अपराजिता- 25
कहानी में अखंड और रेशम वाला हिस्सा अतीत में चलेगा, कुसुम कुमारी और राजेंद्र की प्रेम कहानी का भी हिस्सा अतीत में चलेगा…
लेकिन उसी के साथ रेशम और अथर्व की कहानी वर्तमान में चल रहीं है.. !!
कृपया इस में कन्फ्यूज़ ना हों…
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रेशम और अथर्व घर आ गए…
अथर्व तेज़ी से ऊपर अपने कमरे में नहाने चला गया और रेशम अपनी सास के साथ रसोई में लग गयी..
रात का खाना पीना निपट रहा था…. आरव वहीँ हॉल के सोफे पर बैठा अपना लैपटॉप खोले कुछ कर रहा था..
“तू क्यूँ नहीं खा रहा आरव ?”
“भैया खा के आया हूँ.. ! आज कॉलेज में स्पोर्ट्स डे ख़त्म हुआ ना, उसके बाद हम सब प्लेयर्स का डिनर था..
“ओके… !”
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अथर्व और उसके पिता खा रहे थे और रेशम परोसती जा रहीं थी… अथर्व जानबूझ कर धीरे खा रहा था, जिससे उसके पिता खा कर उठ जायें और रेशम भी अपनी थाली परोस लें..
वहीं हुआ, अथर्व के पिता खाना खा कर उठ गए और रेशम ने अपनी सास की थाली परोस दी.. वो भी वहीं बैठी खाने लगी..
“तुम भी अपनी ले आओ !”
अथर्व के आग्रह पर रेशम ने अपनी सास की तरफ देखा उन्होने भी बेटे के सामने उसकी हाँ में हाँ मिला दी..
“हाँ अपनी थाली भी ले आओ बहु…. . !”
रेशम परोस कर ले आई…
लौकी और रोटियां देख कर उसका जी दुःख गया… पता नहीं कैसे इस दुनिया के लोग लौकी निगल लेते हैं..?
वो अपनी प्लेट देखते हुए सोच रहीं थी कि अथर्व ने अपनी माँ की नज़र बचा कर एक छोटा सा निवाला रेशम की तरफ बढ़ा दिया.. रेशम ने भी देखा कि उसकी सास का पूरा ध्यान टीवी पर है, और उसने लपक कर वो निवाला खा लिया..
और उसे लगा उसके मुहँ में अमृत घुल गया..
लौकी की सब्जी में ज़रा दही लगा कर ही अथर्व खा रहा था, और उसे भी वहीं खिलाया था..
उसकी थाली में उसकी सास ने दही भी परसवाया था….
उसे पहले मालूम होता तो अपने में भी परस लाती, लेकिन खाते हुए बीच में उठ कर दूध दही छूना सासु माँ को पसंद ना था..
वो क्या करें ये सोच रहीं थी का अथर्व ने आरव को आवाज़ लगा दी..
“आरव.. सुन.. मेरे लिए ज़रा दही ले आ !”
उसकी माँ ने सुना तो खुद उठने लगी.. लेकिन अथर्व ने टोक दिया..
“अरे मम्मी.. तुम रुको, ऐसा होता तो रेशम को भेज के मंगवा लेता ना, तुम दोनों खाने से मत उठो, तभी तो आरव को आवाज़ दी.. घिस नहीं जायेगा तुम्हारा बेटा अगर ज़रा हिल डुल लेगा तो.. !”
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आरव लैपटॉप एक तरफ रख अथर्व के लिए दही लेने चला गया.. “अच्छा सुन, एक कटोरी में अपनी भाभी के लिए भी ले आ.. !”
हे भगवान ये आदमी जादूगर है क्या ? कैसे ये मन में आये कोई भी भाव इतनी आसानी से पढ़ लेता है…
रेशम ने अथर्व की तरफ देखा, वो अपना खाना खाने में मगन था..
वो भी मुस्कुरा कर लौकी खाने लगी..
वाकई जब ज़िंदगी में प्यार आ जायें तो बेस्वाद वस्तुएं भी स्वाद लगने लगती हैं…
खाना खा कर रेशम बर्तन समेटने रसोई में चली गयी… वो काम निपटा रहीं थी कि वो चुपके से आकर उसके कान में “जल्दी आना, मैं इंतज़ार कर रहा हूँ !” कह कर उसके शरीर में सनसनी भर कर चला गया और वो मुस्कुरा कर जल्दी जल्दी हाथ चलाने लगी..
