अपराजिता -50

अपराजिता -50

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मजिस्ट्रेट सर के पास उन दोनों ने आवेदन दे दिया..
लेकिन चूंकि ये आवेदन ही ऐसे का ऐसा अख़बार में छापना था, इसलिए कुसुम राजेंद्र और भावना ने यही सोचा की नाम भावना का लिखवा देंगे..

इसलिए वहाँ आवेदन में कुसुम कुमारी जो भावना नाम से जानी जाती है ने राजेंद्र पिता चरण दास के साथ विवाह प्रस्तावित किया है…

ऐसा आवेदन डाल दिया!!!

दोनों ने ऐसा कर तो दिया था, लेकिन ये नहीं सोच पाए की बिना असली परिचय पत्र के सारा काम निरर्थक है, और नाम दर्ज़ करवाते समय भावना का परिचय पत्र ही देखा गया था….

ये काम करवा के दोनों वापस लौट गए…

राजेंद्र वापस सरना के घर चला गया और भावना अपने घर ..
लेकिन भावना ऊपर से जितनी भी शांत संयत नज़र आ रही हो, अंदर से उसके अंदर एक खलबली मची हुई थी..।
उसे लग रहा था पिछले कुछ दिनों से उसके साथ जैसे कुछ अच्छा हो ही नही रहा..।
वो अपने अंदर की सारी पीड़ा को बहा देना चाहती थी.. किसी के गले से लग कर सब कुछ कह देना चाहती थी, लेकिन कहे किससे..?

क्यूंकि उसकी एकमात्र परमप्रिय सखी के घर से ही उसे ये सारी लानतें मिली थी..
चंद्रा की पत्नी और माँ भावना के सामने हाथ जोड़ कर माफ़ी मांग चुके थे, बावजूद भावना चंद्रा को माफ़ नहीं कर पा रही थी..

रह रह कर उसके दिमाग में वहीं सब घूमने लगता था जब चंद्रा ने उसके बाल पकड़ कर उसे खींच कर ज़मीन पर गिरा दिया था..
उसका दुपट्टा दूसरी तरफ गिर गया था, और उसकी परवाह किये बिना चंद्रा अपने गुंडों से उसकी पिटाई करवा रहा था..
कैसा निर्मम हो गया था वो उस क्षण…?

अपने घर बचपन से आने जाने वाली कन्या को जिसे कई बार बचपन में लाड़ से वो चिढ़ाया भी करता था, पर आज कैसे इतना गुस्सा निकाल दिया.. ?

तो क्या वो सब दिखावा छलावा मात्र था….
उसके दिमाग से चंद्रा निकल ही नहीं पा रहा था, और सबसे बड़े दुःख की बात ये थी कि वो अपना दुःख किसी के साथ बाँट भी नही सकती थी…

उसी समय उसका फ़ोन बजने लगा.. दुबई से फ़ोन आ रहा था, उसने उठा लिया..

“निनाद बोल रहा हूँ !”

“हम्म… बाबूजी कहाँ है ?”

“काम पर थे, अब तक वापस नहीं लौटे ?”

“फिर.. मुझे आपने फ़ोन क्यूँ किया, वो भी बाबूजी के नंबर से ?”

“आपके बाबूजी ने आपके लिए कुछ कैश भेजा है, मुझे बोला था, आपको बताने के लिए.. इसलिए मैंने फ़ोन किया..
मैं मेरे नंबर से करने से आप फ़ोन नहीं उठाएंगी, ये सोच कर उन्हीं के नंबर से किया..।
हमारे यहाँ काम पर मोबाइल ले जाने की अनुमति नहीं है.. इसलिए हम दोनों लोग मोबाइल घर पर छोड़ कर जाते हैं !”

“आप आज काम पर नही गए ?”..

“तबियत सही नही था !”

“क्या हुआ ?”

“थोड़ा सर्दी जैसा था और फीवर भी !”

“दवा ली आपने ?”

