” वक्त आने पर बता देंगे अभी चलो चंद्रा भैया से बदला लेना है ना तो उनके साथ बने रहो समझे, तभी ना मौका मिलेगा..!”
उस लड़के ने अपनी जेब से एक पुड़िया निकाली…
उस पुड़िया में लिपटी हुई एक बीड़ी निकाली और फिर बीड़ी में गांजे को अच्छे से मसलकर भरने के बाद उसे लपेट कर दीपक की तरफ बढ़ा दिया। दीपक ने उसे सुलगा कर एक जोर का कश लिया और थोड़ी देर के लिए आंखें बंद कर ली, नाक से धुआं छोड़ते ही उसने आंखें खोली उसकी आंखें लाल भभूका हो गई थी..
“चलो… चले !” दीपक ने अपनी गाड़ी निकाली और उस लड़के को पीछे बैठा कर चंद्रा भैया की जीप का पीछा करने लगा। चंद्रा भैया की गाड़ी के साथ-साथ बाकी गाड़ियां भी उस अस्पृश्य बस्ती में दाखिल हो गई जहां ठाकुरों का जाना वर्जित था…
ठाकुरों की उस रेलम पेल को देखकर उस छोटे से मोहल्ले में भगदड़ सी मच गई। गाड़ियां तूफानी रफ्तार से धूल उड़ाती हुई गली के मुहाने पर चली जा रही थी। छोटे-छोटे नंगे बच्चे जो सड़क के बीचो-बीच खेल रहे थे, उनकी माई आकर उन्हें उठाकर अंदर की तरफ भागने लगी । ऐसा लगा जैसे किसी छोटे से पिछड़े हुए गांव में कोई बड़ा सरकारी महकमा दाखिल हो गया है। और लोग अचरज से उस महकमे को देख रहे हैं ।औरतें तो ज्यादातर घरों के अंदर दाखिल हो गई जो बाहर कामकाज कर रही थी, उन्होंने माथे तक आंचल ले लिया..
ठाकुरों के सामने सिर उघाड़े घूमने की उन लोगों की हिम्मत नहीं थी..
उस मोहल्ले के कुछ आदमी जो ठाकुरों के घर काम करने जाया करते थे बड़े अदब से कमर तक झुक कर दोहरे हो गए..
चंद्रा की गाड़ी राजेंद्र के दरवाजे पर जाकर रुकी। चंद्रा के एक लड़के ने जीप से छलांग लगाई और उछलकर राजेंद्र के दरवाजे पर पहुंच गया। अपने हाथ से जोर-जोर से दरवाजे को बजाने के बाद उसने वहीं से हुंकारा लगा दिया…
” डॉक्टर साहब है क्या अंदर…?”
राजेंद्र का बुखार उतर चुका था और वह अपनी टेबल पर बैठा कुछ पढ़ रहा था.. कमरे में रसोई वाले हिस्से के पास जमीन पर गेंदा चुपचाप बैठी हुई थी…
उसकी अम्मा ने उसे कहा था, शाम को पतले फुल्के सेंक कर खिला कर आना..
वहीं एक तरफ सरना और बिट्टू बैठे बिट्टू के मोबाइल पर पब्जी खेल रहें थे…
बाहर से आई हुंकार सुन कर सरना से पहले बिट्टू घबरा गया..
“ये तो लालू की आवाज़ है.. !”
बिट्टू और सरना घबरा कर राजेंद्र की तरफ देखने लगे..
“कौन लालू ?”
राजेन्द्र के सवाल पर बिट्टू खड़ा हो गया…- “चंद्रा भैया का ख़ास आदमी है.. मतलब उनका लठैत है.. !”
राजेंद्र उठ कर बाहर जाने लगा तो सरना ने उसे रोक दिया..
“मत जा राजी, बाहर मत जा.. ! वो लोग चीथड़े उड़ा देंगे तेरे.. !”
