अपराजिता -23

“कुसुम ? “अखंड के माथे पर बल पड़ रहें थे..

“अरे.. वहीं लड़की, जिसे देखने गए रहे !” याज्ञ ने जवाब दिया

“उसे तो हमनें नहीं देखा.. लेकिन हमारे देखने ना देखने से फर्क भी नहीं पड़ता.. तुमको पसंद है ना बस.. हम तो वैसे भी जेठ लगते हैं.. हमारा देखना ना देखना एक बरोबर है.. !”

एक गहरी सी साँस लेकर यज्ञ मुस्कुरा उठा…

रास्ते में एक जगह एक तालाब देख कर अखंड ने गाड़ी रुकवा दी..

“यज्ञ तुम घर जाओ.. हम थोड़ी देर में आते है !”

“अकेले यहाँ क्या करियेगा ?”

“अबे आ जायेंगे यार.. चिंता ना करो, हम कोई दूध पीते बच्चे हैं का ? जाओ.. !”

और यज्ञ के मना करने के बावजूद अखंड वहाँ उतर गया…
कुसुम के घर पर के कबूतर देख कर उसे अचानक कुछ सालों पहले की सारी बातें याद आने लगी थी…
वो शांत अकेला बैठ कर उन यादों में डूब जाना चाहता था…

लम्बे लम्बे ठहरे हुए से डग भरता वो तालाब के किनारे की सीढियों पर जा बैठा… वहीँ एक तरफ छोटा सा शिवालय था। जहाँ कुछ देर पहले ही कोई एक नन्हा सा दिया जला कर रख गया था, इसके साथ ही वहाँ जलती धूप की सुवास अखंड तक उठती चली आ रहीं थी..
उसके मुँह से स्वत: ही “जय महाकाल” की आवृत्ति होने लगी… और अचानक वो कुछ साल पीछे चला गया..

उस समय वो पोस्ट ग्रेजुएशन पूरा कर चुका था। लेकिन उसका छात्र राजनीति से प्रेम ऐसा था कि विश्विद्यालय छोड़ने का उसका मन ही नहीं करता था..।
राजनीति उसका पहला प्रेम था, और उसने लड़कपन से ही लोकसभा में बैठने के सपने देखे थे..
उसके विश्वविद्यालय में उसकी बड़ी पूछ परख थी.. और वो वहाँ का युवा छात्र संघ अध्यक्ष था..

जहाँ एक तरफ उसके चाहने वालों की भीड़ थी, वहीँ उससे चिढ़ने वाले और उसका पैर पकड़ कर खींचने वाले भी कम नहीं थे..

उसी के खिलाफ दो बार से चुनाव हारने वाला मारुती  यादव उसका सबसे बड़ा दुश्मन था…।

विश्वविद्यालय, के तमाम बड़े छोटे मसलों में अखंड परिहार का दखल ना हो ऐसा सम्भव ना था…।
पूरा कॉलेज उसे एपी भैया के नाम से जानता था..

शहर का मेडिकल कॉलेज भी विश्वविद्यालय का ही हिस्सा था, और वहाँ के डीन का कोई बवाल चल रहा था….।

किसी लड़के का सलेक्शन हॉउस जॉब के लिए  सामान्य वर्ग से हो रहा था, लेकिन अनुसूचित जाति की लड़की के नंबर कक्षा में सबसे अधिक होने के कारण वो लड़की टॉप कर गयी थी, और इसलिए सामान्य की पांच सीट्स में पहली सीट पर उसका चयन हुआ था, जिसकी वजह से सामान्य श्रेणी से चयनित लड़के अंबर झा का नंबर पांचवे से खिसक कर छठंवे नंबर पर आ गया और इस तरह वो हॉउस सर्जन शिप करने से चूक रहा था..
किसी दोस्त की सलाह पर उसने अखंड परिहार की शरण ली थी। अखंड ने जब सारी बात सुनी तो वह अपने गुर्गों को साथ लिए मेडिकल कॉलेज के डीन से मिलने पहुंच गया था….. ।

वो तेज़ी से आगे बढ़ रहा था, वो लड़का अंबर उसके साथ साथ चलता उसे मुआमला समझता भी जा रहा था..