“नहीं… अभी मार्केट से लाना पड़ेगा.. !”

“तो किसका इंतज़ार है.. ले आइये ना !”

“हम्म… जाऊंगा !”

भावना को आवाज़ से उसकी थकान का आभास हो रहा था..

“आपको शायद बुखार के कारण मन नहीं होगा, बाबूजी से कह कर मंगवा लीजिये !”

“हम्म.. !”

उधर से सामने वाले ने बस हम्म कहा लेकिन भावना को उसके पीछे दबी सी मुस्कुराहट जाने कैसे सुनाई दे गयी..
भावना के चेहरे पर के कठोर भाव भी बदलने लगे..

“कुछ खाया है आपने निनाद ?”

“अभी बनाने की हिम्मत नही है.. !”

“ऐसे भूखे रहने पर तो तबियत और बिगड़ेगी.. कुछ मंगवा ही लीजिये !”

“यहाँ सब इतना आसान नहीं है….  बाहर से मंगवाना मुश्किल है, लेकिन कुछ बना लेता हूँ !”

“हाँ… बना लीजिये.. खाली पेट मत रहिये प्लीज़ !”

“हम्म… !” एक बार फिर वो सिर्फ हम्म गुनगुना कर रह गया…

उसके बोलने का तरीका ठेठ दक्षिण भारतीय नहीं था..
वो काफी साफ हिंदी बोलता था, एकदम गहरी गंभीर सी आवाज़ में वो सिर्फ उतना ही बोलता जितनी काम की बातें होती थी…

दोनों कुछ देर के लिए चुप रह गए.. लेकिन आज भावना के दिल के खालीपन को भरने के लिए उसे किसी के सहारे की बेहद ज़रूरत थी..

“आपके घर में कौन कौन है निनाद ?”

“अम्मा है, नाना(पिता ) है !”

“नाना.. ? और तुम्हारे बाबूजी ?”

“हमारे में फादर को नाना बुलाते ! जैसे तुम बाबूजी बुलाती हो.. !”

“ओह्ह अच्छा !और कोई.. भाई बहन ?”

“नो सिब्लिंग्स ! आई एम द ओनली चाइल्ड !”

“हम्म… अकेले हो, फिर इतना दूर कैसे चले गए.. ? हमारा मतलब क्यूँ चले गए ?”

“नाना के खेत हैं, ख़ूब सारा ..
उनका चार सिस्टर है, उनके नाना बहुत पहले ऑफ़ हो गए थे! नाना के ऊपर ही सारा रिस्पॉन्सिबिलिटी था, चार सिस्टर्स का शादी करना, सबको सेटल करना.. इसके लिए उन्हें ख़ूब सारा कर्ज़ा लेना पड़ा… इंटरस्ट ही इतना ज्यादा था कि उसे चुकाने में ही हालत ख़राब हो रहा था..
उसके बाद नाना के अंकल लोगों ने प्रॉपर्टी डिस्प्यूट खड़ा कर दिया..।
प्रॉपर्टी का बंटवारा हुआ और नाना के हिस्से बहुत कम खेत बचा..।
जबकि पहले भी नाना खेत से होने वाले मुनाफे को अंकल लोगों से भी शेयर करता था, बावजूद वो लोग बंटवारा करवा दिये..।
फिर थोड़ा सा खेत बचा और ढ़ेर सारा कर्ज़ा !!
मैं इंजीनियरिंग कर के आया, मेरा नौकरी भी लग गया..
लेकिन उसी समय यहाँ दुबई का नौकरी का ऑफर लेटर आ गया, यहाँ पैसा ज्यादा था तो मैं यहाँ आ गया..।
अब पांच साल से कर्ज़ा चुका रहा हूँ.. !”

‘”हम्म…. !” अबकी बार अनजाने ही भावना के मुहँ से भी बिल्कुल निनाद की तरह हम्म निकला और वो खुद हॅंस पड़ी..

