिल खोलकर रख देती है? भावना को थोड़ी झिझक सी होने लगी। और इसलिए अपनी बात जल्दी-जल्दी खत्म करने के बाद उसने निनाद से सवाल कर दिया।

” आप भी सोचते होंगे कि कैसी अजूबा लड़की है। सब कुछ हमसे कह जाती है।”

” आप यकीन नहीं मानेंगे भावना जी, लेकिन मैं ऐसा कुछ भी आपके बारे में नहीं सोचता। बल्कि मैं कुछ और ही सोच रहा हूं।”

निनाद ने इतनी गहराई से अपने शब्दों को रखा कि भावना पल भर के लिए खामोश रह गई। पता नहीं यह अनजान लड़का क्या कहने वाला है? क्या सोचता है यह?

कुछ पल रुक कर भावना ने पूछ लिया।

” क्या सोचते हैं आप?”

” भावना जी, पता नहीं आप मेरी बातों को समझेंगे या नहीं। लेकिन जो बात है वह मुझे अब आपको बतानी ही होगी।”

” देखिए निनाद जी आप हमें डरा रहे हैं। जो भी कहना है सीधे और साफ शब्दों में कह दीजिए।”

“हां, मैं भी यही सोच रहा हूं कि इस बात को जितना जल्दी आपसे बता दूं, उतना अच्छा होगा।”

” निनाद जी अब आप हमारे पेशेंस टेस्ट कर रहे हैं। प्लीज बताइए क्या बात है?”

” भावना जी, आप इस वक्त कहां है?”

” हम रास्ते पर हैं। गांव के रास्ते पर… इस वक्त तालाब के पास है। क्यों क्या हुआ?”

” आप कोई अच्छा सा जगह देखकर बैठ जाइए।”

” निनाद जी प्लीज आप बोलिए, बात क्या है?”

” भावना जी मुझे दुबई जाकर कुछ साल बीत गए। लगभग 5 साल पहले मैं यहां आया था, और तब मेरी मुलाकात आपके बाबूजी से हुई थी। मुझे कहीं पर भी कम रेंट में रूम नहीं मिल रहा था। और उस वक्त आपके बाबूजी ने मेरी बहुत मदद की। उन्होंने मुझे अपने साथ रखा, मुझे दोनों टाइम खाना दिया।
    एक्चुअली मैं जिस कंपनी की जॉब के लिए यहां आया था, यहां आने के बाद पता चला वह कंपनी फोर्जरी था। उस नाम का कोई कंपनी यहां था ही नहीं।

  अब मैं आ तो चुका था, लेकिन मेरे पास वापस लौटकर  जाने के लिए भी पैसा नहीं था। मेरे नाना(पिता) ने बहुत सारा कर्जा ले रखा था। और उसे चुकाना मेरी मजबूरी थी। तब आपके बाबूजी ने मेरी बहुत हेल्प की। उन्होंने मुझे रहने को जगह दी।  और खुद जहां काम करते थे मुझे भी वहां काम पर रखवा दिया।

मैं आपके बाबूजी का यह एहसान जिंदगी भर नहीं भूल सकता। उन्होंने एक ऐसे अनजान कंट्री में मेरी मदद की जहां मेरा कोई नहीं था। मेरे पास लौटने तक को भी पैसा नहीं बचा था। महीने भर काम करने के बाद लगा कि पैसे तो यहां ठीक-ठाक कमाए जा सकते हैं। और इसीलिए मैंने दुबई में रुकने का निर्णय ले लिया। मैं तुम्हारे बाबूजी के साथ ही रहने लगा। हम दोनों साथ में ही काम करते और रहते थे। अपना सुख दुख भी हम एक दूसरे से बांटा करते थे। वह अक्सर मुझसे तुम्हारी और तुम्हारी माँ की बातें किया करते थे।

