अपराजिता -45

अपराजिता -45

सुजाता के साथ जाती भावना के मन में यही चल रहा था की अब उसके बाबूजी उसे कौन सी बात बताना चाहते हैं…।
दूसरी तरफ चंद्रा भैया के आदमियों से इतना पिटने के बाद उसका कुसुम के घर जाने का भी कोई ख़ास मन नहीं था, लेकिन सुजाता के बार बार मनाने पर आखिर वो जाने को तैयार हो गयी थी….

लेकिन कुसुम के घर पहुंचते हैं उसकी हर शंका निर्मूल साबित हो गई भावना अपने आपको तैयार करते हुए ही गई थी कि, अगर उससे घर के लोगों ने किसी भी तरह का वाद विवाद  किया तो, वह वहां से भागकर निकल आएगी | लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ उसे देखते ही भावना की तरफ बढ़कर कुसुम की मां ने सबसे पहले उसे अपने गले से लगा लिया, और अपने आंसू पोंछने  लगी!
    उनकी ममता की छांव में भावना भी सिसक उठी।
चंद्रा भैया वहां मौजूद नहीं थे, लेकिन घर की दोनों महिलाओं ने भावना को कुर्सी पर बैठा कर उससे हाथ जोड़कर माफी मांग ली।
ठाकुरों का घर था, उनके यहां वैसे भी पुरानी रीतियों का प्रचलन था।
और इसीलिए ब्राह्मणों का कुछ ज्यादा ही आदर सत्कार होता था! कुसुम की मां के मन में तो यही बात बैठ गई थी कि ब्राह्मण कुमारी पर उसके बेटे ने हाथ छोड़ दिया था।
और इसीलिए उन्होंने सुजाता को भेजकर चंद्रा को भी वहां बुला लिया। चंद्रा बाहर गुस्से में जरूर था, लेकिन अंदर आकर भावना के सामने, उसके मासूम चेहरे को देखकर वह भी थोड़ा नरम पड़ गया..!
बचपन से अपने घर पर कुसुम की तरह हंसती खेलती भावना को उसने देखा था, वो उसे भी बहन ही मानता था।  वो तो गुस्से में उसका मिजाज ऐसा उखड़ा कि उसने भावना पर हाथ छोड़ दिया लेकिन अभी भावना को देख उसे बुरा लगने लगा था..

” तुमसे ये उम्मीद नही थी भावना!!  हमने सोचा था तुम्हारे साथ है तो हमारी बहन भी सुरक्षित है। लेकिन हम नही सोचे थे कि तुम भी उस पगलैट की बेवकूफी में उसका साथ दोगी.. !
वैसे एक बात बताना, कब से चल रहा है ये सब..?”

चंद्रा भैया को देखकर भावना एक बार फिर पत्ते की तरह काम्पने लगी। लेकिन इतने डर के बावजूद उसका दिमाग काम करना शुरू कर चुका था। उसे समझ में आ गया कि अगर उसने चंद्र भैया की बातों में आकर उन्हें सब कुछ सच बता दिया तो राजेंद्र जिंदा नहीं बचेगा। अपनी सारी हिम्मत समेटकर भावना ने चंद्रा भैया की आंखों में आंखें डाल कर अपना जवाब पूरी हिम्मत से दे दिया..

” कहाँ कुछ चल रहा है भैया..?”

“वो डाकटर वाला क्या मसला है ?”

“डॉक्टर साहब के पास हमारी अम्मा की दवाइयां चलती है, वहीं लेने कभी कभी हम जाते हैं.. एक आध बार कुसुम भी गयी रही..
डॉक्टर साहब गाँव में कोई शिविर लगाना चाहते थे, उसी के बारे में बात कर रहें थे, हम लोगों से… !”

