“अरे इतना मसाला नहीं लगेगा ? कम कर दो ! गोभी तो ये लोग सादी ही खाते हैं ! ना ना इतनी मिर्च ?
हरी मिर्च तो डाल चुकी ना अब लाल क्यूँ ? टमाटर ? हमारे यहाँ गोभी में टमाटर नहीं पड़ते ?”
और भी जाने क्या क्या बोल कर सासु माँ उसका ध्यान भटकाती रहीं, लेकिन उसने अपनी साधना में विघ्न पड़ने नहीं दिया और सब्जी बना ली…
दोपहर के खाने पर सासु माँ ने खाते वक्त एक बार भी उसकी पकाई सब्जी की तारीफ नहीं की, उल्टा गोभी अपनी थाली में परोसी भी कम..
आरव भी कॉलेज नहीं गया था, वो भी उनके साथ बैठा खा रहा था, लेकिन उस लड़के को बस खाने से मतलब था, क्या कैसा बना इस सब घालमेल में वो नहीं पड़ता था..
ससुर जी आनन फानन खा कर अपने लंच टाइम में ही वापस ऑफ़िस निकल जाते थे तो, उनसे भी तारीफ की उम्मीद करना बेकार था..।
तीन बजे अथर्व आया और मुहँ हाथ धोकर खाने की टेबल पर आ गया.. रेशम भी अब तक बिना खाएं उसका इंतज़ार कर रहीं थी..
सासु माँ भी खाना गरम करने रसोई में चली आई… रेशम सलाद काटने लगी और उसकी सास ने अथर्व की थाली परोस कर उसे दे दी..
अथर्व ने खाना शुरू करने से पहले रेशम को आवाज़ लगा दी..
“तुमने खा लिया ?”
“नहीं.. बस अब खाउंगी.. आपका ही इंतज़ार कर रहीं थी.. !”
अथर्व का ऐसे उसे याद रख कर खाने के लिए पूछना उसे सहला गया..
“हाँ तो ले आओ फिर, अपनी भी थाली परोस कर ले आओ !”
रेशम मुस्कुरा कर रसोई में चली गयी.. सासु माँ ने अपने बेटे की थाली बस परोस दी थी..
मन में हल्की सी फांस लगी लेकिन ध्यान दिये बगैर रेशम अपनी थाली भी ले आई….
“तुम दोनों को और जो लगेगा, बता देना !”
बोलकर सासु माँ वहीँ टीवी पर “सास बहु और षड्यंत्र” देखने लगी…
रेशम का दिल बार बार कह रहा था कि अथर्व से पूछे , गोभी कैसी लगी, लेकिन संकोच में गड़ी वो चुपचाप खाती रहीं..
अथर्व खाने के बीच अचानक बोल पड़ा..
“माँ.. आज गोभी तो बड़ी टेस्टी बनायीं है आपने.. बल्कि छोलों से ज्यादा टेस्टी गोभी ही लग रहीं.. !”
अथर्व की माँ ने चश्मे की आड़ से अथर्व को देखा और धीरे से उसे बता दिया..
“गोभी रेशम ने बनायी है !”
उन्हें अपने लाड़ले की ये बात पसंद तो नहीं आई लेकिन वो उस बात पर ध्यान दिये बगैर टीवी में वापस घुस गयीं..
रेशम के चेहरें पर भीनी सी मुस्कान चली आयी..
उसे लगा उसका खाना बनाना सफल हो गया..
अथर्व ने भी रेशम की तरफ देखा और गर्दन एक तरफ को झटक कर उसके खाने की तारीफ का इशारा कर दिया..
वो सुकून से भर गयी…
अथर्व खाने के बाद ऊपर कमरे में चला गया, रेशम भी ऊपर जाने को थी कि रसोई समेटने का आदेश चला आया..
फटाफट काम निपटा कर रेशम ऊपर भाग गयी, आखिर उसे भी तो अपने पति का साथ भाता था…
उसका वो आँखों से छूना, प्यार से सहला जाना, गले लगाकर अपनी खुशबू में उसे सराबोर कर जाना, उसके हर एक मोहक अवयव पल पल रेशम को खुद में बांधते जा रहें थे..
वो अथर्व के गले से लगने के लिए बेचैन सी हो उठी..
