अपराजिता -26
राजेंद्र को गाँव छोड़ कर आये हुए दो दिन बीत गए थे, लेकिन उसका मन किसी काम में नहीं लग रहा था.. उसने फ़िलहाल अपने बड़े ऑफिसर के पास छुट्टी का आवेदन लगा दिया था..
अपने कमरे में निरर्थक यूँ ही पड़ा पड़ा राजेंद्र रात दिन कुसुम की यादो में डूबा बैठा था.. उसे हर बात पर कुसुम की याद आ रहीं थी..
वो कुसुम की तरफ से दिमाग हटाना चाहता था, लेकिन रह रह कर उसका दिल उधर ही उलझता जा रहा था..
ना उसका खाने में मन लग रहा था ना उसे नींद आ रहीं थी…
वो गजदलपुर के अपने कमरे में पड़ा था.. अकेला… !
उसकी अचानक वापसी पर उसके बगल के कमरे में रहने वाला उसका दोस्त उससे मिलने और हालचाल जानने चला आया..
वहीं अपने साथ खाना भी ले आया था, उसने साथ खा लेने की पेशकश रखी, जिसके लिए राजेंद्र तैयार नहीं हुआ..
राजेंद्र का ना तो किसी से बात करने का मन था ना किसी के साथ रहने का.. इस वक्त वो पूरी तरह अकेला रहना चाहता था..
एक तो उसकी तबियत वैसे ही ख़राब थी, उस पर अचानक बिना कुसुम को एक झलक देखे ही वो चला आया था…
उसे नहीं पता था की कुसुम उसके लिए दिल का ऐसा दर्द बन गयी थी, जिसे ना उसके साथ रह कर दबाया जा सकता था और ना उससे दूर जाकर..
सरना के कहे अनुसार तो उससे दूर रह कर वो उसे भूल जायेगा, लेकिन यहाँ आकर तो उसकी यादों का ऐसा बवंडर कलेजे में उठ रहा था कि राजेंद्र को लगने लगा था अगर कुसुम नहीं मिली तो वो पागल हो जायेगा…
जैसा सोचा था, ऐसा कुछ नहीं हो रहा था..
उसने अपने दिमाग को दूसरी तरफ लगाने के लिए टीवी चला लिया.. लेकिन वहाँ भी उसका मन नहीं लगा..।
रात जाने कब थकान से उसकी ऑंख लग गयी..
अगली सुबह भी वैसी ही मनहूसियत भरी थी..
उसे बार बार याद आ रहा था वो समय जब हंसती खिलखिलाती कुसुम उसके पास चली आती थी..
उसका बात बात पर मुस्कुराते हुए राजेंद्र को घूरना.. बात बात पर उसकी टांग खींचना..
उसे देखने को पागल रहना..
कुसुम की हर बात उस की हर याद,आज उसे खुद को पागल किये दे रही थी..
कुछ सोच कर वो अपनी जगह पर खड़ा हो गया..
चाहे जो हो जाएं, वो कुसुम से एक बार तो मिल कर रहेगा.. बहुत हुआ ये चंद्रा का अत्याचार !!!
अरे पुलिस प्रशासन नाम की भी कोई चीज़ है? और फिर उसके लिए तो अलग से न्याय व्यवस्था बनी है, फिर वो क्यूँ डर रहा है.. ?
अगर वो कुसुम की जात का नहीं है तो, इसमें उसका क्या कुसूर ? अब भगवान ने जिस घर में जन्म दिया वहीं तो जियेगा ना..।
अपनी मर्ज़ी से अपनी जात बदल तो नहीं सकता…।
अगर बदल सकता तो वो भले ही सोचता रह जाता लेकिन कुसुम ज़रूर अपनी जात बदल कर उससे ब्याह कर लेती..।
आजतक उस लड़की ने साफ़ शब्दों में कभी अपने प्यार का इज़हार नहीं किया लेकिन फिर भी उस पर कितना भरोसा हो गया था राजेंद्र को..।
यहीं तो प्यार है…।
हाँ उसे समझ आ गया है कि उसे भी कुसुम कुमारी से प्यार हो गया है..।
बेइंतिहा प्यार… !
दो दिन के भूखे प्यासे बेचैन राजेंद्र को अब जाकर चैन मिला..
उसने अपनी पीठ पर एक बैग टांगा और अपनी बाइक निकाल कर दूर्वागंज के लिए निकल गया..
*****
“पगला गयी हो क्या कुसुम ? तुम शॉपिंग करने गजदलपुर जाओगी.. ? ऐसा क्या सामान है जो यहाँ नहीं मिलता ?”
“अम्मा आप नहीं समझेंगी.. एक स्पेशल गहना जेवर का दुकान आया है वहाँ !”
“ऐसा कौन सा गहना गुरुआ मिल रहा है वहाँ ?”
“अम्मा मनिष्क का दुकान खुला है उसके गहनों का डिज़ाइन देखेंगी ना, आंखें चुंधिया जाएँगी.. और तुम तो चलो बूढ़ा गयी हो भाभी की तो अभी उम्र खिल रही है, उन पर ख़ूब फबेगा सब.. !”
वहीँ खड़ी सुजाता की आंखें चमक गयी..
“हो आने दीजिये ना अम्मा जी.. ना हो तो आप भी चली जाइये.. !”
“तुम और आग मा घी छिड़क दो.. अपने ससुर को नहीं जानती हो क्या..? हमको कहीं जाने देंगे भला.. फिर उनका खाना पानी कौन करेगा, उनका हुक्का में गरम कोयला कौन डलवाएगा.. बोलों.. ?”
सुजाता अपना सा मुहँ लेकर बैठ गयी.. उसे कुसुम के इरादों की भनक ना थी..