“गाँव से बाहर काहे बात कर रहें थे ?”  चंद्रा के माथे अब भी बल पड़े हुए थे…

“वो तो हम और कुसुम शहर की तरफ जा रहे थे, और डाक्टर साहब शहर से वापस लौट रहे थे… इत्तेफाक से रास्ते में मुलाकात हो गयी..
बारिश होने लगी थी, जीप भी खुली थी, इसलिए वहाँ टपरी में बैठे थे हम सब.. उसी वक्त डॉक्टर साहब भी बारीश से बचने वहाँ रुक गए.. !”..

चंद्रा को बहुत ज्यादा यक़ीन तो नहीं हो रहा था, लेकिन ये लड़की आखिर झूठ काहे बोलेगी यहीं सोच कर वो अपने माथे पर की लकीरों को सहलाते बैठ गए..
सुजाता ने उनके सामने पानी का गिलास बढ़ा दिया..

“अबे नहीं चाहिए यार तुम्हारा पानी.. कोई गला नहीं सूख रहा हमारा !”

“अरे तो मत पीजिये, हम पर काहे झल्ला रहे..? हम तो पहले ही कहे रहे कि, तनिक पूछताछ तो लिया कीजिये.. ज़बरदस्ती कूट दिये, भावना को भी और वो डॉक्टर को भी..
आपका दिमाग में भी बस गोली बारूद भरा है !”

“चुप रहोगी थोड़ा देर.. कुछ सोच लें ?”

“क्या सोचेंगे आप.. किसी को मारने काटने के अलावा भी कुछ बुद्धि में घुसता है भला आपके..? और वो कौन है दीपक जिसका सुन सुन कर आजकल इतना चल रहे हैं.. निकाल बाहर कीजिये उसको !”

“सुनो.. औकात में रहो…।
किसे रखना, किसे निकालना ये हमें पता है.. तुम ना ज्यादा चपड़ चपड़ मत करो.. !”

“हाँ तो मत निकालिये, लेकिन याद रखियेगा ठाकुर साहब, ऐसे आग लगाने वाली चिंगारी को पाल कर रखेंगे ना तो एक दिन अपना ही घर में आग लगवा बैठेंगे !”

सुजाता पैर पटकती बाहर निकल गयी.. उसके पीछे परेशान हाल चंद्रा भी निकल गया, और कुसुम की अम्मा ने भावना को ऊपर कुसुम के कमरे में भेज दिया..

भावना ने ही दरवाज़े पर बाहर से पड़ा ताला खोला और अंदर दाखिल हो गयी.. कुसुम की अम्मा ताला अपने साथ ले गयी..

भावना को देखते ही कुसुम उसके गले से लग कर सिसक उठी..

“तुम ठीक हो भावना ? “

भावना का चेहरा इसके हाथ छू छू कर कुसुम देखने लगी.. उसके आँसू लगातार बह रहे थे..

“हाँ हम ठीक है.. !”

“हमारे कारण तुम्हारी ये दुर्गति हो गयी… माफ कर दो भावना..।
अब जो तुम कहोगी वहीं करेंगे हम..।
हम डाक सब से कितना भी प्यार कर लें, तुमसे ज्यादा सगे नहीं है वो हमारे.. तुम्हें तकलीफ पहुंचा कर हमें उन तक नहीं पहुंचना !”

भावना ने मुस्कुरा कर कुसुम को गले से लगा लिया..

“कुसुम एक मिनट रुको.. तुम्हारे भैया से जो झूठ बोले हैं वहीँ डॉक्टर साहब को भी बता दें जिससे अगर उनसे चंद्रा भैया पूछताछ करें, तो वो भी वहीं बात बोले जो हम बोले थे.. और तुम भी सुन लो.. समझी !”

भावना ने धीरे से कमरे का दरवाज़ा लगाया और राजेंद्र को फ़ोन लगा दिया..

राजेंद्र सरना की कुठरिया की छत पर पड़ा था.. खुले आसमान में घिरे बादल रह रह कर कड़क रहे थे.. उसने भावना का फ़ोन झट से उठा लिया.. जैसे बस इंतज़ार ही कर रहा था..