“सरना.. भाई मेरे.. तू इतना क्यों डरता है इन लोगों से.. जान थोड़े ना लें लेंगे !”
सरना ने एक गहरी सी साँस ली और राजेंद्र की तरफ देखने लगा..
“तू अभी जानता क्या है भाई.. बस इस वक्त बात मान जा.. !”
उसी समय वापस बाहर से गर्जना सी हुई.. अबकी बार चंद्रा भैया की आवाज थी। उस दबंग और गहरी सी आवाज में कुछ तो ऐसा था जो उसे काटना मुश्किल था..
” कोई है घर के अंदर ? हम अंदर नहीं आ सकते, लेकिन घर के अंदर रहने वाले लोग तो बाहर आ सकते हैं। और अगर हमारी बात सुनकर भी तुम लोग बाहर नहीं आए और हमें अंदर आना पड़ गया तो सोच लेना फिर क्या होगा?
हमें वापस जाकर गंगा जल से स्नान करना पड़ेगा और तुम सब की अस्थियां गंगाजल में प्रवाहित करनी पड़ जाएंगी..
चंद्रा भैया की इस बात के बाद उन लोगों के अंदर टिके रहने का सवाल ही नहीं उठता था। बावजूद राजेंद्र को अंदर रहने का इशारा कर सरना बिट्टू के साथ बाहर निकल आया…
” गोड (पांव) लगते हैं हुजूर माई बाप..!”
सरना ने चंद्रा भाई को देखते ही हाथ जोड़ लिए और दूर से ही जहां चंद्रा भाई खड़े थे वहां की मिट्टी को छू लिया चंद्रा के लड़के ने सरना की कॉलर पकड़कर उसे खींचा और चंद्रा के पैरों पर गिरा दिया। एक दूसरे आदमी ने बिट्टू को खींचकर वैसे ही चंद्रा के पैरों पर गिरा दिया चंद्र ने अपना जूता उठाया और सरना के कंधे पर रख दिया..
” क्यों बे हम सुने हैं तुम्हारे दोस्त शहर जाकर बहुत बड़े डॉक्टर बन गए हैं..
सरना से कोई जवाब नहीं दिया गया..
“सुन लो सरना.. डाक्टर बन जाने से किसी का जात नहीं बदल जायेगा..।
जो जिस जात में पैदा हुआ है, उसी जात में मरेगा और अगर अपनी जात से बाहर पांव पसार होगी तुम लोगन की, तो साले तुम्हारा कुआं पानी सब बंद करके इस गांव से 7 गांव दूर तक खदेड़ कर मारेंगे..।
तुम्हारी खाल उधेड़ कर उसका जूता बनाकर पहनेंगे बे, समझ रहे हो, यह चंद्रा भैया की जबान है। और यह चंद्रा भैया का गांव है। सरपंच है हम यहां के और पिछले तीन बार से बिना किसी रोका टोकी के मनोनीत हुए हैं समझ रहे हो…।”
“भैया जी माफ़ कर दीजिये, अब अइसन गलती कभू ना हुई.. !”
अपनापा दिखाने सरना गाँव की बोली में बोल पड़ा..
” मतलब मानते तो हो कि गलती हुई है..
आज के आज अपने डॉक्टर साहब का सामान बांधों और उनको यहां से शहर जाने वाली ट्रेन में बिठा दो। कल सुबह अगर तुम्हारे डॉक्टर बाबू गांव की हवा से ऑक्सीजन लेते हुए पाए गए ना, तो हम हमेशा हमेशा के लिए उनको भेंटिलेटर में डाल देंगे समझे…
“समझ गए हुज़ूर.. !”
सरना के कंधे को बड़ी कठोरता से अपने जूते से रगड़ कर चंद्रा ने अपना जूता उसके कंधे के निचले भाग पर रखा और जोर से उसे पलट दिया। सरना जो अब तक पेट के बल जमीन पर गिरा हुआ था, अब पीठ के बल हो गया और उसका चेहरा ऊपर की तरफ हो गया। उसके चेहरे को घूर कर देखने के बाद चंद्रा भैया ने उस पर थूका और वापस मुड़कर अपनी जीप की तरफ बढ़ गये। अपमान से सरना का चेहरा काला हो गया और चंद्रा भैया के गुर्गे जोर-जोर से हंसते हुए वहां से रवाना हो गए। उन लोगों के साथ ही दूर खड़ा दीपक यह सारा नजारा अपनी आंखों से देख रहा था । पता नहीं उसके दिल में वह कौन सा बदला था जो लेने के लिए वह ऐसे आतुर हो रहा था,
लेकिन उसे भी नहीं पता था कि उसके बदले की आग इस पूरे गांव को एक दिन जलाकर राख कर देने वाली थी……
अब तक की कहानी तो सरना बड़े आराम से सुनाता जा रहा था लेकिन इस हिस्से को सुनाने के बाद वह सिसकने लगा और सामने बैठा अनिर्वान जो अब तक कहानी सुनते हुए सरना के पास आकर खड़ा हो गया था, उसने सरना के कंधे पर अपना मजबूत हाथ रख दिया…
अनिर्वान की आंखों में खून उतर आया था…
“है कौन ये चंद्रा भैया… निकालो इसकी कुंडली..
लगता है महादेव ने इसका क्रिया कर्म मेरे ही हाथों लिखा है !”
“हुज़ूर, उस जैसा ज़ालिम कोई नहीं मिलेगा संसार में.. !”
सरना के ऐसा कहते ही बाबूराव बोल पड़ा..
“बड़े ठाकुर और उनके बेटों को भूल गए क्या.. ? वो अखंड और यज्ञ कम है क्या ? सब साले एक से बढ़ कर एक बर्बाद है और पूरे गाँव को बर्बाद किये बैठे हैं.. !”
बाबूराव की आवाज़ में हिकारत के भाव साफ़ नज़र आ रहें थे..
अनिर्वान ने ध्यान से बाबूराव को देखा..
” जब इतनी नाराजगी है बाबूराव तो अब तक उनके खिलाफ कोई एक्शन क्यों नहीं लिया..
” हुजूर कहावत भले जो भी बनी हो लेकिन सच्चाई यही है कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता..
2 साल पहले एक इंस्पेक्टर साहब आए थे, नई नई जॉइनिंग थी। बहुत जोश था, कुछ कर गुजरना चाहते थे, सच्चाई और ईमानदारी उनके नसों में खून की जगह दौड़ रही थी हुजूर।
पीछे लगे गांधी जी की फोटो को रोज आ कर प्रणाम करते थे ।
सरपंच चुनाव के समय चंद्रा भैया अपनी मनमानी कर रहे थे । लोगों को वोट डालने ही नहीं देते थे, हर किसी के वोट के बदले उनके गुर्गे वोट डाल कर रहे थे। यह सब इंस्पेक्टर बाबू से नहीं देखा गया और वह वोटिंग के समय वहां तैनात रहे, बस उस रात की गणना होकर रिजल्ट बाहर आया तो सब सांस रोके जानना चाह रहे थे कि इस बार क्या रिजल्ट आता है ? लेकिन वोट देने वाले भी चंद्रा भैया के आदमी, वोट गिनने वाले भी उनके आदमी तो कोई क्या कर सकता था? इंस्पेक्टर बाबू भी क्या कर पाते?
चंद्रा भैया जीत गए, और इंस्पेक्टर बाबू रातों-रात गांव से गायब हो गए ।
हम सब ने तलाश करने की कोशिश की, उनके शहर वाले घर पर भी पतासाजी की, लेकिन किसी को नहीं पता चला कि वह कहां चले गए ? और हम सब को पूरा यकीन है कि वो और कहीं नहीं सीधे बैकुंठधाम को निकल गए…!”
