अपराजिता -35
पंकज को थप्पड़ लगा कर भले ही रेशम बहुत हल्का महसूस कर रहीं थी, लेकिन उस थप्पड़ की जलन पंकज नहीं सह पा रहा था..
उसके दोस्त भी जा चुके थे और वो गुस्से में तमतमाया बैठा था…।
उसने अपना मोबाइल उठा कर अपने बड़े भाई को फ़ोन करना चाहा लेकिन उसके पास उसका फ़ोन भी नहीं बचा था, उसे भी अखंड ने तोड़ दिया था..।
गुस्से में सुलगता पंकज मन ही मन रेशम और अखंड से कैसे बदला लेना है इस पर विचार करने लगा..।
रेशम शाम में अपने कमरे में बैठी कुछ पढ़ रही थी कि पूर्वा उसके और अपने लिए चाय लिए आ गयी..
“रेशु तू उस पंकज की शिकायत क्यूँ नहीं कर देती है ?”
“अब भी उसकी शिकायत करने की ज़रूरत है क्या ?”
“हाँ… शिकायत कर देगी तो वो भी प्रोफेसर्स की नज़र में रहेगा, और दुबारा ऐसी कोई हरकत करने से पहले सोचेगा.. !”
रेशम ने हाँ में गर्दन हिला दी..
उन दोनों का ही आज मेस में बना खाना खाने का मन नहीं था.. पूर्वा ने कैंटीन में छोटू को फ़ोन कर दोनों के लिए चिली चीज़ गार्लिक ब्रेड मंगवा ली..
कुछ देर बाद ही छोटू हॉस्टल गेट पर पहुँच कर पूर्वा को फ़ोन करने लगा…
पूर्वा उस वक्त बाथरूम में थी, उसका फ़ोन रेशम ने उठाया और वो ब्रेड लेने नीचे चली गयी..
गेट पर पहुँच कर उसने छोटू को पैसे दिये और ब्रेड ले ली..
“रेशम दीदी.. ये भी है आपके लिए.. !”
“क्या है ?”
रेशम ने चौंक कर दूसरे लिफाफे को देखा, लेकिन इतनी देर में छोटू अपनी सायकल मोड़ कर भाग चुका था..
वो दोनों पैकेट हाथ में लिए ऊपर कमरे में चली आई..
उसने ब्रेड को टेबल पर रखा और और उस दूसरे लिफाफे को खोल लिया.. उसमें एक बड़ा सा ग्रीटिंग कार्ड था जिसमे एक लड़का लड़की एक दूसरे के गले लगे एक दूजे को चूमते नज़र आ रहें थे..
रेशम के माथे पर बल पड़ गए..
उसने कार्ड खोला, और किसी सस्ते परफ्यूम की खुशबू से उसका सर भन्ना गया..
अंदर एक गुलाब रखा था और लिखा था टू रेशम फ्रॉम अखंड विथ लव.. !
ये देख कर रेशम का ख़ून जलने लगा, उसने आज तक अखंड को सही तरीके से देखा तक नहीं था, और उसका रोम रोम उससे चिढ बैठा था..
बेवकूफ सस्ता आशिक !!
रेशम ने उस कार्ड के टुकड़े टुकड़े किये और डस्टबिन में डाल दिया..
उसी वक्त पूर्वा चली आई..
“क्या हुआ ? इतनी तमतमाई हुई क्यों नजर आ रही है..?”
रेशम ने गुस्से में पूर्वा की तरफ देखा और डस्टबिन की तरफ इशारा कर दिया..
“क्या फेंका उसमें ?”
“उस ज़ाहिल गंवार नेता की हिम्मत बढ़ती ही जा रहीं है, उसने आज एक बेहूदा सा ग्रीटिंग कार्ड भेजा मुझे !”
“व्हाट.. ?”
पूर्वा जाकर डस्टबिन से टुकड़े बटोरने की कोशिश करने लगी..
“अरे जाने दे ना, तू भी क्या कचरा बटोर रही !”
“तुझे कैसे मालूम चला कि कार्ड किसने भेजा ?”
“नाम लिखा था ना उस अखंड का !”
“अरे तो उसके नाम से कोई और भी तो भेज सकता है ! तूने कार्ड भी फाड़ दिया, वरना हम हैंडराइटिंग मैच कर लेते !”
“ओह्हो करमचंद की अम्मा ! उसकी जगह और किसको पड़ी है उसके नाम से कार्ड भेजने की ! उसी घटिया इंसान ने ये हरकत की है.. कार्ड सामने इतना गन्दा और बेहूदा था कि मैं किसी को दिखा नहीं सकती थी.. ! उसे फाड़ कर फेंकना ही था.. !”
“चल ठीक है.. आजा हम ब्रेड खा लें, वरना ठंडा हो जायेगा.. !”
वो दोनों खा पीकर प्लेट्स समेट रहीं थी दो तीन लड़कियां उनके कमरे में चली आई..
“हे चलो आज निहाया का बर्थडे है… उससे केक कटवा लेते हैं..।”
रेशम और पूर्वा उन लड़कियों के साथ चली गयीं…
निहाया के कमरे में वो सारी लड़कियां जन्मदिन मनाने लगी..
केक काटते ही निहाया ने सबको खिलाया और सब गले लग लग कर उसे बधाइयाँ देने लगी..
रेशम भी उसके गले से लग गयी..
वो उसके गले लग कर उसे बधाई दे रहीं थी और वहीँ खड़ी शमिता उनके फोटो लें रहीं थी..
उसने उन दोनों के और भी फोटो ले लिए..
सभी लड़कियां हंसती बोलती जन्मदिन मनाने में लगी थी और बाकी सब की नज़र बचा कर शमिता ने वो सारे फोटो पंकज को भेज दिये….
इन सारी बातों से अनजान रेशम का कुछ देर पहले जो मूड ख़राब हुआ था वो अब कुछ हद तक सुधर गया था…!
इधर पंकज के चहरे पर एक घटिया सी मुस्कान चली आई..
वो भी अस्पताल से डिस्चार्ज लेकर हॉस्टल पहुँच गया था..।
उनके हॉस्टल में एक लड़का था जो सायबर एक्सपर्ट माना जाता था..
वो पंकज का दोस्त भी था..
पंकज उसके पास पहुँच गया..
“क्या हुआ पंकज ? अब कैसी तबियत है तेरी ?”
“क्या बोलूं यार ! बिना किसी गलती के सज़ा भुगत रहा हूँ.. करें कोई और भरे कोई वाला हाल है !”
“मतलब ?”
“मतलब ये कि वो रेशम है ना.. !”
“तेरी बैचमेट ?”
“हाँ !”
“क्या हुआ उसे ?”
“उसे क्या होगा मस्त है..! ये लड़कियां भी आजकल बड़ी शातिर हो गयी है.. अपनी खूबसूरती का कब कैसे कहाँ फ़ायदा उठाना है ये इन्हें अच्छे से आता है.. !”
“हाँ यार सुंदर तो बहुत है.. हमारी बैच का भी हर लड़का उसे ताड़ता है ! पर हुआ क्या ?”
“होना क्या है ? जब फर्स्ट ईयर में आये तब उसे सीनियर्स के नोट्स के लिए, रैगिंग से बचने के लिए, प्रोफेसर्स की नज़र में अच्छा बनने के लिए मदद चाहिए थी, तब मुझसे दोस्ती कर ली..
अब मुझे क्या मालूम था उसके मासूम चेहरे के पीछे क्या छुपा है ! मैं भोला भाला उसकी बातों में आ गया। फर्स्ट ईयर में सीनियर के नोट्स ढूंढ ढूंढ कर ला कर उसे दिए, सारे प्रैक्टिकल के लिए पर्सनली उसके लिए बोन्स से लेकर हर चीज का इंतजाम किया।
कैडेवर डिसेक्शन के स्पेशल नोट उसे लाकर ढूंढ कर दिया..
और अब जब फर्स्ट ईयर के एग्जाम का समय है उसे समझ में आ गया कि मुझसे जितना वसूल सकती थी वसूल लिया तो मुझे डिच करके यूनिवर्सिटी के प्रेसिडेंट के गले पड़ गई है..!”
“व्हाट.. ? ऐसी लगती तो नहीं !”
” कोई अपना कैरेक्टर सर्टिफिकेट अपने गले में टांग कर नहीं घूमता, खासकर ऐसी लड़कियां जो दिखने में इतनी खूबसूरत हो वह और भी ज्यादा भोलेपन और मासूमियत का मास्क चेहरे पर लगाएं घूमती है…
इतनी प्यार भरी और अच्छी मीठी बातें करती है कि सबको लगता है कि इससे अच्छी लड़की तो दुनिया में कोई हो ही नहीं सकती, लेकिन सच्चाई क्या है यह तो हम जैसे उनके छोड़े हुए बॉयफ्रेंड को ही पता होता है..!”
“ओह्ह यू मीन.. तुम दोनों का कोई एंगल था ?”
“अच्छा खासा एंगल था यार, बोलती थी फाइनल ईयर में ही शादी कर लेंगे.. और अब देख क्या रंग बदला है !”
