अपराजिता -19
अथर्व की छुट्टियां ख़त्म हो गयी और रेशम और वो वापस लौट आये…
रेशम भी अपनी नयी गृहस्थी को संवारने में जी जान से जुट गयी..
वो अथर्व को जो नहीं दे पा रही थी, उसका हर्ज़ाना वो उसकी सेवा कर के पूरा देना चाहती थी…
लौटने के बाद पहले ही दिन से उसने सोच रखा था सुबह जागने से लेकर अथर्व के हॉस्पिटल निकलते तक वो उसके पीछे लगी रहेगी, जिससे अथर्व को उसमें एक मुकम्मल गृहस्थन नज़र आ जायें, लेकिन थकान के मारे पहले दिन उसकी नींद ही नहीं खुली और सुबह सुबह अथर्व के ही इधर उधर करने से उसकी नींद टूटी…।
अथर्व नहा कर आने के बाद तैयार हो रहा था..। उसका भरसक प्रयत्न था कि कोई हल्ला ना हो लेकिन कुछ ना कुछ उठाने रखने की आहट से रेशम की नींद खुल गयी..
“अरे आप तैयार भी हो गए.. उठाया क्यूँ नहीं मुझे ?”
“ज़रूरत ही नहीं थी.. तुम आराम कर लो, अभी सिर्फ सुबह का सात बजा है !”
“तो आप क्यूँ तैयार हो गए..? आपका अस्पताल तो आठ बजे से होता है ना ?”
“अभी तैयार कहाँ हुआ हूँ… बस नहा कर आया हूँ… अभी रेडी होना है, नाश्ता करना है, और फिर ड्राइव कर अस्पताल तक भी तो जाना है.. वहाँ पहुँचने में लगभग बीस पच्चीस मिनट लगते हैं… घर से साढ़े सात निकल जाता हूँ ना.. !
“ओह्ह.. लेकिन क्या इतना पंक्चुअल होना ज़रूरी है ? मैं छोटी थी तब तो देखा था अक्सर डॉक्टर लेट ही आया करते थे !”
“हाँ ज़रूरी है.. मुझे समय का पाबंद होना पसंद है, और फिर समय पर निकल जाने के अपने फायदे हैं… रास्ते में ट्रेफिक कम मिलता है, और हनुमान मंदिर में घड़ी भर रुक कर प्रणाम भी कर लेता हूँ.. !”
“ओह्ह !”
रेशम फट से उठ कर बाथरूम में घुस गयी.. उसे अथर्व के नीच जाने से पहले नीचे जाकर नाश्ता बनाना था…
फटाफट कपडे बदल कर भागती गिरती पड़ती सी वो नीचे पहुंची..
अथर्व इसे देख धीरे धीरे मुस्कुरा रहा था, उसे भी रेशम के प्रयास नज़र आ रहें थे…
