अपराजिता -19

अपने दोस्तों को कुसुम पर हमला करने का इशारा करते हुए दीपक वापस चिल्लाया, लेकिन कुसुम की एक नज़र पड़ते ही वो सारे लोग वहाँ से भाग खड़े हुए और कुसुम ने अपनी ऊँची एड़ी की सैंडल की नोकदार हील को दीपक के मुहँ पर दे मारा…
उसके गाल और मुहँ से ख़ून बलबला कर रिसने लगा….

वो अपने गाल और मुहँ सम्भालता एक बार फिर एक भद्दी सी गाली दे उठा…
और उसके चेहरें पर धूल उड़ाती कुसुम ने गाड़ी अपने घर की तरफ भगा ली..
पीछे बैठी भावना डर से कांप रहीं थी…

“कुसुम हमें घर पर उतार दो !”

“हम्म !”

कुसुम का गुस्सा अब भी सांतवे आसमान पर था,

” हमें इतनी भद्दी गलियां देने वाले दीपक को तो हम छोड़ेंगे नहीं !”

“वो तो ठीक है लेकिन कहीं ये चंद्रा भैया से कह आया तो ? तब क्या करोगी ?”

“तब डाक साब का हाथ पकड़ कर सबके सामने खड़े कर देंगे, कि हम इनसे ब्याह करना चाहते है.. बस.. बात खत्म.. !”

“सत्ती माता करें तुम्हारा ये जोग खाली ना जायें और तुम्हारे घर वाले तुम्हारी बात मान जायें.. !”

भावना का घर आ गया था.. उसे वहाँ उतार कर कुसुम भी उसके साथ उसी के घर चली गयी…

“चाची एक बढ़िया सी चाय पिला दीजिये, आज दिमाग बहुत गरम हो गया है !”

“हाँ बिटिया बैठो ना ? ए भावी सुनो तुम्हारे बाबूजी का कोई मेसेज आया ?”

भावना ने अपना फ़ोन चेक किया, उसके बाबूजी का मेसेज आया था..
भावना की माँ ने भावना से ही उसी की शादी की तैयारियों के लिए कुछ रुपयों की मांग की थी और उधर से उसके पिता का जवाब आया था कि वो चार पांच दिन में रूपये भेज देंगे.. !

भावना से ये जवाब सुन कर उसकी माँ के चेहरे पर राहत के भाव चले आये..

“ए भावना.. सुनो.. तुम कब से अपने बाबूजी से नहीं मिली ?”

“बचपन के बाद कहाँ मिल पाए..? वो भी आ नहीं पाते.. कभी छुट्टियां नहीं मिलती तो कभी टिकट नहीं हो पाता!”

“तुम्हें अपने बाबूजी का चेहरा याद भी है ?”

“हाँ कुसुम.. तस्वीर में तो देखते रहते हैं ना, और फिर हमारी बात भी होती है, कभी कभी..।
पर बाबूजी बहुत ज्यादा बात नहीं करते, बस हमें क्या चाहिए वो पूछते हैं, और सामान भेजने के बाद सब पहुँच गया कि नहीं ये जानने के लिए फ़ोन करते हैं.. !
उनका कहना है, हमारी शादी में ही आएंगे.. !”

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