“भावना तुम ठीक हो.. ज्यादा चोट तो नहीं आई ना ?”

“नहीं.. हम ठीक है ! आप ठीक है ?”

“ठीक ही है ! कुसुम की कोई खबर ?”

“उसी के पास बैठे हैं.. उसके घर पर सबने हमसे माफ़ी मांग ली और सुनिए…

और भावना ने जो जो बातें जिस ढंग से चंद्रा से बोली थी, ठीक वैसे ही राजेंद्र को बता दी..

“ध्यान रखियेगा.. यहीं सब आपको बोलना है, जब भी आपसे पूछे.. !”

राजेंद्र और कुछ पूछ पाता कि तभी दो अनजान लड़कों को छत की सीढ़ियां चढ़ ऊपर आते देख वो शांत हो गया..
आंखें सिकोड़ कर वो उन दोनों को पहचानने की कोशिश में लग गया..

वो दोनों लड़के उसके पास आये और उनमे से एक उसकी चारपाई पर बैठ गया..

“कैसे हैं डॉक्टर साहब ? चोट ज्यादा तो नहीं आई ना ?
वैसे दीपक नाम है हमारा.. और हम आपकी मदद करने आये हैं.. !”

दीपक ने साथ लाये हुए सेब की थैली वहीँ एक तरफ रख दी..

दूसरी तरफ से भावना आवाज़ लगा कर पूछने लगी कि कौन आया है, लेकिन जवाब देने से पहले ही राजेंद्र ने फ़ोन काट दिया…

******

कहानी एक बार फिर अतीत में…

अनिर्वान आधी रात के वक्त पेट्रोलिंग कर वापस लौटा, तब तक थाने में उत्पात मचा हुआ था..

अखंड परिहार जाने कैसे थाने से भाग गया था..।

यह सुनते ही गुस्से में अनिर्वान का ख़ून खौलने लगा..

“बेवकूफ लड़का !! अगर कुछ किया नहीं था तो भागने की क्या ज़रूरत थी ?”

अनिर्वान की बात सुन उसके साथ खड़ा कांस्टेबल पूछ पड़ा..

“हुज़ूर आपको कैसे पता की अखंड बेगुनाह है !”

“अनुभव भी कोई चीज़ होती है भाटी साहब.. लड़का सौ प्रतिशत बेकसूर है..।
उसे इस अब में फंसाया जा रहा है, लेकिन कौन है वो फंसाने वाला और आखिर वो चाहता क्या है ?
ये सब तभी मालूम चल सकता था, अगर अखंड परिहार से उसकी पूरी कहानी सुन पाता..।
लेकिन उसने एक बहुत बड़ी बेवकूफी कर दी, जो यहाँ से भाग गया..
उसे नहीं मालूम की वो सबसे ज्यादा सुरक्षित भी यहीं था..।
अगर उसके कोई दुश्मन उसे फंसाने की कोशिश कर रहें तो वो उसे मारने की भी कोशिश कर सकते हैं… !”

“ये तो गलत हो गया हुज़ूर !”

“बहुत गलत.. लेकिन चलिए इससे ज्यादा गलत हो उसके पहले उसे ढूँढ लाते हैं !!”

“जी हुज़ूर !”

वो लोग थाने से निकलने वाले थे कि थाने के फ़ोन की घंटी बजने लगी..

भाटी ने आगे बढ़ कर फ़ोन उठा लिया..

फ़ोन पर बात करते हुए उसके माथे पर बल पड़ गए..

“हुज़ूर मेडिकल हॉस्पिटल से फ़ोन आया था.. वो लड़का था ना पंकज.. नहीं रहा !”

“महादेव.. !!! “

पल भर को ऊपर देखते हुए अनिर्वान ने आँखे बंद की और भाटी को साथ लिए अस्पताल की तरफ निकल गया…

क्रमशः

aparna…

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