अपराजिता -47
इन सब परेशानियों में रेशम के पिता के सीने में दर्द उठने लगा था..
दर्द की लहर ऐसी तेज़ हुई कि वो सोफे पर निढाल हो गए.. ।
मानव ने तुरंत गाड़ी निकाली और रेशम और उसकी माँ की सहायता से उन्हें लेकर अस्पताल की तरफ निकल गया…
अस्पताल पहुँचने में उन्हें देर नहीं हुई.. डॉक्टर्स ने तुरंत इमरजेंसी में उन्हें भरती किया और उनकी जाँच की प्रक्रिया के साथ ही उनका इलाज भी शुरू हो गया..
आनन फानन में शुरू हुआ इंजेक्शंस और दवाओं का दौर लगभग आधे घंटे बाद विश्रांति पा गया..!
अब तक रेशम के पिता को होश भी आ गया था और उन्हें अपनी पीड़ा में भी आराम था.. !
रेशम डॉक्टर के पास पहुँच गयी….
“डॉक्टर साहब ये हार्ट अटैक तो नहीं था ना ?”
डॉक्टर ने रेशम की तरफ देखा और वापस रोगी रजिस्टर भरते हुए जवाब देने लगा..
“आप के सोच भर लेने से अटैक नहीं हो जायेगा क्या ? कार्डियक अरेस्ट ही है वो भी मेसिव !”
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“ओह्ह लेकिन… पापा को पहले कभी तकलीफ नहीं हुई.. !”
“मैडम अटैक बता कर नहीं आता.. ब्लॉकेज रहा ही होगा, कोई स्ट्रेस वाली बात होने से ट्रिगर हो गया.. !”
“ओह्ह.. हम्म हो सकता है !”
” जब तक एंजियोग्राफी नहीं होगी तब तक ब्लॉकेज का परसेंटेज पता नहीं चलेगा! आप लोग जल्द से जल्द एंजियोग्राफी करवा लीजिए, और मेरी तो सलाह है कि अगर ब्लॉकेज निकले तो आप एंजियोप्लास्टी भी करवा लीजिए!
इसके साथ ही यह ध्यान रखने की कोशिश कीजिए कि अब उनके सामने कोई भी, किसी तरह की स्ट्रेस वाली बात ना हो! इनके लिए चिंता और तनाव जानलेवा हो सकता है.. !”
“जी.. !”
रेशम से और ज्यादा कुछ भी कहा नहीं गया! उसके ठीक पीछे खड़े मानव ने रेशम के कंधों पर हाथ रख कर धीरे से दबा दिया। जैसे उसे यह एहसास दिला रहा हो कि हमें इस बात का ध्यान रखना है।
कुछ देर बाद ही उन लोगों को उनके पिता से मिलने की इजाजत मिल गई।
मानव और रेशम ने अपनी मां को भी डॉक्टर की कही बात समझा दी थी। इसलिए अपने आंसू पोंछ कर रेशम की मां भी हंसती मुस्कुराती हुई ही अपने पतिदेव के सामने गई, और उनका हालचाल पूछने लगी।
अस्पताल में भर्ती रहते हुए 2 दिन बीत गए..
रेशम के पिता की हालत में सुधार होते ही उनकी एंजियोग्राफी और उसके बाद एंजियोप्लास्टी कर दी गई। लगभग हफ्ते भर अस्पताल में बिताकर रेशम और मानव अपने माता-पिता के साथ घर लौट आए।
लेकिन इन 7 दिनों में रेशम ने अपने आप को पूरी तरह से तैयार कर लिया कि वह अखंड से जुड़ी कोई भी बात अपने माता-पिता से नहीं कहेगी और ना ही अपने स्वभाव या बर्ताव में किसी तरह का परिवर्तन आने देगी। जिससे उसके माता-पिता को ठेस पहुंचे।
और बस इसीलिए इन 7 दिनों में अपने सारे आंसू, सारे दुख उसने जैसे मिट्टी खोदकर अंदर दबा दिए थे ।
अपने मन की गहन कंदराओं में उसने अपने सारे आंसू सुखा दिए थे।
ऊपर से वह बिल्कुल सामान्य रेशम बन गई थी। हंसने खिलखिलाने वाली।
एक बार उसके पिता ने उसे पास बुलाकर अखंड के बारे में पूछा भी रेशम ने मुस्कुरा कर बस इतना ही कहा..
