अपराजिता-29
कॉलेज में यूथ फेस्ट की तैयारी ज़ोरों से चल रहीं थी…
अखंड परिहार जहाँ हर उस जगह में मौजूद रहता था, जहाँ भी रेशम अपनी सहेलियों के साथ होती थी वहीँ अब धीरेन्द्र भी हर उस जगह पर मौजूद था जहाँ अखंड होता था..
मन ही मन डाह पाला हुआ वो लड़का इन्तेक़ाम की आग में झुलस रहा था..
मेडिकल वालों का काम हो और रक्तदान शिविर ना लगें ये सम्भव ही नहीं था..
उस दिन सुबह से रक्तदान कैम्प की तैयारी चल रहीं थी..
रेशम भी अपने साथ के लोगों के साथ यहाँ से वहाँ सारी व्यवस्था देखने में लगी थी…
मेडिकल कॉलेज के अस्पताल के नीचे वाले जनरल वार्ड के बाहर बने ड्यूटी रूम को रक्तदान कमरे में बदला गया था…
वहाँ लगभग पांच बेड लगा कर व्यवस्था बनायीं गयी थी..
अखंड को मालूम चला तो वो भी चला आया..
उसके पंटर स्नेहवश उसे रक्तदान ना करने को कहने लगे..
“भैया जी आप रहन दीजिये, हम सब है ना.. ख़ून की नदी बहा देंगे.. !”
“और फिर उस नदी से चुल्लू भर भर के डॉक्टर लोगों को दोगे क्या… अबे अजब बौड़म हो तुम.. कभी कभी लगता है गदहा भी तुमसे तेज़ सोच लेता होगा.. !”
अखंड ने गोलू को कहा.. और गोलू तुरंत जवाब दे उठा..
“भैया जी हमारे कहने का मतलब था कि कम से कम सौ लड़के तो आपके नाम पर रक्तदान कर जायेंगे.. !”
“तो पकड़ लाओ.. अब तक इंतज़ार किस बात का कर रहे थे बे.. ?”
“आपके आदेश का भैया जी..
अखंड ने गोलू को जाने का इशारा किया और खुद उस कमरे में दाखिल हो गया..
प्रथम वर्ष के एक लड़के ने उसे सामने टेबल पर जाने को कह दिया..
अखंड उस टेबल पर पहुँच गया.. वहाँ एक लड़की एक पतले से रजिस्टर को खोले बैठी रक्तदान करने वालों का नाम और उनका ब्लड ग्रुप लिखती जा रही थी..
उसी लड़की के ठीक बगल में रेशम खड़ी थी जो रक्तदाता के शर्ट पर अपने यहाँ का मोमेंटो लगा कर उसे खाली बिस्तर की तरफ ले जा रहीं थी…
“अखंड… अखंड सिंह परिहार.. !”
अखंड ने अपना नाम बताया और लिखने वाली लड़की आश्चर्य से ऊपर देखने लगी..
यूनिवर्सिटी का छात्र संघ अध्यक्ष खुद चल कर आया था.. ये बड़ी बात थी..
उसने अखंड का नाम लिख कर रेशम को इशारा कर दिया..
रेशम ने सैटिन रिबन से बने फ़ूल को उठा कर अखंड की शर्ट पर पिन करना शुरू कर दिया और अखंड रेशम को अपने इतने करीब पाकर हल्का सा घबरा गया….
रेशम बड़े ध्यान से पिन लगा रहीं थी, और वो उतने ही ध्यान से उसे देख रहा था…
यूँ लग रहा था अखंड की आंखें मुस्कुरा रहीं हैं…
रेशम ने पिन लगाने के बाद उसकी तरफ देखा और एक तरफ के पलंग की ओर इशारा कर दिया..
रेशम की रंगत उसकी खुशबू में खोया हुआ सा अखंड उस तरफ बढ़ गया…
खोया खोया सा अखंड उस बेड पर अधलेटा सा बैठ गया… नर्स ने उसकी बाँह पर बेल्ट बाँधी और कुहनी के अंदरूनी भाग पर हथेली से थाप कर नस तलाशने लगी..
उसे बहुत वक्त लग रहा था.. कि रेशम वहाँ चली आई… उसने नर्स के पास खड़े होकर ध्यान से देखा और वहीँ एक तरफ की बाजू में थपकी दे कर नस ढूँढ ली.. नर्स से सिरिंज ले कर रेशम ने ही उस नस में चुभा भी दी..