लड़कों की ढ़ेर सारी भीड़ की अगुआई करता वो प्रिंसिपल के कमरे की तरफ बढ़ रहा था कि, ऊपर की बालकनी में बैठे कुछ कबूतर ज़ोर से पंख फड़फड़ाते हुए उड़े और उन कबूतरों में से एक ने उड़ते हुए अपनी चोंच में पकड़ रखा कुछ सामान गिरा दिया..
वो चीज़ गिर कर उसकी सफ़ेद कमीज़ को एक बेढंग धब्बे से संवार जाती कि उसके पहले ही सामने से आती वो उससे टकराई और घूम कर वो दूसरी तरफ की दीवार से टकरा गया..
वो लड़की भी लड़खड़ा कर सम्भल गयी…
लेकिन उसका दुपट्टा उड़ कर ज़मीन पर गिर गया…

“भैया जी बच गए, वरना अभी कबूतर ने गन्दा कर दिया था.. !”

अपने चमचे की बात पर ध्यान दिये बिना उसने सामने खड़ी उस हिरनी सी घबराई लड़की को देखा..
वो भी उसे ही देख रही थी…
उस लड़की ने आंखें मिलते ही अपनी नज़र हटाई और अपना दुपट्टा उठा कर गले से लपेट लिया और तेज़ी से एक तरफ चली गयी…
उसके जाने के बाद भी वो उसकी खुशबू उन हवाओं में महसूस करता आंखें मूंदे कुछ पल खड़ा रह गया….

दुपट्टा उठाने के चक्कर में उसका दुपट्टा ज़रा सा अखंड की उँगलियों से भी छू गया था….
अखंड ने अपनी उँगलियाँ सूंघी और उसे महसूस हुआ जैसे केसर का कट्टा किसी ने उस पर बिखेर दिया..

तेज़ चिलचिलाती धूप में भी उसे यूँ लगा वो बादलों पर सवारी कर रहा हैं…..

ऐसा उसके साथ इसके पहले कभी नहीं हुआ था..
वो गुस्सैल सनकी बददिमाग और ज़बरदस्त घमंडी लड़का था, शायद इसलिए उसके जीवन में अब तक कोई लड़की नहीं आई थी, जिसके साथ वो भावनात्मक रूप से जुड़ सकें…..

लेकिन आज उस लड़की को देखने के बाद जैसे उसका जीवन ही बदल सा गया था..
लेकिन ऐसा कैसे सम्भव है, अखंड परिहार किसी लड़की पर दिल हार जाएं.. ?
नहीं ऐसा हो ही नहीं सकता..
वो अपने सर को झटक कर आगे बढ़ गया…।

प्रिंसिपल के दरवाज़े के ठीक बाहर पहुँच कर वो ठिठक कर खड़ा हो गया..

“अबे सुनो.. हम यहाँ आये किसके लिए हैं बे.. ? चन्दर का एड्मिसन बाकी है क्या ?”

अखंड एकदम से यही भूल बैठा कि वो वहाँ आया किसलिए हैं, उसका चेला गोलू बोल पड़ा..

“कैसन बात कर रहें हैं भैया जी…? चंदन नहीं अंबर का मसला है.. वो डाक्टर लोगों का कुछ होता है ना, पढाई के बाद होम सर्जरी..

“अबे गंवार.. होम सर्जरी नहीं, हॉउस सर्जनशिप… इंटर्नशिप के बाद साल भर के लिए कॉलेज के ही अस्पताल में साल भर का नौकरी मिल जाता है, और ये सिर्फ शुरुआती दस टॉपर लड़का लड़की को ही मिलता है.. कहते हैं सरकारी नौकरी में घुसने के लिए जब इन लोगों को परीक्षा देना होता है तो, उसमें इस नौकरी के अनुभव का भी फ़ायदा मिलता है। इसलिए ये लोग जी जान से जुट कर पढाई करते हैं कि हाउस सरजनशिप पा सके… …

“तुमको बहुत नॉलेज है बे… ?”