” कोई छात्र नेता था पापा। मैं खुद उसे नहीं जानती।
एक दो बार मेरे पीछे पीछे आया और मैंने जरा उसे डांट दिया। मुझे नहीं पता कि था कि वह घर तक पहुंच जाएगा। इससे ज्यादा कोई बात नहीं है। और अब तो मानव भाई ने भी उसकी ऐसी जमकर पिटाई की है कि वह मेरे सामने आने की कभी हिम्मत ही नहीं करेगा.. !”
अपने माता-पिता के सामने रेशम बिल्कुल वही चुलबुली सी नाजुक चिरैया बन गई जो अपने मायके की देहरी और आंगन में उछलती फिरती थी।
उसकी शरारतों, उसकी हंसी से एक बार फिर उनका घर खिलखिला उठा था।
और उसके पिता को पूरी तसल्ली हो गई थी कि रेशम को वापस यूनिवर्सिटी भेजा जा सकता है। रेशम की मां ने अकेले में एक बार उससे बात करने की कोशिश भी की, लेकिन रेशम जानती थी कि अगर वह अपनी मां से अपने दिल की बात कह भी देगी तो उसकी मां उसके पापा तक बात पहुंचाने में चुकेंगी नहीं और इसलिए रेशम ने उन्हें भी अपनी झूठी मुस्कानों से मोहित कर लिया।
घर भर में एक मानव ही था जो जानता था कि रेशम के दिल में इस वक्त क्या चल रहा है। लेकिन एक अंतर तो यहां पर भी था ना!
आखिर रेशम एक लड़की थी, जिस पर यह सब कुछ बीता था।
वह अब अपने कमरे में अकेले सोने में घबराने लगी थी, लेकिन इस बात को उसने घर पर किसी से कहा नहीं।
अपने कमरे का दरवाजा बंद करके वह बत्ती बिना बुझाए सोया करती थी। अंधेरे से उसे डर लगने लगा था। यहां तक कि टीवी पर चलता हुआ कोई ऐसा सीन जिसमें किसी लड़की को कुछ लड़के मिलकर परेशान कर रहे हैं, या उसकी अस्मत पर डाका डालने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे सीन देखते ही उसकी घबराहट शुरू हो जाती थी।
उसे सांस लेने में दिक्कत होने लगती थी।
और एक बार फिर उसे लाइब्रेरी के पीछे वाला स्टोर रूम का अंधेरा घुटन भरा कोना याद आने लगता था। उसके आसपास वही गुटके और भद्दे से परफ्यूम की मिली जुली गंध घूमने लगती थी। और इसके साथ ही घूमने लगता था उसका सर।
और अक्सर ऐसे सीन आने पर टीवी या तो बंद कर दिया करती या फिर किसी बहाने से वहां से उठकर चली जाया करती थी वो..।
रेशम ने खुद को यह बात अच्छे से समझा दी थी कि उसे पूरी दुनिया के सामने ऐसे ही नजरा आना है, जैसे वह बिल्कुल एक सामान्य सी लड़की है, और उसके साथ कुछ भी गलत नहीं हुआ ।
वैसे भी उसकी क्लास में पूर्वा के अलावा किसी को भी नहीं पता था कि रेशम के साथ क्या हुआ? यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर,डीन और पुलिस के हस्तक्षेप के कारण रेशम का नाम कहीं पर भी सामने नहीं आया था। यूनिवर्सिटी में यह बात जरूर फैल गई थी कि किसी लड़की के साथ अखंड परिहार ने बहुत गलत किया है, लेकिन वह लड़की कौन है, यह कोई भी नहीं जान पाया था। यही हाल मेडिकल कॉलेज का भी था। मेडिकल कॉलेज में यह बात तो फैल चुकी थी की फर्स्ट ईयर की किसी लड़की के साथ कोई हादसा हुआ है।
लेकिन वह हादसा क्या है और उसमें सन्लिप्त नाम कौन-कौन से हैं, यह किसी छात्र को मालूम नहीं चल पाया…।
पूर्वा और रेशम के साथ रहने वाले जिन दोस्तों को थोड़ा बहुत भी अंदाजा था कि यह दुर्घटना रेशम के साथ हो सकती है, उन्हें भी रेशम का खुशनुमा व्यवहार देखकर अपनी शंकाओं पर संदेह होने लगा था।
और बीतते हुए वक्त के साथ यह हादसा मेडिकल कॉलेज के लिए सिर्फ एक खबर बनकर रह गया।
रेशम के ऊपर बीती थी और इसलिए उसकी जिंदगी का वह मनहूस दिन उसकी यादों में एक काला अध्याय लिख कर चला गया !