“क्या हुआ ?” निनाद ने पूछ लिया और भावना को समझ में आया कि वो बेचारा अपनी रामकहानी सुना रहा था और भावना खुद की सोच कर हॅंस पड़ी, पता नहीं बेचारा क्या सोचता होगा.. !

“ना नहीं.. कुछ नहीं.. हम बस कुछ सोच रहे थे !”

“हम्म !” एक बार फिर निनाद का गहरा सा हम्म भावना के चेहरे पर मुस्कान ले आया..

पैसे देख कर मेसेज कर देना बोल कर उस गंभीर से युवक ने फ़ोन रख दिया..

कुछ देर को ही सही उससे बात कर भावना अपने तप्त ह्रदय की जलन को भूल कर रह गयी…।
उसने देखा पैसे आ चुके थे..।
उसने अपने बाबूजी के नंबर पर पैसे आ गए है, का मेसेज कर दिया..

****

राजेंद्र अगले ही दिन शहर के लिए निकल गया.. अगर एक महीने बाद उसे कुसुम से शादी करनी थी, तो उसके हिसाब से उसे तैयारियां भी करनी थी..
अपने ट्रांसफर के लिए तो उसने अर्जी पहले ही लगा रखी थी, अब उसके लिए सबसे जरुरी था कुसुम के रहने लायक घर ढूँढना..।

राजेंद्र शहर के जिला अस्पताल पहुँच गया.. वहाँ उसके साथ के कुछ डॉक्टर्स काम करते थे..।
वहाँ पहुँच कर उसने अपने दोस्त को फ़ोन मिला दिया और कुछ देर में ही उसका दोस्त अनिल उससे मिलने चला आया..।

“अरे कैसा है भाई, राजी ?”

“बस भाई.. सब बढ़िया ! यहीं जिला चिकित्सालय आने के लिए आवेदन दे दिया है !”

“मैंने तो यार पहले ही बोला था, कि यहीं नौकरी करो, पर तुम्हारे ऊपर ही गाँव खेड़े में जाकर काम करने की ललक थी, तुम ही आज़ाद भारत के शूरवीर बने बैठे थे..।
गाँव में रह कर आटा दाल के भाव मालूम चल गए ना ?”

“हाँ भाई, तभी तो वापस आना चाहता हूँ.. ! अच्छा सुन ना एक ढंग का घर देखना है !”

“क्यूँ… डॉक्टर्स कॉलोनी में नहीं रहना क्या ?”

“यहाँ जूनियर डॉक्टर्स को घर मिल जायेगा ?”

“अबे… कर दी ना छोटी बात.. जब तक तेरा दोस्त अनिल ज़िंदा है, तुझे ये सब सोचने की ज़रूरत ही नहीं..।
अभी पंडित जी से बात करता हूँ.. वही इस अस्पताल के एडमिन हैं.. घर द्वार कॉलोनी भी वही देखते हैं !”

“पंडित जी माने.. ?”

“अबे अवस्थी की बात कर रहा हूँ बे.. वो कुछ ना कुछ जुगाड़ लगा ही देगा.. ! आ चल मिल लेते हैं !”

अनिल राजेंद्र को साथ लिए अंदर बढ़ गया..
कुछ देर में वो दोनों एडमिन ऑफ़िस में थे..
सामने पान चबाते बैठे सज्जन किसी फाइल में आंखें गड़ाए हुए थे..

“राम राम पंडित जी कइसन बा ?”

“बढ़िया हैं डाक्टर साहब.. आप सुनाये ?”

“ये हमारे दोस्त है राजेंद्र बाबू.. इनके लाने मकान चाहिए था !”

“कहाँ पोस्टिंग है ?”

“अभी तो दूर्वागंज से आ रहे, लेकिन यहाँ के लिए ट्रांसफर आवेदन दे दिये है !”

“कब दिये आवेदन ?”

“महीना भर हो गया… पंद्रह बीस दिन में ऑर्डर निकल आएगा.. !”