अखंड के पूछने पर दूसरा लड़का लल्लन खुद पर इतरा गया..

“सब जाने बुझे रखते हैं भैया जी, हमको भी राजनीति में घुसना है.. !”

“हम्म.. लगे रहो बेटा.. !”

उसका कंधा थपथपा कर अखंड अंदर दाखिल हो गया..
उसे नहीं मालूम था कि अंदर डीन सर कुछ मेडिकल स्टूडेंट्स को कुछ बता रहे थे..
डीन सर भी अखंड को पहचानते थे..
अखंड के झांकते ही उन्होंने उसे देखा और हामी भर उसे अंदर बुला लिया..

“हमें मालूम नहीं था आप बीजी है.. वरना बाद में आ जाते.. !”

“अरे आ जाओ.. ऐसा भी कुछ नहीं.. ये सब फर्स्ट ईयर के विद्यार्थी है.. यूथ फेस्ट शुरू होने वाला है, बस उसी के लिए इन लोगों को सब समझा रहे थे.. !”

अखंड ने हां में गर्दन हिला कर एक नज़र उन नए खड़े रंगरूटों पर डाली और उसका दिल धक से रह गया..

वो लड़की यहाँ भी खड़ी थी..

वहीं शर्मीली सी नज़र, वहीं माथे पर इठलाती ज़िद्दी सी लट, होंठो को बीच बीच में काटती उसकी आदत और बेहिसाब खूबसूरती..
लड़के लड़कियों के बीच खड़ी वो अप्सरा सी लग रही थी..
अखंड अपलक उसे देख रहा था..

“बोलो परिहार.. कैसे आना हुआ ?”

अखंड एक बार फिर उस लड़की के चक्कर में सब भूल कर रह गया..
डीन सर ने उन लोगों को जाने कह दिया था…

वो लोग जाने लगे कि एक लड़की ने धीरे से उस लड़की को कुछ कहा और वो मुस्कुरा उठी…
उसके हंसने पर उसके होंठ कुछ अलग तरीके से घूम कर ऊपर को मुड़ते थे और दंतपंक्ति अनार के दानो सी सजने लगती थी….

एक गहरी सी साँस भर कर अखंड डीन की तरफ मुड़ कर बैठ गया..

“क्या होने वाला है सर ?”

“अरे कुछ नहीं, मेडिकल वालों का यूथ फेस्ट है, बस उसी की तैयारी के लिये फर्स्ट ईयर वालों को बुलाया था..

“हम आ सकते हैं कि नहीं ?”

“काहे नहीं आ सकते बाबू ? तुम पूरे विश्वविद्यालय के अध्यक्ष हो.. बस अपने पनटरो से कहे रहना ज्यादा उधम ना मचाये.. क्या है ना मेडिकल वालों का एक स्टेंडर्ड होता है.. मेंटेन रखना पड़ता है… !”

“बस सर आप कह दिये, हम मान गए… कसम गंगा मैय्या की जो हमारा कोई लड़का बवंडर किया, हम वहीँ साले की खुपड़िया तोड़ देंगे.. !”

“हम्म.. ठीक है.. ! अभी कैसे आना हुआ ?”

“अरे सर.. ये अंबर झा जी है… नैके डाक्टर है… वो कोई लड़की इनके सर पर आ बैठी है। अब उसके कारण इनका नंबर सरक कर नीचे चला गया है… हॉउस जॉब में नंबरे नहीं लग रहा इनका..।
गरीब घर का लड़का है सर… कुछ देख लेते आप तो हो जाता.. !”

“नहीं कर सकते परिहार.. नियम विरुद्ध भरती नहीं हो पायेगी..।”

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Minakshi Dwivedi
Minakshi Dwivedi
2 years ago

Mam mera matlab hai ki adhure hai naye episode toh koi aisa platform ho toh mujhe link share kare jisse main puri story padh saku

Minakshi Dwivedi
Minakshi Dwivedi
2 years ago

Mam aprajita story me 20 ke baad koi naye episode nahi hai or mujhe padhna hai please kuch help kariye.
Mam hum apke page pe aake padh rahe hai yaha bhi nahi mil rahe hai