वह तुम दोनों को ही बहुत याद करते थे। लेकिन आज मैं तुम्हें बता रहा हूं कि उनके मालिक ने उनका पासपोर्ट छीन लिया था, और इसीलिए वह वापस नहीं लौट पा रहे थे।
उन्होंने कई बार कोशिश की, मालिक से अपना पासपोर्ट वापस मांगने की। लेकिन मलिक ने हमेशा टाल दिया।
दुबई में दुबई के ही बेसिक लोग इतने रईस हैं कि वह किसी के यहां नौकर का काम नहीं करते और इसलिए ज्यादातर इंडिया पाकिस्तान और बांग्लादेश से आए गरीब लोगों को वहां के स्थानीय निवासी अपने घरों पर नौकर के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। मैं और तुम्हारे बाबूजी जहां काम करते थे, वह मालिक भी बहुत बुरा इंसान था।

उसने नौकरी के वक्त मेरा भी पासपोर्ट मांगा, वह अपने पास रखना चाहता था। लेकिन तुम्हारे बाबूजी ने मुझे पहले ही इस बारे में होशियार कर दिया था और इसलिए मैं ने उन्हें अपना पासपोर्ट नहीं दिया। मुझे वहां रहते 6- 7 महीने बीते होंगे कि एक रोज तुम्हारे बाबू जी की तबीयत बहुत बिगड़ गई। मैं उन्हे तुरंत डॉक्टर के पास लेकर गया। लेकिन वहां जाने के बाद पता चला कि उनके हार्ट में प्रॉब्लम है..।
उन्होंने तुम्हारे लिए कुछ पैसा जोड़ कर रखा था, उसी पैसे से उनका ट्रीटमेंट शुरू हुआ। लेकिन वह मुझे बार-बार यह जिद कर रहे थे कि उन्हें अपना ट्रीटमेंट नहीं करवाना, क्योंकि वह रुपए उनकी बेटी की शादी के लिए उन्होंने जोड़ा है।
मैंने उन्हें बहुत समझाया लेकिन, वह मानने को तैयार ही नहीं थे। तब मैं प्रॉमिस किया कि उनकी बेटी की शादी की जिम्मेदारी मैं लेता हूं। और मैं उनकी बेटी की शादी बहुत अच्छे से करवाऊंगा।
लेकिन पहले वह यह प्रॉमिस करें कि वह अपना ट्रीटमेंट अच्छे से करवा लेंगे। हम दोनों के बीच यह वादा हुआ था और इसके बाद वह अपनी सर्जरी के लिए तैयार हो गए थे, लेकिन ओट में ले जाने के पहले ही वह नहीं रहे।

आई एम सॉरी भावना, लेकिन तुम्हारे बाबूजी को बचाया नहीं जा सका…।
दुबई में लीगल डॉक्यूमेंट बहुत ज्यादा मायने रखते हैं। उनकी बॉडी को अस्पताल से निकलवाने में ही मुझे बहुत समस्या का सामना करना पड़ा। उसके बाद तुम्हारे बाबूजी की बॉडी तो मिल गई, लेकिन उसकी हालत ऐसी नहीं थी कि उसे इंडिया भेजा जा सके। और इंडिया बॉडी भेजने के लिए भी बहुत सारे डॉक्यूमेंट्स की जरूरत थी। और उससे भी ज्यादा जरूरी बात यह थी कि तुम्हारे बाबूजी ने मुझे यह प्रॉमिस ले लिया था कि मैं उनके ना रहने की खबर फोन पर तुम्हें और तुम्हारी मां को ना दूं। क्योंकि शायद तुम्हारी मां यह धक्का सहन नहीं कर पाएगी। उन्होंने मुझसे कहा, जब भी कभी मुझे इंडिया जाने का मौका मिले, तब तुम लोगों से मिलकर ही मैं इस खबर को तुम्हें दूं। और इसके साथ ही उनके बचाए हुए पैसे और बाकी सब भी तुम्हारे हवाले कर दूं। मुझे उनका प्रॉमिस निभाना था और इसीलिए उनके ना रहने के बाद….

“एक मिनट… मतलब आप कहना चाहते हैं कि…”

कहते कहते भावना का गला रुंध गया..

कि सच में उसके बाबूजी नहीं रहे.. वो अचानक फूट फूट कर रोने लगी.. वीडियो कॉल में निनाद उसे चुप देखता रहा…
मन भर कर रो लेने के बाद जब वो शांत हुई तब उसका ध्यान गया कि मोबाइल तो अब भी चल रहा था.. निनाद चुप चाप बैठा उसे देख रहा था..