सासु माँ के एक पर एक हुकुम निपटाती रेशम सब कर के ऊपर चली गयी तब तक अथर्व कुछ तैयारी किये बैठा था..
रेशम जैसे ही कमरे में अंदर दाखिल हुई उसे देख अथर्व मुस्कुरा उठा….
“रेशम.. तुम्हारे लिए कुछ लाया हूँ.. !”
“गिफ्ट है.. ?”
“हम्म… ! पहले सोचा था तुम्हें तुम्हारे घर पर ही दे दूंगा, लेकिन फिर रुक गया.. लगा अपने कमरे में ही दूंगा.. !”
“क्या है.. ?”
रेशम मुस्कुरा उठी..
अथर्व ने पॉलीबैग से निकाल कर एक बॉक्स रेशम के सामने कर दिया..
रेशम ने अथर्व के हाथ से बॉक्स लिया और फटाफट उसकी पैकिंग खोल डाली..
“क्या बात है अनबॉक्स करने में तो माहिर हो.. !”
“हाँ फिर ? मेरे घर पर हम ऑनलाइन कुछ भी मंगाते थे तो अनबॉक्स मैं हीं करती थी।”
रेशम ने चहक कर कहा और अथर्व उसे घूरते हुए वापस एक चटकिली सी बात कह गया…
” मुझे अनबॉक्स कब करोगी? मैं भी तो इंतजार में हूं!”
रेशम उसकी बात सुनकर झेंप गई, लेकिन तब तक उसने उस बक्से को खोल लिया था..
अंदर से लेटेस्ट वर्शन का मोबाइल निकला और उसे देखकर रेशम चहक उठी..
वह खुद भी बहुत दिनों से अपना मोबाइल बदलने की सोच रही थी..
उसका दिल किया वह अथर्व के गले से लग जाए..
उसने अथर्व की तरफ देखा और अथर्व ने धीरे से अपनी बाहें फैला दी..
” देखो अगर मुझसे चिपकने का मन करता है तो अपने आप को रोका मत करो, फटाफट आकर मेरे गले से लग जाया करो..!”
रेशम ने धीरे से हामी भर दी.. वह बहुत खुश नजर आ रही थी। उसने चेहरा उठाकर अथर्व की तरफ देखा, अथर्व मोबाइल को ऑन करके उसके फीचर्स रेशम को बता रहा था।
एक बाँह से रेशम को खुद में समेटे वह दूसरे हाथ में मोबाइल को पकडे उस के लेटेस्ट फीचर्स रेशम को समझाने में मगन था और रेशम अपने मनोहारी पति को आंखों ही आंखों में पी रही थी….
उसके साउंड की तारीफ करते हुए अथर्व ने मोबाइल पर कोई सॉन्ग लिस्ट चला दी..
“ऐ अजनबी तू भी कभी आवाज़ दे कहीं से..
मैं यहाँ टुकड़ो में जी रहा हूँ, मैं यहाँ टुकड़ो में जी रहा हूँ…
तू कहीं टुकड़ो में जी रहीं…. !”
ये गाना चला और जाने क्यूँ रेशम का दिल दप से बुझ गया….
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दीपक को मालूम चल गया था कि राजेंद्र अपने दोस्तों के साथ गाँव छोड़ने की तैयारी कर के वहाँ से निकल चुका है..
लेकिन यही तो दीपक को नहीं चाहिए था। अगर राजेंद्र गांव छोड़कर चला जाता है तो फिर सारी बात ही खत्म हो जाएगी। दीपक अपने एक दोस्त के साथ यही सोचने में लगा था कि कैसे राजेंद्र को रोका जाए, तभी उसके दिमाग में एक विचार आया…
दीपक के पहुँचते तक में राजेंद्र निकल चुका था..
वो कहाँ गया, किस शहर में है ये कोई बात गाँव में किसी को मालूम नहीं थी..
लेकिन दीपक ने पता करवा लिया..
कुसुम पहचानती थी लेकिन राजेंद्र का आमना सामना कभी दीपक से नहीं हुआ था, और इसलिए वह दीपक को नहीं जानता था..