अखंड बस अपलक रेशम को देखता रहा… उसे ज़रा सा भी दर्द नहीं हुआ, वहीँ बाहर खड़े उसके पंटर अखंड को सुई चुभते ही बाहर बलबलाने लगे..
अखंड के हाथ में स्ट्रेस बॉल पकड़ा कर रेशम वहाँ से दूसरी तरफ चली गयी, और अखंड उसी में खोया रहा…
खोया हुआ सा वो रक्तदान कर बाहर चला आया..
उसके पास एक लड़की जूस का गिलास ले आई..
“सर बैठ कर पी लीजिये.. !”..
“हम्म.. अहम.. हम्म.. !”
वो वहीँ एक तरफ बैठ गया, उसके सब लड़के भाग कर चले आये.. किसी के हाथ में अनार का जूस था, तो किसी के पास अखरोट बादाम का थैला,..
लेकिन अखंड इन सब से बेज़ार खोया हुआ था…
उसने कुछ भी लेने से इंकार कर दिया..
लगभग दो-तीन घंटे बीतने के बाद एक बार फिर वो वहां रक्तदान के लिए चला आया। उसके दोस्तों ने उसे बहुत रोका लेकिन उसने एक नहीं सुनी और अंदर दाखिल हो गया। लेकिन इस बार उसने अपने चेहरे पर अपना गमछा लपेट रखा था। नाम लिखने वाली ने उसकी तरफ देखा और उसका नाम पूछ लिया और इस बार अखंड ने अपने नाम की जगह गोलू का नाम दर्ज करवा दिया।
एक बार फिर रेशम उसके पास आई और रिबन को पिन करने की प्रक्रिया से लेकर उसे बैड तक ले जाकर छोड़ने की प्रक्रिया तक रेशम उसके साथ रही।
रेशम के सानिध्य को महसूस करता उसकी नस-नस को अपने अंदर ज़ब्त करता अखंड एक बार फिर रक्तदान के लिए अपनी बाँह आगे बढ़ा चुका था…।
बाहर खड़े उसके लड़के इस बात से बेहद परेशान हो रहे थे कि उनके भैया जी को बार-बार रक्तदान करने से कमजोरी ना आ जाए। लेकिन भैया जी अपने होश हवास गवाएं दोबारा रक्तदान के लिए तैयार बैठे थे ।
नर्स ने इस बार दूसरी बाँह में सुई चुभा दी और खून निकाल लिया..
अखंड एक बार फिर झूमता हुआ सा बाहर चला आया। जूस का दूसरा गिलास गटक कर वो फिर आराम करने लगा।
लेकिन इस बार उसके लड़कों ने उसे वहां बैठने नहीं दिया और जबरदस्ती कसम खिलाकर उसे वहां से अपने साथ ले गए, क्योंकि उन लोगों को अब अखंड भैया का भरोसा नहीं था। क्या पता तीसरी बार भी रक्तदान के लिए पहुंच गए तो?
इन सारे कारनामों और करतूतों को अपनी आंखों से देखता बैठा धीरेंद्र प्रजापति धीरे-धीरे मुस्कुरा रहा था। उसे अखंड की ये छोटी सी लवस्टोरी बड़ी बढ़िया लग रहीं थी..
और अब इस लवस्टोरी को वो खुद डायरेक्ट करना चाहता था…
थकान के कारण अखंड की पलकें झपकने लगी थी, और इसलिए वह अपने लड़कों के साथ वहां से उठ कर चला गया..
मेडिकल वालों का यह कैंप भी सफल हुआ था। शाम तक में अपने सारे काम को निपटा कर सारे छात्र-छात्राएं एक साथ कैंटीन में बैठे चर्चा में लगे थे। रेशम भी अपनी सहेलियों के साथ बैठी थी, तभी उसकी दो-तीन सहेलियां उसे छेड़ने लगी..
“क्या बात है रेशम, तेरा जादू चल गया है.. ?”
“किस पर.. ?”
रेशम ने अपनी सहेली के सवाल पर अनभिग्यता दिखाई..
“विश्विद्यालय के अध्यक्ष पर.. और किस पर !”
“चल हट… ऐसी कोई बात नहीं !”
“तूने सच में ध्यान नहीं दिया.. ?”
रेशम ने ना में गर्दन हिला दी..