“आप ठीक हो ?” उसने धीरे से पूछा..
लेकिन उसके पूछते ही वो वापस रोने लगी….
वो फिर खामोश सा बैठा रहा..

रोते रोते भावना धीरे-धीरे कुछ बड़बड़ाती भी जा रही थी। अपने बड़बड़ाने पर ही उसका ध्यान गया और उसे अचानक लगा कि जब साढे चार साल पहले उसके पिता गुजर चुके थे तो इतने साल से हर महीने उनके लिए रूपए पैसे भेजने वाला निनाद था ?
वह आज तक अपने बाबूजी को जो भी अपनी जरूरत की बातें मैसेज किया करती थी, उन्हें पढ़कर उन समस्याओं को तुरंत निपटाने वाला निनाद था?
उसने छोटी बड़ी जानी कितनी फरमाइशे अपने पिता को भेजी थी। और उसकी हर फरमाइश, हफ्ते भर के अंदर पूरी कर देने वाला निनाद था, जबकि निनाद के खुद के ऊपर उसके पूरे परिवार की जिम्मेदारी थी। बावजूद इन सालों में भावना और उसकी मां को किसी चीज की कमी नहीं हुई।

भावना को याद आ रहा था, एक बार कॉलेज में किसी किताब की उसे बेहद जरूरत थी। जो उसके गांव में नहीं मिल रही थी। उसने अपने पिता को मैसेज में बस यही बताया था कि उसे वह किताब नहीं मिल पा रही। और वह शहर भी उस किताब को खरीदने नहीं जा सकती।

     7 दिन के अंदर अंदर उसके पास वह किताब पार्सल के रूप में पहुंच गई थी। और उसने खुशी से उस किताब को अपने सीने से लगा लिया था ।रोती-रोती भावना की हिचकियां बंध गई थी। लेकिन साथ ही यह सब भी वह सोचने को मजबूर थी।

कुछ समय पहले उसने एक बार अपने पिता को मैसेज किया था कि आजकल पैसे पूरे नहीं पङ रहे, क्योंकि उसके कॉलेज की फीस और बाकी चीजों में ज्यादा पैसे लगते हैं। उसके बाद से उनके महीने के खर्चे में 5000 और जोड़कर भेजने वाला निनाद ही था..

हे भगवान कौन था ये लड़का.. ?

क्या वाकई जैसे उसकी मां भगवान पर विश्वास करती है, और कहती हैं कि हर एक जरूरतमंद के पास भगवान किसी न किसी रूप में स्वयं पहुंच जाते हैं। तो क्या इस तरह उसके पिता के न रहने पर भगवान स्वयं निनाद का रूप लेकर आ गए।

मन में यह ख्याल आते ही उसने अपने आंसू पोछे और अपनी फोन की स्क्रीन पर देखने लगी।

वह सीधा-साधा सा सांवला, दक्षिण भारतीय लड़का अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से उसे ही भौचक सा बैठा देख रहा था। और वह गवारों की तरह अपनी नाक सुड़क कर उसके सामने स्क्रीन पर रोती जा रही थी।
कैसी तस्वीर बन गई थी, उस अनजान लड़के के सामने उसकी।
भावना ने खुद को संभाला और अपने आंसू पोंछकर उससे बात करने लगी..

” तो क्या इसका मतलब अब तक हमारे लिए जो कुछ भेजा..वो आप भेजा करते थे..?”

“हम्म.. !”

“दिवाली पर अलग से रूपये, तोहफे, नए कपड़े.. आप भेजते थे ?”

“हम्म.. !”

“हमने एक खत लिख कर भेजा था बाबूजी को.. उसका जवाब आप ने.. ?”

“हम्म… !”

निनाद अपने तरीके से हम्म.. हम्म… करता रहा और जाने उस पल में क्या हुआ,भावना के दिल का एक कोना जो अभी अभी मौत के खौफ से बच कर आने की संतुष्टि से तुष्ट था या पिता को खोने की खबर से खाली, लेकिन उस कोने में अचानक निनाद का हम्म बस गया..