अपनी बुरी यादों के जंगल को वह पीछे छोड़ कर आगे बढ़ गई थी। उसने प्रथम वर्ष के इम्तिहान बहुत अच्छे नंबरों से तो नहीं लेकिन सामान्य नंबरों से पास कर लिए। लेकिन द्वितीय वर्ष में उसने शुरू से बेहद मेहनत की और इसका नतीजा यह निकला कि दूसरे साल के इम्तिहान में उसने अपनी क्लास में दूसरा स्थान पा लिया।
इंटरनल एग्जाम में भी उसे अच्छे नंबर मिलते रहे।और फाइनल प्रॉफ के इम्तिहान में उसने टॉप किया। औब्स एंड गायनी विषय में उसे गोल्ड मेडल भी मिला।
और इन सारी सफलताओं के साथ साथ प्रथम वर्ष का वो बीता हुआ मनहूस दिन एक काला सा अध्याय बनकर कही पीछे रह गया…।
उस वक्त अपने दर्द को उसने इतनी बुरी तरीके से अपने अंदर दबा लिया कि उसे खुद मालूम नहीं चला कि उसका वो बेहिसाब अनकहा, अनछलका दर्द बाहर निकले बिना अंदर ही अंदर पककर नासूर बन गया था ।
जब तक रेशम की शादी नहीं हुई और अथर्व ने उसे छुआ नहीं उस दिन तक भी रेशम को आभास नहीं था कि उस बुरी याद के कांटो में वो अब तक कितनी बुरी तरह उलझी जकड़ी हुई है…
अथर्व से रिश्ता जुड़ने के बाद वो खुश थी क्योंकि अथर्व को कॉलेज के दिनों से जानती थी..
कॉलेज के दिनों में जूनियर लड़कियों के लिए अथर्व एप्पल ऑफ द आई था। बिल्कुल गरम प्लेट में रखी हॉट चॉकलेट केक का वो टुकड़ा था जिसे देखकर ही लड़कियां मुंह में रख लेने को आतुर हो उठती थी…. ।
ऐसे लड़के से रिश्ता जुड़ना अपने आप में किस्मत की बात थी और फिर दोनों एक ही प्रोफेशन में भी थे।
इससे बढ़कर अच्छी बात रेशम के लिए और क्या हो सकती थी? लेकिन अपनी इस सुख भरी कल्पनाओं में खोई रेशम जब अपने नए-नए शादी के बंधन में बंधी 1-1 रस्म निभाते सुहागरात की रस्म तक पहुंची।
तब उसे एक बार फिर वही दिन, वही लाइब्रेरी के पीछे का स्टोर रूम वहीं अंधेरा, वही गंध,और वही अखंड परिहार याद आ गया था…..।
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भावना ने बड़ी चतुराई से चंद्रा भैया के दिमाग में यह बात बैठा दी कि डॉक्टर राजेंद्र और कुसुम कुमारी के बीच में कोई भी ऐसी वैसी बात नहीं है। कुसुम को लगा भावना ऐसा करके शायद उसे भी यही सलाह देगी कि अब वो राजेंद्र को भूल जाए। लेकिन उसकी सोच के विपरीत जब उसकी मां और भाभी भावना के लिए चाय नाश्ते का इंतजाम करने चले गए, तब भावना ने उठकर कमरे का दरवाजा बंद कर दिया और कुसुम के दोनों हाथ थाम कर उसके सामने बैठ गई..