“यार वो अखंड परिहार दो दो बार तेरे चक्कर में ब्लड डोनेट कर गया… !”
“क्या बकवास है ?”
“हाँ सच कह रहीं मैं, नीलू से पूछ ले.. !”..
पूर्वा की बात पर वहीँ बैठी नीलू ने भी हामी भर दी…
“हाँ… सच में ! और रेशु वो तुझे घूरता भी रहता है.. ऐसे लोगों से बच के रहना.. छात्र नेता है… इन लोगों का कोई भरोसा नहीं होता.. आज तुझ पर फ़िदा, कल किसी और पर… गुंडे होते हैं ये लोग.. !”
“और नहीं तो क्या ? अखंड परिहार है भी छंटा हुआ गुंडा, उसके बारे में सुना नहीं है कितनी अफवाह फैली है…
बहुत बड़ा गुंडा है यह, मैंने तो सुना है इसका पूरा परिवार ही गुंडागर्दी वाला है..!”
“चीप लोग हैं.. बस तू सम्भल के रहियो.. !”
रेशम को डराने के लिए इतनी बातें पर्याप्त थी…
उसी वक्त कैंटीन में काम करने वाला छोटू भागता हुआ वहाँ चला आया..
“आप में से रेशम दीदी कौन है ?”
“मैं हूँ.. बोलो ?”
“ये आप के लिए भैया जी ने भेजा है.. ?”
“कौन भैया जी ?”
“अखंड भैया ने.. !”
उस लड़के ने गुलाब रेशम के सामने कर दिया..
उस लाल गुलाब को देखते ही रेशम की त्योरियां चढ़ गयी.. उसने उस गुलाब को ज़मीन पे फेंका और अपनी जूती से कुचल दिया..
छोटू कुछ देर असमंजस में खड़ा रेशम को देखता रहा और फिर वहाँ से भाग गया…
कैंटीन के बाहर खड़े धीरेन्द्र ने रेशम की तरफ देखा और मुस्कुरा कर वहाँ से चला गया..
इन सारी बातों से अनजान अखंड अपने कमरे में पलंग पर एक टांग पर दूसरी चढ़ाये लेटा गाना सुनने में व्यस्त था..
ऐसे तू मिली है जैसे शाम को हवा
तू ही रास्ते की ठोकर और तू ही दवा
बेशुमार है, तू खुमार है तू ख़ुमार है…
खाली घूमती थी नज़र,तुझपे अब बहार हुई है
हम थे सीधे साधे मगर आँखों से मजाल हुई है…..
अपने निर्णय पर अडिग कुसुम राजेंद्र का हाथ पकड़कर उस ढाबे से बाहर निकल आई। वह बाहर निकली ही थी कि एक के बाद एक आठ 10 बाइक वहां आकर रुकी और उसमें से चंद्रा भैया के गुंडे उतर कर उन दोनों को घेर कर खड़े हो गए। उनमें से कुछ लड़के राजेंद्र को खींच कर अपने साथ ले जाने लगे, लेकिन कुसुम ने राजेंद्र की बांह पकड़ ली। वह उन लोगों को राजेंद्र को छोड़ देने की गुजारिश कर रही थी, और वह लोग कुसुम को इस मामले से दूर रहने की समझाइश दे रहे थे। यह सब देखकर दुलारे काका ने अपना सर पीट लिया।
उन्हे समझ में आ गया था कि इस प्रेम कहानी का अंत आ चुका है।
भावना घबराकर पीली पड़ गई थी। वह एक तरफ खड़ी पत्ते सी कांप रही थी, उसकी इतनी भी हिम्मत नहीं हो रही थी कि वह आगे बढ़ कर कुछ कर सके…।
कुसुम राजेंद्र को छोड़ने को तैयार नहीं थी और वह गुंडे कुसुम को दूर करके राजेंद्र को अपने साथ लिए जाना चाह रहे थे।
राजेंद्र भी कुसुम का हाथ छोड़ने को तैयार नहीं था। इसी झूमा झटके में किसी ने कुसुम को जोर से धक्का दिया और वह जमीन पर गिर पड़ी। वहीं पड़े पत्थर पर कुसुम का सिर टकराया और उसके माथे से खून की धार बहने लगी। भावना भागकर अपनी सखी के पास पहुंच गई ।
उसका सारा डर पल भर में गुस्से में तब्दील हो गया, और वहीं पड़े पत्थर को उठाकर वह उन लोगों को मारने लगी।