उसे वो अनजान लड़का अचानक बड़ा अपना सा लगने लगा….

ऐसा उस पल में ना जाने क्या हुआ कि भावना के मन के भाव हूबहू निनाद के अंदर बहने लगे….
निनाद हालाँकि शुरू से ही भावना के स्वभाव पर मोहित हो चुका था, लेकिन उसने जब पहली बार भावना को देखा तो उस सीधी सरल सी लड़की पर खुद को हार गया था..

भावना का अपने पिता से भी कुछ मांगने में एक संकोच रहता था, और वही संकोच शायद निनाद को उसके लिए किसी भी हद तक बढ़ कर कुछ कर जाने को प्रेरित कर जाता था..

कुछ देर के लिए दोनों एक दूसरे को देखते रह गए.. वैसे देखा जाए तो दोनों एक दूसरे से बहुत अलग थे।
   भावना का सुबह की ओस सा खुला चमकीला गोरा रंग था.. उसे देख लगता था छूने से मैली हो जाएगी लङकी। वही निनाद का सांवला रंग कुछ ज्यादा ही गहरा था।
बल्कि कभी-कभार ज्यादा काम करके थकान होने पर वह घोर कृष्ण वर्णी ही दिखने लगता था।
और उसका कृष्ण वर्ण उस समय दुगुनी आभा से दमकता था, जब वो अपनी पूरी बत्तीसी दिखा कर हँस पड़ता था..।
उसकी सफेद सुच्चिकन दंतपंक्ति को देखकर यह समझना मुश्किल होता था कि उसके गहरे रंग के कारण उसके दांत ज्यादा सफेद दिख रहे हैं, या दांतों की सफेदी के कारण वह ज्यादा सांवला दिख रहा है। पर जो भी था आज दोनों एक दूसरे को मंत्र मुग्ध से देख रहे थे। दोनों का ही मन पलक झपकने का नहीं हो रहा था। कुछ देर बाद निनाद ने ही उस नीरव सी शांति को भंग कर दिया।

” हम्म… अह्ह्म्म… भावना.. मैं कुछ कहना चाहता हूँ !”

“बोलिये !”

” तुम्हारा मदर को लेकर तुम्हारे बाबूजी बहुत चिंता किया करते थे। इसलिए उन्होंने मुझे फोन पर कुछ भी बताने को मना किया था। तुमसे बस इतना रिक्वेस्ट करना चाहता हूं कि अगर हो सके तो इस वक्त उनसे कुछ मत कहना। मैं 15 दिन बाद इंडिया वापस आ रहा हूं..
पहले अपने गांव अमलापुरम जाऊंगा, वहां पेरेंट्स से मिलने के बाद तुमसे और तुम्हारी अम्मा से मिलने आऊंगा। अगर तुम्हें सही लगता है तो, उस वक्त तुम और मैं मिलकर उनसे बात कर लेंगे। तुम्हारे फादर का सारा सामान भी उसी वक्त में उन्हें हैंडोवर कर दूंगा..!”

“लेकिन.. मेरे लिए ये सब छुपाना मुश्किल होगा… !”

“ठीक है, मैं फ़ोर्स नहीं करूँगा, अब ठीक समझो तो घऱ चली जाओ.. अँधेरा हो रहा है !”

भावना ने एक ठंडी सी आह भरी और वहाँ से उठ कर घऱ चली गयी…

*****

इधर चंद्रा ने बड़े ठाकुर साहब के परिवार में फ़ोन कर के जल्द से जल्द तैयारियां शुरू करने और शादी की  रस्मे शुरू करने की बात कर ली थी.. उसके बाद से ही अखंड का पूरा परिवार धूमधाम से शादी करने के लिए तैयारियों में लग गया था..

ठाकुर परिवार में हर कोई व्यस्त था.. पूरी हवेली को दुल्हन सा सजाया जा रहा था..
हवेली की एक एक ईंट को चमकाया जा रहा था, नौकर चाकर इधर से उधर दौड़ते जितना काम कर रहे थे, उस से ज्यादा दिखाते नजर आ रहे थे….
आसपास दूर दराज़ सभी से रिश्तेदार आ चुके थे..
पूरी हवेली में रौनक हो गयी थी..
उस पूरी हवेली में अखंड के अलावा और कोई ना था जो खुश और व्यस्त ना हो..

