अपराजिता -22

मानव कि इन सारी तैयारियों को सुनकर रेशम खुशी से खिल उठी, एक बार फिर अपने भाई के गले से लग गई..

” थैंक यू सो मच मानव!! इन सारी तैयारियों में मुझे भी तेरे साथ होना था और मैं अपने ससुराल में….
अरे मानव!! मेरे ससुराल वालों को भी तो बुलाना होगा ना..! “

” तू क्या सोच रही है, जब मैंने आधे शहर को न्योता दिया है तो तेरे ससुराल को भूल जाऊंगा? कल ही तेरी सासू मां को कॉल कर चुका था और उनसे कह भी दिया था कि तुझसे इस बारे में कोई चर्चा ना करें। समझी !!अब तु अपने रूम में जा, वहां तेरे लिए बहुत सुंदर पार्टी गाउन ला कर रखा हुआ है।
तू फटाफट रेडी हो जा मम्मी पापा आते ही होंगे..!”

” मेरे ससुराल वाले भी तो आएंगे, पार्टी गाउन कैसे पहनूं, साड़ी पहननी पड़ेगी आज..!”

” देख ले… तुझे जो पहनना है तेरे रूम में तेरा सारा सामान रखा है..!”

मुस्कुराकर रेशम घर के भीतर चली गई.. सारे मेहमानों को नमस्ते करते हुए वह सीढ़ियां चढ़कर ऊपर अपने रूम में पहुंच गई। वो अपने कमरे का दरवाजा खोल कर अंदर गई और एक बार फिर उसे ऐसा लगा जैसे, उसके कमरे ने उसकी बाहें गह कर उसे अपने अंक में भर लिया हो..

उसने सबसे पहले पलंग पर रखी नई ड्रेस उठा कर देखी और खुशी से उसे अपने सीने से लगा लिया।
पीच कलर का लॉन्ग फ्रॉक बेहद खूबसूरत था। लेकिन वह जानती थी कि उसकी सास को उसका इतनी मॉडर्न ड्रेस पहनना पसंद नहीं आएगा। उसने उस ड्रेस को वापस उसके बाक्स में रख दिया और अपनी अलमारी खोलकर एक साड़ी निकाल ली।
फटाफट तैयार होकर वह अपने मम्मी पापा के पहुंचने के पहले ही नीचे पहुंच गई। कुछ देर में ही मानव ने बाहर किसी गाड़ी की आवाज सुनी और सब को इशारा कर दिया…
घर पर मौजूद सभी मेहमान शांति से खड़े हो गए। और मानव ने कमरे की बत्तियां बुझा दी। गेट पर गाड़ी से उतर कर मानव के माता पिता घर की तरफ देखने लगे। उन्हें लगा अब तक शायद मानव ऑफिस से नहीं आया है। उन्होंने जैसे ही गेट पार किया और अंदर दाखिल हुए बगीचे में लगी सारी बत्तियां एकदम से जल उठी….।
पूरा बगीचा जगमगाते लट्टूओं से सजा हुआ था। बिजली की झालरों के साथ ही जगह-जगह पर गुब्बारे भी लगे हुए थे। उन दोनों की आंखें खुशी से चौड़ी हो गई, और तभी घर का दरवाजा खुला और मानव और रेशम के साथ ही उनके बाकी सारे रिश्तेदार तालियां बजाते हुए और एनिवर्सरी की शुभकामनाएं देते हुए बाहर चले आए।
पार्टी की सारी व्यवस्था बाहर के लॉन पर ही की गई थी। लॉन काफी बड़ा था। उसके एक हिस्से में खाने पीने की व्यवस्था थी और दूसरे हिस्से में एक गोलाकार टेबल पर केक कटिंग की व्यवस्था की गई थी। रेशम यह सारी व्यवस्थाएं देख देख कर अपने भाई पर बलिहारी जा रही थी।
वाकई मानव जैसा बेटा, मानव जैसा भाई मिलना बहुत किस्मत की बात थी। रेशम भागकर अपनी मां के सीने से लग गई ।
उसने अपने पिता के पैर छुए और उन्हें भी उनकी विवाह वर्षगांठ की बधाई दे दी। रेशम के पिता ने अपनी लाडली बेटी को अपने सीने से लगा लिया। हंसी खुशी के इस माहौल में सभी लोगों से मिलते जुलते रेशम की मां उसका हाथ थामे हुई थी…।
उनके लिए सारे मेहमानों से मिलने की खुशी एक तरफ और बिटिया के घर आने की खुशी एक तरफ थी। उन्हें लग रहा था इतना सब करने से अच्छा मानव सिर्फ रेशम को ही ले आता, तो ही वह बहुत खुश हो जाती। इन सारे मेहमानों के साथ बातचीत करते वह लोग आगे बढ़ रहे थे की रेशम की ताई ने उसकी मां को केक काटने के लिए बुला लिया। लेकिन मानव ने रेशम के ससुराल वालों के आने का कहकर उन लोगों को थोड़ी देर के लिए रोक दिया। कुछ देर में ही रेशम के सास ससुर देवर तीनो चले आए। लेकिन रेशम की आंखें जिसे ढूंढ रही थी वह अब तक नहीं आया था।
इन तीनों के आने के ठीक 5 मिनट बाद अथर्व भी चला आया। गहरी सलेटी रंग की शर्ट और जींस में वह बहुत लुभावना लग रहा था। खासकर उसका कमीज की बाहों को कोहनी तक मोङे रखना रेशम को और भी ज्यादा भाता था। रेशम अथर्व के पास पहुंच गई..