“अब क्या किया ?”
“मुझे डिच कर दिया वो भी उस दो कौड़ी के अखंड परिहार के लिए !”
“अखंड परिहार.. ए पी की बात कर रहा है तू.. यार उसका नाम तो क्लीन है.. अब तक कभी उसके लिए कुछ नहीं सुना !”
” हां कुछ लोग ऐसे ही तो होते हैं, अच्छाई और ईमानदारी नेकनामी का मास्क अपने चेहरे पर चढ़ाए रहते हैं। पर वह भी कम नहीं है उसकी नजर मेरी गर्लफ्रेंड पर पड़ी और अपने ओहदे और रसूख का फायदा उठाकर उसने रेशम को पटा लिया। अखंड के चक्कर में रेशम ने मुझे छोड़ दिया…।”
“क्या बात कर रहा है यार ?”
“सच कह रहा हूँ.. मेरी एक एक बात सच है। अभी ब्रेकअप के बाद मैं संभालने की कोशिश में था और पिछले दिनों उसकी और अपनी एक फोटो डाली थी, बस उसके रिसेंट बॉयफ्रेंड को गुस्सा आया, और आकर मेरे हाथ पैर तोड़ कर चला गया। पर मैंने तो सोच लिया है कि मैं भी उसे छोडूंगा। साला कुत्ता खुद को समझता क्या है..!”
“तू क्या करने की सोच रहा है अब ?”
“ज्यादा कुछ नहीं अमित.. बस एक काम करना है.. मुझे उस ज़िद्दी और अकड़ू लड़की की अक्ल ठिकाने लगनी है !”
“लेकिन कैसे.. ?”
“मेरे पास उसकी कुछ फोटोज़ है, तू उनमे अखंड की फोटो मॉर्फ कर के डाल दे.. बस भाई इतना कर दे.. और कभी कुछ नहीं मांगूंगा… !”
“पर ये काम गलत है पंकज !”
“बेटा तो क्या सारे सही काम करने का ठेका हमारा ही है..? एक बार बस इतना कर दे फिर कुछ नहीं मांगूंगा… पक्का !”
“ला दिखा फोटो !”
पंकज ने अपने मोबाइल में रेशम की निहाया से लिपटी हुई तस्वीरें दिखा दी..
इसके साथ ही अखंड की तस्वीरें भी उसने अमित के सामने रख दी..
अमित ने निहाया की जगह अखंड की तस्वीर को जोड़ दिया..
हालाँकि बहुत सफाई से काम नहीं हुआ था, ध्यान से देखने पर साफ़ नज़र आ रहा था कि तस्वीरे एडिट की गयी है। लेकिन एक झलक देखने पर यहीं लग रहा था की अखंड और रेशम एक दूसरे के गले से लगे खड़े है.. !
पंकज ने वो तस्वीरें अपने मोबाइल पर ली और मुस्कुरा कर निकल गया…
*****
चंद्रा गुस्से में ताबड़तोड़ गाडी चलाता हुआ फर्राटे से अपने घर की तरफ गाडी भगा रहा था…
उसके दिल दिमाग में तूफान उठा हुआ था..।
उसने स्वयं अपनी मर्ज़ी से पूरे गाँव की इज्जत का ठेका अपने सर लें रखा था, और आज उसी की बहन ने इतने लोगों के सामने उसकी इज्जत उतार कर रख दी थी..
उसे गुस्सा तो ऐसे आ रहा था की कुसुम का गला काट कर यहीं नदी में बहा दे, लेकिन अपने गुस्से पर काबू किये वो गाड़ी भगाये जा रहा था..
वो घर पहुंचा, गाड़ी से उतरा ही था कि घर का पुराना नौकर भागता हुआ उस तक पहुँच गया..
“भैया जी बड़े ठाकुर साहब आये हैं !”
कुसुम के होने वाले ससुर जी आये हैं ये सुनते ही उसके माथे पर बल पड़ गए और कुसुम को तबियत से ठोंकने का विचार त्याग कर वो बस उसे एक नज़र घूर कर अंदर चला गया..
“सीधे अपने कमरे में जाओ !”
कुसुम भी कम नहीं थी.. उसके चेहरे पर किसी तरह की ग्लानि का भाव नहीं था..
वो भी बड़े ठसके से उतरी और अपनी सैंडल बजाती अपने कमरे की ओर बढ़ गयी..