लेकिन इस सारी रौनक और चमक दमक से कोसो दूर उस घऱ का लाड़ला राजकुमार अब भी खुद में खोया गुमसुम सा था..

शाम के वक्त अपने कमरे में वो कुछ पढ़ रहा था कि घऱ का नौकर उसके कमरे में उसके लिए चाय लिए चला आया..

ट्रे में रखी चाय उठा कर उसने होंठो से लगायी ही थी कि नीचे से उसकी दादी की पुकार सुनाई पड़ी..

“भैया जी दादी अम्मा आपको ही आवाज़ लगा रही है, तनिक सुन लेवा !”
.डरते डरते उस लड़के ने कहा और अपने हाथ की किताब एक तरफ रख चाय का प्याला हाथ में लिए अखंड बालकनी में चला आया..

“आ जा लाला, नीचे आकर चाय पी ले, हम सब के साथ.. !”

अखंड ने अपनी दादी की तरफ देखा और नीचे चला आया..

पास ही रखे मोढ़े को खींच वो अपनी दादी के पैरों के पास चुप चाप बैठ गया..

उसके बालो पर हाथ फेरती दादी चुप बैठी रही.. अखंड की माँ ने उसे एक बार देखा और अपना काम देखने लगी.. वही अखंड की चाची भी बैठी थी..
वो बोल पड़ी..

“हाय क्या किस्मत फूटी है अखंड बाबू की.. कि खुद के सामने छोटा भाई घोड़ी चढ़ जायेगा.. कल को नैकी दुल्हनिया आ जाएगी.. छोटे भाई का घऱ दूवार बस जायेगा और एक ये अइसने बैठे रह जायेंगे.. !”

दादी ने खा जाने वाली नज़र से अपनी छोटी बहु को देखा…
अखंड की माँ अपने आंसू छिपाते हुए हाथ का सामान पकड़ कर रसोई में चली गयी..

अखंड बिना कुछ कहे वापसी के लिए खड़ा हो गया..
वो अभी सीढ़ियों की तरफ बढ़ ही रहा था कि एक ज़ोर के तमाचे की आवाज़ वहाँ गूंज गयी..
और पल भर में अपने मुहं से भद्दी भद्दी गालियां निकालता हुआ वीर सिंह परिहार वहाँ दाखिल हो गया…
वीर इतना ज्यादा शराब पी कर आया था कि उससे उसका ही शरीर नहीं सम्भल रहा था, उसे संभालने के लिए एक नौकर ने उसे पकड़ा और उसके डगमगाने के कारण उस लड़के का पैर वीर के पैरों पर पड़ गया और वीर ने गुस्से में उसके मुहं पर कस कर तमाचा जड़ दिया…

वीर को गुस्सा बहुत आता था.. और उसके गुस्से से घऱ का हर नौकर कांपता था..
अभी भी खुद में बड़बड़ाते हुए वो डगमगाते कदमो से वहाँ आंगन में बैठी अपनी माँ ताई और दादी को अनदेखा करता वहाँ से सीढ़ियों की तरफ बढ़ गया..

सीढ़ियों पर पहुँच कर वो लड़खड़ा कर गिरने को था कि अखंड ने उसे थाम लिया और सहारा देकर उसके कमरे तक ले गया…

अखंड और वीर के वहाँ से जाते ही वहीँ बैठी दादी ने छोटी बहु को चीर कर रख दिया..

“देख लो बाँदा वाली, अपने लड़िका का करतूत देख लो..। जिसकी फूटी किस्मत की दुहाई देती पल भर पहले तुम रो रहीं थी ना, वो ही तुम्हारे लतखोर को संभाले ले गया है।
और देख लेना आगे भी वही इस हवेली को संभालेगा.. समझी ! इसलिए ज़रा सोच विचार कर बोला करो क्यूंकि वो ऊपर वाला यही सब का न्याय कर जाता है.. ।

क्रमशः

aparna…

5 2 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Newest
Oldest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments