अपराजिता -20

चंद्रा भैया के इस तुगलकी फरमान के सामने किसी की कुछ बोलने की हिम्मत नहीं हुई। कुछ उनके जैसे ही अड़ियल जिद्दी और घटिया मानसिकता के लोगों के अहम की तुष्टि जरूर हो गई, लेकिन लड़की और उसका परिवार कलप कर रह गया।
लड़की ने भरी भरी आंखों से अपनी मां को देखा, वह कुछ कह पाती उसके पहले ही उसके पति और देवर ने उसकी बांह पकड़ी और उसे खींचकर अपनी तरफ के पाले में खड़ा कर लिया। उस लड़की ने भरी भरी आंखों से चंद्रा भैया की तरफ देखा और अपने आप को रोक नहीं पाई…

” आज हमारी तकलीफ आपको नजर नहीं आई है ना चंद्रा भैया, हम बस यही दुआ करेंगे कि आपकी बहन को भी बिल्कुल हमारी ससुराल जैसा ससुराल मिले.. !”

“दफा करो ये मुआमला ! हमने अपना हुक्म सुना दिया अब जिसे जो करना है करे.. !”

उस लड़की की बात सुनकर चंद्रा जोर से चिल्ला उठा और अपनी जगह से खड़ा होकर बाहर निकल गया दीपक उसके पीछे भागता हुआ उसके साथ चलने लगा..

” भैया जी आपको खबर देनी थी..!”

“भौंको !”

” हम सिर्फ भौंकते नहीं है, बल्कि काटने को भी तैयार है बस आप आज्ञा करिए..!”

“साले अब तुम हमें काटोगे… इतना बढ़ गए हो कि अपने मालिक को चबाना चाह रहें.. !”

“मालिक के लिए तो जान हाज़िर है.. आप हुकुम कीजिये ठाकुर…।
काटने की बात तो आपके दुश्मनो के लिए थी..
आज जो देखकर आ रहे ना, उसके बाद ऐसा लग रहा है आंखों से खून की नदी बह रही है।
साला कभी सोचे नहीं थे कि जिस घर की राजकुमारी को आज तक पशु पक्षी नहीं देखे होंगे वह लड़की..

दीपक की बात पूरी होने से पहले चंद्रा ने उसकी कॉलर पकड़कर उसके चेहरे को अपने चेहरे के एकदम पास लाकर उसके जबड़े को उँगलियों में भींच लिया..

“किसकी बात कर रहे हो बे.. ?”

” भैया जी अगर हमारी बात झूठी निकली तो हमारी जीभ यहीं कट कर गिर जाएगी भोले बाबा की कसम..।”

” साले बस गोल गोल जलेबी बनाओगे या बकोगे भी.. !”

“भैया जी…

दीपक ने गले की थूक निगली और गुस्से के अतिरेक में चंद्रा भैया का ज़ोर का थप्पड़ दीपक का गाल लाल कर गया… और तमाचे की जलन में दीपक फटाफट सब कुछ उगल गया…

” भैया जी कुसुम को आज बेड़िया गली के बाहर देखा था हमने….

“कहाँ देखा था.. ?”

“गाँव के बाहर अछूतो की बस्ती से बाहर आ रहीं थी.. कुसुम कुमारी जी.. !”

“और कौन था साथ में ?”

“उनकी परमप्रिय सखी.. पंडित जी की लड़की.. !”.

“पंडित जी की लड़की ? भोला पंडित की बिटिया कुसी के बराबर है ?”

“भोला पंडित की कोई बिटिया नहीं है हुज़ूर.. लेकिन भोला पंडित की भतीजी है.. भावना नाम है, जिसका बाप सालों पहले गाँव छोड़ कर भाग गया था.. !”

“तो क्या हुआ है भावना को.. उसे हम जानते हैं.. भली सी लड़की है.. !”

दीपक अपने माथे को उँगलियों से रगड़ने लगा..

” चंद्रा भैया अच्छी या बुरी की बात ही नहीं हो रही। हम बस यह बता रहे हैं कि कुसुम कुमारी जी इसी भावना के साथ अछूतों की बस्ती में गई थी, और सिर्फ आज ही नहीं गई थी वह अक्सर वहां जाती रहती हैं।
गांव के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में काम करने आए डॉक्टर राजेंद्र रघुवंशी से उनका मिलना जुलना है..!”

यह आखरी बात सुनते ही चंद्रा भैया के चेहरे पर खून उतर आया उन्होंने हाथ बढ़ाकर दीपक की गर्दन दबोच ली…

” साले तुम्हारी जबान खींच लेंगे, क्या बक रहे हो बे…सुबह सुबह नशा कर लिया क्या.. ?”

” भैया जी अगर हम झूठ बोल रहे होंगे ना तो अभी के अभी यह पेड़ हमारे ऊपर गिर जाएगा और हम इस पेड़ के नीचे दब कर मर जाएंगे…।”

दीपक ने पूरे आत्मविश्वास से कहा और उसी समय जाने कहां से अंधङ आंधी चलने लगी, तेज तेज हवाएं बहने लगी और सूखे हुए पत्ते धूल मिट्टी के साथ तेजी से इधर-उधर उड़ने लगे।
दीपक ने धीरे से घबराकर उस पेड़ की तरफ देखा और अपनी जगह से थोड़ा पीछे सरक गया कि कहीं गलती से उसकी कही बात पूरी हो गई तो वह उस पेड़ के नीचे भले दबकर मरे ना मरे लेकिन चंद्रा भैया जरूर उसके गले में फंदा डालकर किसी न किसी पेड़ से टंगा देंगे…

उस धूल और अंधङ में अपनी आंखों को पोछते हुए चंद्रा भैया ने दीपक को जोर का धक्का मारा और वापस अपनी जीप की तरफ बढ़ गए। दीपक जमीन पर गिरे गिरे ही बड़बड़ा उठा…

” साले दोनों भाई बहन को बस जूते चप्पल की जबान ही समझ में आती है। जैसे वह थपड़िया रही थी वैसे यह थप्पड़ जड़ रहे हैं ।
किसी दिन मौका मिला ना चंद्रा भैया, यह थप्पड़ सूद समेत आपकी बहन जी और आपको जरूर लौटाऊंगा…! ये वादा है दीपक का !”

चंद्रा भैया के साथ के सारे लड़के उनके पीछे दौड़ भाग कर निकल गए। कुछ उनकी जीप पर सवार हुए कुछ अपनी अपनी बाइक पर सवार होकर निकल गए। लेकिन उनमें से एक कमजोर मरियल सा लड़का दीपक के पास चला आया, उसने दीपक के सामने अपना हाथ बढ़ा दिया और दीपक ने उसे देखकर एक भद्दी सी गाली दी और उसका हाथ पकड़ कर खड़ा हो गया..

“तुम क्यों रुक गए बे ?”

” क्योंकि तुम्हारा और हमारा मिशन एक ही है..!”

“वो क्या ?”

“मिशन बंटाधार !”

“अबे लेकिन तुम तो गुर्गे हो चंद्रा भैया के.. तुम अपने दिल में कौनसी आग जलाए बैठे हो बे..?”

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