” मम्मी जी पापा जी को देखकर मुझे लगा आप नहीं आए..?”

” तुम्हारा लॉन तो बहुत बड़ा है, लेकिन लॉन के बाहर पार्किंग कि कहीं कोई व्यवस्था नहीं है। तुम्हारे मेहमानों की गाड़ियां इतनी दूर तक खड़ी थी कि मम्मी पापा को तुम्हारे गेट के सामने उतारकर मैं गाड़ी वापस मोड़कर दूर पार्किंग के लिए गया था। बस उसी में लेट हो गया..!”

रेशम मुस्कुरा कर उसके साथ आगे बढ़ गयी..
वहाँ मौजूद रेशम की रिश्तेदार औरतें रेशम को बुला बुला कर अथर्व से मिलती रहीं और उसकी तारीफ करती रहीं..
अथर्व भी बड़े प्यार से सबसे मिलता जुलता रहा..
अथर्व एक तरफ बैठा था और रेशम उसके लिए थाली परस कर ले आई..

” एक ही थाली? मतलब तुम मेरी प्लेट से ही खाने वाली हो क्या?”

” नहीं… दरअसल मैं थोड़ा रुकूंगी,  मम्मी-पापा के साथ खाऊंगी..!”

“हम्म!! लेकिन मैं इतनी देर तो रुक नहीं पाऊंगा, मुझे तो वापस जाना है। तुम चल रही हो ना साथ ?”

रेशम पसोपेश में पड़ गई, उसका दिल अपने मम्मी पापा के इस खास दिन पर उनके साथ रुकने का था और फिर मानव भी तो उसकी सास से इजाजत लेकर आया था। लेकिन उसके पति के लिए तो उसके साथ की एक एक रात बेशकीमती थी। अथर्व ने शायद रेशम के चेहरे के भाव पढ़ लिये, अपना खाना खाते हुए उसने धीरे से उसे रुकने की इजाजत दे दी..

” कोई बात नहीं, अगर तुम्हारा अपने घर पर रुकने का मन है तो तुम रुक जाओ। वैसे हमारे कमरे को जिस खूबसूरती से तुमने सजाया था, मुझे लगा नहीं था कि तुम रात में यहां रुकोगी…. ?”

अथर्व ने बड़े धीमे से यह बात कही और रेशम एक बार फिर पानी-पानी हो गई…
आखिर क्या था ऐसा उसमें जो उसकी आवाज से भी रेशम पिघलने लगती थी ! उसने कमरे को सजाने में वाकई बहुत मेहनत की थी। लेकिन वह यह भी जानती थी कि अथर्व जैसे ही उस कमरे को देख कर उसे इस बात के लिए छोड़ेगा, वह वापस झेंप जाएगी। वह अपने आप से परेशान हुई जा रही थी। उसे अपने और अथर्व के बीच की दूरियों को मिटाने के लिए प्रयास भी करने थे, और साथ ही वह यह भी चाहती थी कि उसके इन प्रयासों पर उसका पति ध्यान ना दे।
लेकिन यह संभव नहीं था।।
अथर्व जैसा लड़का जो रेशम की हालत अच्छे से समझ चुका था, वह उसे छेड़ने का कोई मौका छोड़ना ही नहीं चाहता था। तब भी अपनी बात कह कर वह धीरे-धीरे मुस्कुरा रहा था। और रेशम क्या कहूं या ना कहूं के फेर में पड़ी जमीन पर धंसती जा रही थी।

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