अखंड और यज्ञ के कुसुम कुमारी के घर से लौटने के बाद दोनों घरों में रिश्ते को लेकर आपसी सहमति बन गई और जितनी जल्दी हो सके उस तारीख पर ब्याह निपटा देने की गुजारिश कुसुम कुमारी के भाई चंद्रभान की तरफ से बड़े ठाकुर के घर पहुंच गई। उन लोगों को भी जल्दी ब्याह निपटाने में कोई एतराज नहीं था, वैसे भी अखंड की मां शचि को इस बात की जल्दी थी कि कम से कम एक बहु तो उनके घर आए…
अखंड की फिजूल सी जिद के बाद एक बार शचिरूपा ने अपने मायके के किसी पहुंचे हुए पंडित जी को अखंड की कुंडली दिखाई थी, जिसमें अखंड की कुंडली देखकर उन्होंने कहा था कि अगर छोटे भाई की बहू पहले आ जाए तो अखंड की जिंदगी में भी रंग बढ़ते हुए नजर आ रहे हैं। ग्रहों की गति कुछ ऐसे बदलेगी के अखंड की जिंदगी में किसी औरत का आगमन होगा। उन्होंने कुंडली को जिस ढंग से समझा उस ढंग से बांच दिया और उनके बांचने का अर्थ शशि रूपा ने यह लगाया कि अगर छोटे भाई की पहले शादी हो जाएगी तो उसके बाद शायद अखंड भी शादी के लिए तैयार हो जाएगा इसलिए उनकी तरफ से भी यज्ञ की जल्दी शादी में किसी तरह की कोई रुकावट नहीं थी…
पंडित जी ने जब कुसुम कुमारी की तस्वीर यज्ञ के लिए दिखाई थी उसी के बाद शचिरूपा अपने मायके गई थी और वहां अखंड की कुंडली दिखा कर आई थी, उसके बाद से ही उन्हें कुसुम कुमारी के रिश्ते में कुछ ज्यादा ही रुचि जागने लगी थी..।
बड़े ठाकुर के परिवार की तरफ से भी मुहूर्त निकालने के लिए भोलाराम पंडित जी को ही याद किया गया और पंडित जी अपना पोथा पत्रा उठाएं उनके घर पहुंच गए बड़े ठाकुर के घर पर ही चंद्रभान को भी बुला लिया गया था। और वहां सब बैठकर कुसुम कुमारी और यज्ञ की संभावित शादी की तारीख निकालने में व्यस्त हो गए..
इधर कुसुम अपनी छत पर खड़ी बाल सुखा रही थी कि तभी उसे सामने से भावना आती दिखाई दी भावना को देखकर वह मुस्कुरा उठी। भावना सीधे उसके कमरे में चली आई..
” कुसुम तूने कुछ सुना..
” किस बारे में भावना..?”
” तेरे डॉक्टर साहब गांव छोड़ कर चले गए..?”
“क्या.. कब ? हमें पता भी नहीं चला ?”
“हम्म.. जिस दिन तुझे देखने लड़के वाले आये थे ना, शायद उसी दिन !”
कुसुम अपना माथा पकड़ कर वहीं कुर्सी पर ढेर हो गई। भावना तुरंत उसके पास पहुंच गई और उसने कुसुम को अपनी बाहों में समेट लिया। कुसुम ने अपनी बाहों का घेरा भावना के इर्द-गिर्द लपेटा और उसके पेट पर अपना सर टिकाए सिसक उठी। उसे नहीं पता था कि राजेंद्र उसे बिना कुछ बोले बताएं ऐसे चला जाएगा। लेकिन कुसुम कुमारी चुपचाप टसुंऐ बहाने वाली लड़कियों में से नहीं थी। घड़ी भर आंसू रोने के बाद उसने अपने आंसू पोछे और भावना की तरफ देखने लगी..
“भावना चलो हमारे साथ ?”
“लेकिन कहाँ ?”
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“चलो तो सही.. !”
कुसुम भावना को साथ लिए घर से निकल गई। उसके निकलते में उसकी मां ने उसे रोककर पूछा भी कि वह कहां जा रही है लेकिन कुसुम ने जल्दी वापस आते हैं कहकर उनके सवाल पर अपने जवाब की तख्ती लगा दी और निकल पड़ी।
वह भावना को लिए सीधा राजेंद्र के घर के सामने पहुंच गई। उसे मालूम था कि गेंदा और सरना कहीं आस-पास ही रहते हैं। वह यह भी जानती थी कि राजेंद्र के बारे में सरना को मालूम होगा ही, उसका सोचना सही निकला। सरना उसे राजेंद्र के घर से कुछ दूर बनी पान की टपरी पर बैठा मिल गया।
कुसुम ने अपनी गाड़ी ठीक सरना के सामने जाकर लगा दी।
कुसुम को अपने सामने देख सरना घबरा कर खड़ा हो गया।
” आप यहां कैसे?”