जो लोग राजेंद्र को खींचकर लिए जा रहे थे उनमें से एक लड़के ने भावना की बांह बुरी तरह से पकड़ कर मरोड़ दी। भावना के मुहँ से घुटी घुटी सी चीख निकल पड़ी…
राजेंद्र ने उस लड़के को ऐसा करते देख कर उसकी नाक पर एक जोर का घूंसा मारा और उस लड़के की नाक से खून बलबलाकर बहने लगा। उसने राजेंद्र को एक भद्दी सी गाली दी और भावना के बाल पकड़ कर खींच कर उसे दूसरी तरफ कर दिया। भावना ने वहीं पड़े लकड़ी के टुकड़े को उठाया और उन लड़कों पर ताबड़तोड़ वार करने लगी।
कुसुम नीचे गिरी हुई अपने माथे से बहते खून को देखकर स्तब्ध थी। दुलारे काका उसे संभालने में लगे थे…
जोर से गिरने और माथे पर चोट लगने के कारण कुसुम कुछ देर के लिए स्तब्ध रह गई थी। अपने आप को संभाल कर और माथे से बेहते खून को अपने ही दुपट्टे से पोंछ कर वह भी जैसे तैसे खड़ी हुई, और उन लड़कों को मारने आगे बढ़ी ही थी कि तभी एक और जीप वहां आकर रुकी।
ड्राइविंग सीट से खुद चंद्रा भैया उतरे और उतरकर कुसुम के पास चले आए। उन्होंने दुलारे पर एक जलती हुई नजर डाली और कुसुम की बांह पकड़कर खींचते हुए उसे अपने साथ की जीप में ले गए…
चंद्रा भैया का गुस्सा उनके चेहरे से टप टप टपक रहा था। उन्होंने अपने गुंडों को राजेंद्र को खींचकर लाने का आदेश दिया और अपनी जीप घुमा कर निकल गए जाते-जाते उन्होंने एक जलती हुई नजर वापस दुलारे काका पर डाली और उन्हें भी सीधा घर पहुंचने का आदेश सुना दिया… चंदा भैया के गुंडों ने राजेंद्र का मार मार कर बुरा हाल कर दिया था !
भावना आज तक खुद को कमजोर और और डरपोक समझती आई थी, लेकिन आज जब उसके सर पर पड़ी तब उसे समझ में आया कि उसके अंदर भी एक ऐसी सशक्त नारी है जो कभी अपनी आंखों के सामने गलत होता नहीं देख सकती।
उस से जितना हो सका उसने उन लड़कों को मारना जारी रखा। वह अपनी जंग लड़ती रही और उसने साबित कर दिया कि लड़ाई करने के लिए ताकत नहीं हिम्मत होनी चाहिए।
आठ दस मजबूत लड़कों को भी उसने लकड़ी और पत्थरों से मार मार कर परेशान कर दिया था। उन लड़कों के भी नाक में दम हो गया था। उनमें से एक ने लकड़ी के पट्टे को भावना से छीना और अपना पूरा जोर लगाकर भावना के सिर पर दे मारा।
भावना के सिर के पिछले हिस्से में जोर से आघात हुआ और वह जमीन पर गिर पड़ी। सामने माथे से खून बहने लगा और साथ ही सिर के पिछले हिस्से में चोट लगने से उसे हल्की मूर्छा सी होने लगी। लेकिन वह लड़के इसी में खैर मना लेते तो गुंडे कैसे होते?
उन्होंने भावना के बालों को पकड़ा और घसीटते हुए उसे अपनी बाइक तक ले आए। राजेंद्र खुद पर हुए वार तो बचा ही रहा था लेकिन भावना पर होते वार अपनी आंखों के सामने देख नहीं पा रहा था।
उसने भी हाथ में जो जो चीजें आई, उनसे उन लड़कों को मारना शुरू कर दिया ।
लेकिन अपनी पूरी हिम्मत लगाकर लड़ने के बावजूद उन इतने सारे गुंडों के सामने भावना और राजेंद्र चूक गए…..
आखिर उन लड़कों ने भावना और राजेंद्र को अपनी अपनी बाइक पर लादा और चंद्रा भैया के ठिकाने की ओर ले चले….
क्रमशः
aparna…

Nice part 👌👌👌
बहुत अच्छा भाग 👌👌👌
लाजबाब भाग 👌👌👌👌👌👌♥️♥️