वो ऊपर पहुंची, तब तक में अथर्व हॉस्पिटल स्टाफ से बात करते हुए मोबाइल पर आई किसी रिपोर्ट को भी देख रहा था…
रेशम आकर मुस्कुरा कर उसके बगल में बैठ गयी…
और धीरे से उसने अपना चेहरा अथर्व के कंधे पर रख दिया…
फ़ोन रखने के बाद अथर्व ने भी मुस्कुरा कर रेशम को अपनी बाँहों में समेट लिया..
“इतनी सुंदर हो तुम कि लगता है बस देखता रहूँ…
पता नहीं मुझे ही इतनी ज्यादा सुंदर लगती हो या…
“मैं हूँ… वाकई हूँ.. इसलिए लगती हूँ.. !”
रेशम खिलखिला उठी और अथर्व ने उसे बाँहों में भर लिया..
“सुनो मम्मी बहुत ज्यादा लोड तो नहीं दे रहीं ना ?”
रेशम ने मुस्कुरा कर ना में गर्दन हिला दी…
कुछ सोच कर वो चुप रह गयी…
“अच्छा रेशु… तुमसे बहुत दिन से एक बात पूछना चाहता था… तुम फर्स्ट ईयर में थी, तब कॉलेज में कुछ कांड हुआ था क्या.. ?”
रेशम सिहर उठी..
“क्यों आपसे किसी ने कुछ कहा ?”
“एक्चुली उस समय हमारी बैच एजुकेशनल टूर पे थी.. और वहाँ से वापस लौटते ही हम सब पीएल में चले गए.. उस समय थोड़ा बहुत कुछ कान में पड़ा तो था, लेकिन मैं उस वक्त कॉलेज की पंचायत से दूर ही रहता था.. पूरा फोकस पढाई पर जो था..
इसलिए सही से कुछ मालूम नहीं चला…. !”
“तो अब क्यों पंचायत में पड़ रहें हैं.. वैसे भी काफ़ी पुरानी बात हो गयी वो !
अच्छा सुनिए चार बज गए है… मैं आपके लिए चाय बना कर लें आती हूँ.. फिर आपको निकलना भी तो होगा !”
“ठीक है.. मैं भी रेडी होता हूँ.. !”
अथर्व की बाँहों से निकल कर रेशम ने अपनी साड़ी सही की और बाहर निकल गयी..
कमरे से बाहर निकल कर भी उसे अब चैन नहीं मिल रहा था..
अपनी परेशानी में गुम वो रसोई में चाय चढाने चली गयी…
कुसुम अपने कॉलेज से निकली ही थी कि बाहर अपने दोस्तों के साथ खड़ा दीपक भाग कर उसके पास चला आया..
“जय हो ठकुराइन ! “
कुसुम ने एक नज़र उस पर डाली और उसे अनदेखा सा करती आगे बढ़ गयी..
“ओह्हो क्या बात है, हमें तो अनदेखा कर निकल ली, लेकिन जब बेड़िया गली चौक से निकल रहीं थी, तब आप को अनदेखा नहीं किया जा सका.. !”
दीपक की ये बात सुन कर भावना डर से वहीँ जम गयी…
उससे एक कदम आगे नहीं उठाया गया, कुसुम ने भावना का हाथ पकड़ा और खींचते हुए अपनी बाइक की तरफ बढ़ गयी..
उसने बाइक पर चाबी लगायी ही थी कि दीपक ने पूरी बदतमीज़ी से चाबी निकाल कर अपनी ऊँगली में फंसा ली..
चाबी को घुमाते हुए वो कुसुम के पास चला आया..।
“जब उस रघुवंशी के कमरे तक पहुँच सकती है तो, हम क्या बुरे हैं ? हम तो जात में भी आपके बराबर है, हमारे बिस्तर पर बैठी भी तो, चंद्रा भैया को उतना दुःख नहीं…
दीपक अपनी बात पूरी कर पाता उसके पहले एक ज़ोर का तमाचा उसका मुहँ लाल कर गया…
तमाचे के साथ ही कुसुम ने उसके पेट में भी ज़ोर से लात मारी थी.. वो घूम कर ज़मीन पर जा गिरा..
उसके साथ के लड़के वैसे भी उसे कुसुम से दूर रहने की ही समझाइश दे रहे थे, कुसुम का रौद्र रूप देख वो सारे कांप उठे..
“साली खुद को समझाती क्या है… रा## ! लड़कों के घर खुद घुस रही और पकडे जाने पर.. !