“हम्म… दो बेडरूम हाल किचन वाला मिलेगा डाक्टर बाबू… फिर परमोसन के बाद तीन बैडरूम वाला मिल जायेगा.. !”

“हाँ चलेगा अवस्थी बाबू !”

अनिल ने लपक कर कहा.. राजेंद्र चुप अपनी ही दुनिया में खोया सा खड़ा था..

अवस्थी ने पान की जुगाली सी करते हुए एक नज़र राजेंद्र पर डाली और कुछ कागज़ पत्तर निकाल कर भरने लगा..
वो कागज़ भर कर उसने अनिल के सामने कर दिआ..

“ये भर कर दे दीजिये.. हम अर्ज़ी ऊपर तक लगा देते हैं.. पूरा प्रयास रहेगा कि इन्हें घर मिल जाये.. बस जरा हमारा चाय पानी देख लीजियेगा.. !”

“ये भी कोई कहने की बात है पंडित जी.. आपके दर्शन को आये और भेंट ना चढ़ाये तो हम डाक्टर किस काम के.. !”

पांच सौ की एक करारी पत्ती अवस्थी की जेब में ठूंस कर अनिल राजेंद्र को लेकर वहाँ से निकल गया..

दोनों वहाँ से निकल कर कैंटीन में पहुँच गए..
अनिल ने चाय समोसो का ऑर्डर दे दिया और अवस्थी के दिये फार्म को भरने लगा…

“कितने लोग रहोगे घर में ?”

उसने राजेंद्र को देख कर पूछा..

“तू तो अकेला ही है ?”

“तेरी भाभी को लेकर आने वाला हूँ, इसलिए घर ले रहा हूँ !”

राजेंद्र के ऐसा बोलते ही अनिल उछल पड़ा..

“साले कुत्ते असली बात अब बता रहा है.. फार्म में भरना नहीं होता और मैं पूछता नहीं तो साले कमीने तू असली  बात गप कर जाता…..!

अनिल की चपलता राजेंद्र को भी गुदगुदा गयी…
उसे कुसुम की याद आ गयी..
कैसी बिंदास लड़की थी वो..
जब तक वो उससे दूर भागने की कोशिश करता रहा वो किसी ना किसी बहाने उसकी क्लिनिक पर आ धमकती थी, और जिस दिन उसने खुद ने इज़हार किया उस दिन से कुसुम के दर्शन दुर्लभ हो गए..

वो कुसुम से मिलने को बेकरार हो बैठा..
कुसुम को भर नज़र देखने को, उसे छूने को उसे अपने सीने से लगा लेने को वो कलप उठा..
उसे किसी भी कीमत पर कुसुम चाहिए थी… वो भी अभी..

वो वहाँ से उठा और बाहर की तरफ जाते हुए उसने कुसुम को फ़ोन लगा लिया…

“कुसुम… !”

राजेंद्र की पिघली सी आवाज़ कुसुम को भी पिघला गयी..

“कैसे हैं आप डाक साब !”

“तुमसे मिलना है.. अभी !”

“लेकिन अभी कैसे.. यहाँ सब हैं घर पे.. !”

“मुझे नहीं पता.. कैसे भी करो, कुछ भी करो.. बस मिलने आ जाओ !”

“कहाँ है आप ?”

“मैं जहाँ भी हूँ, तुम जहाँ बोलोगी आ जाऊंगा.. मुझे अभी तुमसे मिलना है वरना पागल हो जाऊंगा.. !”

कुसुम के चेहरे पर लाज भरी मुस्कान आ गयी..

“आपकी क्लिनिक पर पहुँचती हूँ, आधे घंटे में !”

“हम्म… मैं भी पहुँच जाऊंगा !” राजेंद्र ने फ़ोन रखा और एक बार अनिल के गले से लग कर अपनी बाइक तेज़ी से गाँव की तरफ घूमा ली उसने…


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