” आपसे कुछ बात करनी है।”
सरना वहां बीच सड़क पर कोई तमाशा नहीं करना चाहता था। इसलिए चुपचाप हां में गर्दन हिला कर एक तरफ की गली में बढ़ गया। कुसुम भी भावना के साथ उसी तरफ बढ़ गई।
उस गली में बहुत आगे जाने के बाद एक छोटा सा जीर्ण शीर्ण शिव मंदिर था। सरना उस मंदिर के सामने बने चबूतरे पर जाकर खड़ा हो गया। कुसुम भी वहां पहुंच गई।
” डाक साहब कहां चले गए?”
कुसुम ने बिना किसी औपचारिकता के जो जानने आई थी वही सवाल पूछ लिया।
सरना ने ना में गर्दन हिला दी ।
“हमें नहीं पता ।”
“झूठ मत बोलिए। हम जानते हैं दुनिया में और किसी को पता हो ना हो, आपको जरूर पता होगा कि डाक साहब कहां चले गए?”
“कुसुम जी आपसे हाथ जोड़कर निवेदन करते हैं, राजेंद्र को भूल जाइए। वह आपकी जात बिरादरी का नहीं है। अगर आपके भाई को या आपके पिताजी को पता चल गया तो उसके छोटे-छोटे टुकड़े करके नदी में बहाने में भी आपके भाई को किसी तरह का संकोच नहीं होगा। आप बड़े लोग हैं, और शादी-ब्याह प्यार मोहब्बत यह सब अपने बराबर के लोगों में ही सुहाता है।”
“यह हमारी जिंदगी है ,और उसे कैसे जीना है यह हम अच्छी तरह से जानते हैं। आप ये बताइए कि राजेंद्र बाबू कहां है?”
“हम नहीं बता पाएंगे, क्योंकि वो हमारा दोस्त और हम उसकी जिंदगी से किसी तरह से कोई खिलवाड़ नहीं कर सकते।”
” अच्छी बात है! आप उसकी जिंदगी से खिलवाड़ नहीं कर सकते ना, लेकिन हमारी जिंदगी से सकते हैं।”
कुसुम ने वही रास्ते पर पड़ा ब्लेड उठाया और अपनी कलाई पर उसको रख लिया।
सरना और भावना दोनों ही घबरा उठे। भावना ने तुरंत कुसुम का हाथ पकड़ने की कोशिश की और कुसुम ने भावना को देखकर उस ब्लेड को अपनी गर्दन पर रख लिया।
” हमसे दूर हो जाओ भावना!! अगर हमें रोकने के लिए हमारे पास आओगी तो तुम जानती हो कि हम कितने बड़े पागल हैं। हम इस ब्लेड को अपनी गर्दन पर चला लेंगे, और सरना बाबू ध्यान रहे, हमारी मौत का ठीकरा आपके सर पर फूटेगा।”
” कुसुम जी यह सब क्या मजाक है? भावना जी आप ही क्यों नहीं समझाती।”
भावना की तरफ देखकर सरना ने कहा और भावना ने ना में गर्दन हिला दी..
उसके भावों से स्पष्ट हो रहा था कि उसके हाथ में कुछ भी नहीं है..
कुसुम ने भावना और सरना की तरफ देखा और अपनी गर्दन पर ब्लड को जरा जोर से चुभा दिया..
खून की धार बह निकली और भावना के गले से जोर की चीख निकल गई..
सरना दोनों हाथ जोड़े कुसुम के सामने गिड़गिड़ाने लगा..
“कुसुम जी यह ब्लेड छोड़ दीजिए, अगर आपके भाई साहब को पता चल गया कि आप हमारे कारण इतनी परेशानी में है तो वह हमारा खून कर देंगे।”
” अगर नहीं चाहते हो कि हमारे भाई साहब आपका खून करें तो हमें बताओ कि हमारे डॉक्टर साहब कहां है..?”
“गजदलपुर में है..