“और उस पर ये लाड़कुंवर अपनी फटफटिया में जाना चाहती हैं.. !”
“अरे नहीं.. ये तो गलत बात है.. नंद रानी जी घर की गाड़ी में डिरैभर के साथ चली जाइये.. भावना भी तो जायेगी ना !”
“हाँ भाभी.. हम दोनों ही नहीं बल्कि भावना की अम्मा भी जायेगी !”
कुसुम की इस बात को सुन उसकी अम्मा को बड़ी राहत मिली..
“ये तो अच्छी बात है फिर.. ऐसा है तो फिर निकल जाओ.. अपने बाबूजी के खेत खार से लौटने के पहले वापस आ जाना..।
आज पंचायत बैठने वाली है तो दुनो झन बाप बेटा वहीँ से लौटने में अबेर कर देंगे..।
पर सुनो लड़की तुम अगर बेला कुबेला की ना तो हम तुम्हारा टांग तोड़ देंगे..जान लिए रहो।”
कुसुम ने लपक कर अपनी माँ का गाल चूमा और रसोई से बाहर भावना का हाथ थामे भाग गयी..
“ऐ… घर का गाड़ी में ही जाना.. !”
उधर से उसकी माँ की आवाज़ आई और हामी भरती कुसुम फटाफट ड्राइवर को साथ लेकर स्कॉर्पियो में निकल गयी….
हालाँकि उसका मन ड्राइवर को लेकर जाने का नहीं था, लेकिन और कोई उपाय भी नहीं था..
उनकी गाडी गजदलपुर से दूर्वागंज के हाइवे पर भागने लगी…
*****
अखंड अपने कमरे में बैठा वापस कॉलेज की उन यादो में खोया हुआ था..
डीन सर से बात होने के बाद तय हुआ था कि रैली में अखंड और धीरेन्द्र दोनों ही लड़के अपनी गैंग के साथ सहयोग करेंगे.. और हुआ भी वहीं..
इन दोनों दलों के सहयोग के कारण रैली में काफ़ी भीड़भड़ हो गयी थी, हालाँकि मेडिकल वाले विद्यार्थी थे इसलिए उन लोगों ने इस बात का पूरा ध्यान रखा था कि उनकी रैली के कारण ट्रैफिक जाम ना हो..
रैली शांतिपूर्ण ढंग से आगे बढ़ कर व्यापारिक संस्थानों में जा कर निशुल्क स्वास्थ्य जागरूकता पर पैम्फलेट बाँट रहीं थी और उनसे चंदे की मांग कर रही थी..।
ज्यादातर जगहों पर व्यापारियों को कैंसर के बारे में जागरूक करने और चंदा मांगने के लिए क्लास के कुछ दो एक लड़के लड़कियां ही आगे थे..।
रेशम अब तक चुपचाप ही चल रहीं थी..।
और वो इस बात से पूरी तरह अनजान थी कि अखंड उससे एक निश्चित दूरी पर चलता हुआ सिर्फ उसे ही देख रहा था..
गर्मी बहुत थी, और एक जगह चौक पर रैली को रोक कर रैली के मुखियाओं ने कोल्डड्रिंक्स पीने का प्रस्ताव रखा.. सारे ही विद्यार्थी खुश हो गए..।
सबके लिए बॉटल्स खरीद कर बाँटने का काम शुरू हो गया..।
रेशम खुद भी लोगों में बांटती फिर रहीं थी..।
वो अखंड के सामने आई और उसके सामने एक बॉटल बढ़ा दी..
“आप खुद भी तो लीजिये !”
इतने लोगों को कोल्डड्रिंक्स बाँटने के बाद पहला कोई था जिसने उसे पीने के लिए पूछा था, रेशम ने चौंक कर ऑंख उठाई और उसे देख कर जवाब दे दिया..
“जी मैं कोल्डड्रिंक्स नहीं पीती !”
“क्यूँ ?”
“ऐसे ही.. बस !”
“काहे.. ये शराब थोड़े है !”
अखंड को ये बात अच्छी नहीं लगी कि इतनी धूप में सबको घूम घूम कर कोल्डड्रिंक बाँटने वाली खुद नहीं पी रहीं.. उसके दिल में मरोड़ सी उठने लगी..
क्या करूँ ? आखिर क्या करूँ की रेशम को भी गर्मी से राहत मिल जायें.. वो यहीं सोचने लगा और तब तक में रेशम आगे बढ़ गयी…
उसने अपनी बॉटल गोलू को पकड़ाई और एक तरफ से होकर भरी धूप में रोड पर निकल गया..
आखिर बहुत दूर निकल जाने पर उसे उसके काम की चीज़ दिख गयी..
वो भागता हुआ सा वहाँ पहुंचा और उससे सामान लेकर वापस लौट गया… उसे पता था रैली आगे बढ़ गयी होगी इसलिए तेज़ी से कदम भरता वो आगे बढ़ने लगा..
कहीं कहीं पर दौड़ भी लगा लेता..
आखिर वो उन लोगों तक पहुँच ही गया… गोल चौक पर रुकी रैली अब वहाँ से चल कर घड़ी चौक पहुँच चुकी थी, और अखंड ने घड़ी चौक पर रैली को पकड़ ही लिया..
वो जैसे चुपके से निकल कर गया था, वैसे ही धीमे से शामिल हो गया..
“भैया जी बड़ी दूर से आ रहे लगता है.. ?”
उसके माथे पर चमकता पसीना और धूप से लाल हुआ पड़ा चेहरा उसकी चुगली कर रहा था..
“हाँ गोलू.. आसपास कहीं कुछ मिला ही नहीं !”

Nice