वो भले ही अपने भाई और उसके पंटरों के सामने आत्मविश्वास दिखा रहीं थी, लेकिन अंदर से डरी हुई थी.. उसे अपनी चिंता ना थी..।
वो तो अपनी जान हथेली पर लेकर घूमने वालों में से थी, लेकिन राजेंद्र और भावना के साथ इन लोगों ने क्या वहशियाना हरकत की होगी, वहीं सोच सोच कर वो अंदर से कांप रहीं थी..
राजेंद्र और भावना को चंद्रा के लड़कों ने चंद्रा के खेत वाले घर में ले जाकर बंद कर दिया था..
भावना घबरा गयी थी.. उस छोटे से गाँव की गरीब सी लड़की के लिए इज्जत बहुत मायने रखती थी..।
और आज उसी को उसकी सहेली के भाई ने ही तार तार कर दिया था..।
वो बचपन से उस घर में खेली कूदी थी..
भले ही आजतक उसने चंद्रा को राखी नहीं बांधी लेकिन भैया तो मानती ही थी और उस मान का ये सिला दिया था उन्होंने उसे..
उसकी गलती क्या थी आखिर ? यहीं की अपनी सहेली के अल्हड़ प्यार में उसने निर्विरोध उसका साथ दिया था.. तो क्या गलत कर दिया ?
वो तो शुरू से कुसुम को यहीं समझा रहीं थी कि या तो राजेंद्र को भूल जाए या फिर उसके बारे में अपने घर वालों से बात दे। ये लुकाछिपी वाला प्यार उसके घर वालों को कभी बर्दाश्त नहीं होगा। हमेशा सही समझाइश देने के बावजूद आज गेहूं के साथ घुन की तरह वह भी पिस गई।
रह रह कर उसे राजेंद्र पर भी बेहद तरस आ रहा था। वो सीधा साधा पढ़ा-लिखा सा डॉक्टर लहूलुहान चेहरा लिए उसके सामने बैठा था। दोनों ही एक अंधेरी सी कोठरी में बंद पड़े थे। दोनों के हाथ पैर बांधकर उन्हें एक-एक खंबे से लगाकर बैठा दिया गया था। और उस खंभे से लगकर भी एक मोटी रस्सी दोनों की कमर से डालकर बांध दी गई थी।
जमीन पर बैठे वह दोनों असहाय से एक दूसरे को देख रहे थे। कुछ देर बाद ही राजेंद्र ने इधर उधर नजर दौड़ाना शुरू किया। वो जानता था कि यहां पड़े रहने का कोई फायदा नहीं है। उसे कुछ भी करके यहां से निकलने की कोशिश करनी ही पड़ेगी..।
“डॉक्टर साहब… !”
भावना कुछ बोलते बोलते रह गयी..
राजेंद्र ने जाने कैसे उसके मन की बात भांप ली..
भावना का दुपट्टा वहीँ एक तरफ पड़ा था..
रस्सियों से उसे ऐसे जकड कर बैठा दिया गया था कि सामने बैठे राजेंद्र के सामने उसे लज्जा सी महसूस हो रहीं थी..
उन लड़कों से हुई झड़प में उसकी कुर्ती के सामने गले का हिस्सा कुछ ज्यादा फट कर कपडा लटक गया था.. बाँह भी फट गयी थी..
भावना को राजेंद्र के सामने यूँ बैठने में बहुत शरम आ रहीं थी…
राजेंद्र ने जाने कैसे उसके मन के भाव समझ लिए..
अपने पैरों से टटोल कर वो उसके दुपट्टे को पास खींचने की पुरज़ोर कोशिश करने लगा..
बड़ी जद्दोजहद के बाद दुपट्टा किसी तरह उन दोनों के बीच तक पहुँच गया…
राजेंद्र ने अपने आप को भरसक तिरछा करने की कोशिश की और अपने बंधे हुए हाथों से दुपट्टा उठा लिया…
गर्दन और पीठ को पूरी कोशिश कर उसने पीछे की तरफ घुमाया, जिससे उसके हाथों वाला हिस्सा भावना के सामने आ गया..
भावना ने धीरे से अपनी गर्दन झुका ली और राजेंद्र ने दुपट्टा उसके गले पर डाल दिया..
उसे अपनी गर्दन की मदद से इधर उधर कर भावना ने खुद को पूरी तरह से ढांक लिया..
उसकी आँखों में सामने बैठे राजेंद्र के लिए कृतग्यता चली आई..।
लेकिन इस वक्त भावना की तरफ देख कर राजेंद्र उसे शर्मिंदा नहीं करना चाहता था। इसलिए वो खिड़की पर बनी दरारों से झांक कर आती रौशनी की तरफ एकटक देखता अपने भविष्य के बारे में सोचने लगा…
क्रमशः
aparna….