दूर्वागंज से सत्तर किलोमीटर पर शहर है, गजदलपुर.. वहीँ रह कर उन्होंने अपनी पढाई पूरी की है…
वहीं कमरा लेकर रहा करते थे, वो तो उनकी नयी पोस्टिंग यहाँ हुई थी.. ईमानदारी से काम कर रहें थे कि आपके भाई अपने गुंडों की फौज लेकर 1 दिन आए और राजी पर चढ़ गए।
साफ-साफ कह दिया कि अगर राजी यहां इस गांव में रहकर काम करेगा तो जिंदा नहीं बचेगा और सिर्फ राजी ही नहीं उसके यहां रहने से हम सबकी जान पर बन आई। अगर आपके भैया ने हम लोगों की जान ले लेने की धमकी ना दी होती तो, हो सकता है राजेंद्र यहां से जाता भी नहीं…
लेकिन वह इतना सच्चा और इमानदार है कि अपने खुद के कारण हम लोगों की जिंदगी का सौदा नहीं कर सकता और इसलिए हम सब के समझाने पर वह चुपचाप यहां से चला गया। आपसे निवेदन करते हैं कुसुम जी अब आप उसे उसके हाल पर छोड़ दीजिए। उसकी जिंदगी में वैसे भी कोई सुख, कोई खुशी नहीं रही है।
उसके माता-पिता शुरू से ही नहीं थे, एक दादाजी थे वह भी अब नहीं रहे। बेचारे को अपनी जिंदगी जीने दीजिए, खाने कमाने दीजिए। वैसे भी आप बहुत ऊंचे लोग हैं।
कुछ समय में आप का ब्याह हो जाएगा, आप अपने पति और नए घर में रम जाएंगी और राजेंद्र को भूल जाएंगी।
वही चीज उसके साथ पर होगी ।बस थोड़ा सा वक्त दीजिए एक दूसरे को..सब ठीक हो जायेगा !”
“हां वक्त तो देना ही है,लेकिन एक दूसरे के साथ रहते हुए… समझे! चलो पता ठिकाना लिख कर दो और सुनो डाक साहब का कोई दूसरा फोन नंबर भी है क्या? क्योंकि जब भावना ने हमें बताया तो हमने उन्हें उनके मोबाइल पर फोन किया था, उनका नंबर बंद आ रहा है..!”
“आपके भाई साहब ने राजेंद्र का मोबाइल तोड़ फोड़ दिया था, वहां जाने के बाद उसने नया मोबाइल लिया तो है लेकिन नंबर किसी को भी देने से मना..!’
सरना की बात पूरी हो पाती उसके पहले ही कुसुम ने वापस ब्लेड से अपने गले पर घाव बनाना शुरू किया और सरना ने फटाफट राजेंद्र का नंबर उगल दिया…
कुसुम ने ब्लेड एक तरफ फेंका और अपने मोबाइल पर राजेंद्र का नंबर सेव कर लिया..
” अब सुनिए सरना बाबू, अगर आपने राजेंद्र बाबू को हमारे आने और उनका मोबाइल नंबर लेने के बारे में कुछ भी बताया तो याद रखिएगा कुसुम कुमारी को वक्त नहीं लगेगा इस ब्लेड से अपनी गर्दन को चीर देने में।
राजपूतानी है हम, हमें खून देखकर डर नहीं लगता। बल्कि खून देखकर अंदर से उबाल आता है, समझ रहे हैं ना आप। ना हमें किसी को मारने में संकोच होता है और ना खुद मरने में..।”
“फिर हमारी एक बात मान लीजिए, आप ऐसा कीजिए कि राजेंद्र से मिलने से अच्छा अपना सामान बांध कर उसके पास ही चले जाइये..,कभी वापस नहीं लौटने के लिए.. !”
“ऐसे कैसे सामान लेकर चले जाएं सरना जी..
एक मौका तो हम अपने घर वालों को भी देंगे। उनकी इज्जत पर बट्टा नहीं लगाएंगे,क्योंकि हम जानते हैं उनके लिए उनका नाम, उनका रुतबा, उनकी नाक बहुत ऊंची चीज है। और हमारी हमारे घर वालों से कोई दुश्मनी थोड़ी है कि उनके नाम को बट्टा लगाकर हम भाग जाएंगे। उन से एक बार तो बात करनी बनती है ना।
हां अगर वह लोग नहीं माने, तब फिर सोचेंगे कि क्या करना है? लेकिन बिना बताए घर से भागेंगे नहीं। यह बात पक्की है, अभी फिलहाल जा रहे हैं डॉक्टर बाबू से उनके मन की बात जानने..।”
” कुसुम तुम गजदलपुर तक जाओगी..?”
” हां भावना और हम अकेले नहीं तुम भी हमारे साथ जाओगी..।”
भावना ने अपने माथे पर हाथ मार लिया और कुसुम ने उसकी बांह पकड़ी और उसे खींचते हुए अपने बाइक की तरफ लेकर आगे बढ़ गई..
भावना ने अपने पर्स से रुमाल निकाल कर कुसुम का जख्म पोंछ दिया और एक बार फिर अपनी इस सनकी और सिरफिरी सखी के साथ उसके पथरीले रास्ते में हमसफ़र बनने निकल गयी …
क्रमशः
aparna…