” कुसुम हमारी बात ध्यान से सुनो। अब तुम्हें यह तो समझ में आ ही गया है कि तुम्हारे चंद्रा भैया तुम्हारे लिए कुछ नहीं करने वाले हैं। बल्कि अगर तुम उनसे कहोगी ना कि तुम डॉक्टर साहब से प्यार करती हो तो, तलवार से तुम्हारे डॉक्टर साहब का गला कलम करने में उन्हें जरा भी संकोच नहीं होगा। नमूना तुम देखी चुकी हो..!”
“तो अब क्या करें.. तुम ही बताओ ?”
” सबसे पहले तो यह तय कर लो कि, तुम दोनों साथ रहना चाहते भी हो या नहीं?
तुम कितना प्यार करती हो डॉक्टर साहब से? क्या उन्हें भूल कर जिंदा रह पाओगी..?”
” पता नहीं भावना हम उनसे कितना प्यार करते हैं? हमें यह भी नहीं पता कि हम सच में प्यार करते हैं या नहीं? लेकिन अगर कल्पना भी करें ना कि उनके बिना हमें जीना पड़ेगा। किसी और से शादी करनी पड़ेगी, तो लगता है जैसे हम जी नहीं पाएंगे..!”
“तो फिर तुम्हारे पास दो ही रास्ते बचते हैं। या तो आत्महत्या कर लो और या फिर डॉक्टर साहब के साथ कोर्ट मैरिज कर लो..!”
कुसुम एकदम चौक कर आंखें फाङे भावना की तरफ देखने लगी।
भावना जैसी शांत, संयत,बुद्धिमती, विदुषी और हद दर्जे की समझदार लड़की से ऐसी किसी बात की उम्मीद कुसुम को नहीं थी..
“क्या कह रही हो भावी ?”
“सही कह रहें हैं कुसुम !
हम अभी ऊपर आ रहे थे तब देखा कि हमारे फूफाजी नीचे पतरा बिछाए बैठे थे। तुम्हारे बाबूजी भी वही ओसारे में बैठे थे। पंडित जी ने ठीक 1 महीने बाद की तारीख निकाल दी है। और तुम्हारे बाबू जी तुम्हारे होने वाले ससुरालियों को फोन मिला रहे थे, तैयारियों के लिए..।
हमें देखकर तुम्हारी अम्मा और भाभी हमारे साथ ऊपर चली आई और उसके बाद हमें यहां बैठा कर जाते वक्त क्या कह गई, तुमने सुना नहीं क्या..?”
“क्या ?”
” यही की तुम बैठो भावना हम तुम्हें शादी की तैयारी वाले लड्डू खिलाते हैं..।
कहां खोई हुई हो कुसुम? अभी 4 दिन पहले ही डॉक्टर साहब के साथ जब तुम वहां टपरी में पकड़ी गई थी, तब तुम्हारे इन्ही भैया ने पीट-पीटकर हमारी और डॉक्टर साहब की हालत खराब कर दी थी। कल ही तुम्हारी भाभी हमारे हाथ पैर जोड़कर तुम्हारे घर लेकर आई और हमने चंद्रा भैया से साफ साफ कहा भी कि तुम्हारा और डॉक्टर साहब का कोई चक्कर नहीं चल रहा।
और देखो आज उन्होंने फूफा जी को बुलाकर तुम्हारी शादी की तारीख भी निकलवा दी।
अब इसी से समझ में आ रहा है कि चंद्रा भैया को भले ही हमारी बात पर विश्वास हो गया हो, लेकिन अब वह तुम्हारे मामले में कोई रिस्क नहीं लेना चाहते..!”
“तो तुम क्या कहना चाहती हो, हम घर छोड़कर भाग जाए?”
” तुम्हारे पास इससे बेहतर आईडिया हो तो वह कर लो! हम तो तुम्हारी सखी है, हर हाल में आंख मूंदकर तुम्हारा साथ देंगे। तुम कुआं में भी कूद ने जाओगी ना तो, हम भी तुम्हारे साथ साझा कर कूद जाएंगे।
इसलिए कह रहे हैं उस यज्ञ परिहार से तुम्हारी शादी हो जाए तो तुम्हें ससुराल जाकर अपनी शादी के जोड़े को गले में डालकर फंदे पर लटकना पड़ेगा।
इससे बेहतर है कि शादी के पहले पहले डॉक्टर साहब का हाथ पकड़ो और यहां से भाग कर तुम कहीं चली जाओ, जहां तुम्हारे चंद्रा भैया के हाथ ना पहुंच सके..!”
