“धीरेन्द्र प्रजापति इस आँसू की कसम अब तुझे ज़िंदा नहीं छोड़ेंगे हम.. !”
मन ही मन प्रतिज्ञा सी कर अखंड ने हल्के से ऑंख खोल दी..
बस में अंदर गाने चल रहे थे और रेशम खिड़की पर अपनी बाँह का तकिया बनायें उस पर सर रखें आंखें मूंदे बैठी थी..
डूबते सूरज की लालिमा रेशम के चेहरें को अलग ही लुनाई से रंग गयी थी… उसकी ज़ुल्फ़े हवा से उड़ कर उसके माथे पर इधर उधर बिखर रहीं थी..
वो शायद नींद में चली गयी थी और सपने में कोई मीठा सा सपना उसे गुदगुदा रहा था, उसके होंठो के कोर पर उसकी मुस्कान आकर ठहर गयी थी..
अखंड नजर भर कर उसे देख रहा था, बहुत प्यार से उसे देख रहा था.. उसे लग रहा था, ये बस यूँ ही चलती रहे और वो ऐसे ही अपनी बाइक में साथ साथ चलता अपनी रेशम को देखता रहें…
बस में अंदर कोई गाना चल रहा था, जिसकी स्वरलहरी बाहर तक चली आ रहीं थी..
इश्क़ है क्या यह किसको पता
यह इश्क़ है क्या सब को पता
यह प्रेम नगर,साजन का घर, क्या किसको खबर
छोटी सी उम्र यह लम्बा सफर
यह इश्क़ है क्या यह किसको पता
यह दर्द है या दर्दों की दवा
यह कोई सनम या आप खुदा
यह कोई सनम या आप खुदा
इश्क़ बिना क्या मरना यारा
इश्क़ बिना क्या जीना…
तुमने इश्क़ का नाम सुना है
हमने इश्क़ किया है….
क्रमशः
aparna…