” कोर्ट मैरिज के लिए तो महीना भर पहले आवेदन देना पड़ता है ना भावी ..!”
“हाँ.. अगर तुम तैयार हो तो हम तुम्हारे डॉक्टर साहब के साथ जाकर कोर्ट में आवेदन डाल देंगे।
और सिर्फ महीना भर पहले कोर्ट में आवेदन नहीं डलता उस आवेदन को वहां बैठा मजिस्ट्रेट अखबार में इश्तहार के तौर पर छपवाता भी है। जिससे अगर किसी जान पहचान में रिश्तेदार को आपत्ति हो तो वह आकर उस आपत्ति को बकायदा दर्ज करवा सकें,और शादी रुकवा सके !”
“हे राम.. फिर ? कैसे करेंगे हम.. भैया को मालूम चल गया तो ?”
” हम कोशिश करेंगे कि मजिस्ट्रेट साहब के इश्तेहार वाले दिन का हमें पता चल जाए और उस दिन गांव भर के अखबारों में से या तो वह पन्ना गायब करना पड़ेगा, और या फिर गांव भर में उस दिन अखबार ही नहीं डालेगा..।
कुसुम कुमारी जी वैसे भी हमारे गांव में मुश्किल से 10 12 घर होंगे जहां अखबार आता है। जिनमें से एक तो तुम्हारा ही घर है। और दूसरा हमारा घर है। तीसरा हमारे फूफा जी का घर है। चौथा तुम्हारे डॉक्टर साहब का घर, और पांचवा उनकी डिस्पेंसरी है।
बाकी के बचे और 5 घर तो, वह हम देख लेंगे। तुम चिंता मत करो…।”
कुसुम ने आगे बढ़कर भावना को अपनी बाहों में भर लिया…
“भावना…. हम तुम्हारा ये एहसान… कैसे.. !
कुसुम भावुकता में अपनी बात पूरी नहीं कर पायी और उसके आँसू बहने लगे.. कुसुम जैसी धाकड़ लड़की की ऑंख से इतनी आसानी से आँसू नहीं बहते थे, उसका रोना मतलब ज़रूर कोई बड़ी बात होती थी..।
आज उसकी बालसखा का स्नेह उसके अंतरतम को छू गया था..
उफ़ क्या कोई उससे इतना भी प्यार कर सकता है कि खुद की जान की परवाह किये बिना ये लड़की इतना बड़ा काज करने की सोच बैठी..?
इसीलिए आज उसकी भावुकता का वारापार ना था.. ।
लेकिन भावना आज स्थिर थी, शांत थी..
जैसे कोई गहरा समंदर…।
जबकि वो परले दर्जे की भावुक थी..।
कोई ज़रा सी बात हो उसके आँसू पहले बहने लगते थे..।
लेकिन आज उसके आँसू सूखे हुए थे..
क्यूंकि आज उसने अपनी सखी को जो सलाह दी थी उसमें उसने एक तीर से दो निशाने साधे थे..।
भावना का दिमाग दसो दिशाओं में दौड़ता था.. !
हालाँकि आज भी उसने जो निर्णय लिया था उसमें उसकी स्वयं की कोई स्वार्थ सिद्धि नहीं थी..!
था बस अपनी सखी के लिए अगाध स्नेह और उसके भाई के लिए अटूट घृणा!
पहला वो जानती थी कुसुम राजेंद्र के बिना जी नहीं सकती और इसलिए दोनों का वहाँ से भाग जाना ही सर्वोचित था..!
दूसरा कुसुम के भाग जाने पर उसके चंद्रा भैया की जो गर्दन और नजरें नीची झुकनी थी, उन्हें वो अपनी आँखों से देखना चाहती थी..
शायद यहीं चंद्रा भैया के थप्पड़ का प्रतिशोध था..
क्रमशः
aparna…
