अपराजिता -18

” बिट्टू कहां है, दिखाई नहीं दे रहा..?” सफाई कर्मी ने बड़ी मुश्किल से आंख उठाकर कुसुम की तरफ देखा और धीरे से ऊपर नीचे गर्दन हिला दी।
उसके मुंह में गुटका भरा हुआ था और फिलहाल कुसुम के सवाल का जवाब देने के लिए पूरे 5 रूपये की पुड़िया थूकने का उसका कोई विचार नहीं था…

” अबे बोलोगे भी या खींच के एक झापड़ लगाएं… ?
हम लगाए तो ऐसा लगाएंगे ना कि यही गुटका तुम्हारी आंतों की गलियों में यहां से वहां भटकते हुए तुम्हें किसी और लोक का दर्शन करवा देगा.. समझे..?”

सफाई कर्मी ने आंखें बड़ी बड़ी कर कुसुम को देखा और धीरे से अपनी जगह पर खड़ा हो गया। एक तरफ जाकर उसने भारी मजबूरी में अपने मुंह की अमृत स्वरूपी कवल थूका और कुल्ला करके कुसुम कुमारी के सामने चला आया, वह भी जानता था इस ठकुराइन से पंगा लेना दुनिया का सबसे कठिन काम था..।

” हमें नहीं पता बिट्टू कहां है? शायद डॉक्टर साहब के घर गए हैं..!”

“काहे ?”

“क्यूँ ? आपको नहीं पता.. ?”

“साले हमें पता होता तो हम यहाँ तुम्हारे साथ कौन बनेगा करोड़पति खेल रहे होते..? अब बताओगे भी कि लगाएं खींच के..!”

” आप बात बात पर मारने पीटने पर काहे उतर आती हैं। बता रहे हैं ना, डॉक्टर साहब के पिछले 2 दिन से तबीयत बहुत खराब है। अस्पताल नहीं आए हैं वह..!”

” पिछले 2 दिन से..?
लेकिन हम परसों ही तो मिले थे..!”

लेकिन फिर कुसुम को ध्यान आ गया कि वह पिछले दो-तीन दिन से किसी ना किसी कारण से घर से निकल कर अपने डाक साहब तक पहुंच नहीं पा रही थी।
उसके मन में बेचैनी बढ़ने लगी, उसने भावना की तरफ देखा। भावना ने उसे आंखों के इशारे से शांत रहने को कहा और उसे साथ लेकर अस्पताल से बाहर निकल गई…

” हर किसी के सामने अपना यह बौड़मपना ना दिखा दिया करो..
कुछ तो थोड़ा तो ख्याल रखा करो यार। पता नहीं ये लड़का किस-किस से जाकर कह पड़ेगा कि चंद्रा भैया की बहन डॉक्टर साहब के बारे में पूछताछ कर रही है। अच्छा लगता है क्या? और तुम सोच लो अगर कहीं से यह सब बातें तुम्हारे घर तक पहुंच गई ना बेटा, तो तुम्हारा तो जो होगा सो होगा, सबसे पहले हमें चौक के बरगद वाले पेड़ पर हमारी ही चुन्नी से लटका देंगे तुम्हारे चंद्रा भैया..!”

“हाय… भावु !! तुम कितनी प्यारी बातें करती हो यार। तुमने वह गाना नहीं सुना, प्यार करने वाले कभी डरते नहीं डरते नहीं, जो डरते हैं वो प्यार करते नहीं..!”

” कुसुम देवी जी आप चाहे कितनी भी निडर हो, लेकिन हम आपकी तरह निडर नहीं है। इसलिए हमारी जान बख्श दीजिए और अगर इतना ही निडर होना है तो अपने घर पर खुल्लम-खुल्ला यह बता दीजिए कि आप उस ठाकुर से नहीं बल्कि उन डॉक्टर साहब से शादी करना चाहती हैं। जिससे कि जो बात हो स्पष्ट हो।
यह ना हो कि उधर भी आपकी शादी की बातचीत आगे बढ़ती रहें और आप अपनी प्रेम की पींगे यहां बढ़ाती रहे। हैं…
ऐसे में कल को बहुत भारी समस्या पड़ जाएगी.. और वह भी आपके सर पर।
तब कहीं ऐसा ना हो कि बारात द्वारे खड़ी है और हमारी कुसुम देवी जी अपने पीठ पर अपना बस्ता टांगे घर से भाग रही हैं अपने डॉक्टर साहब के साथ..!”

” हाय बाबू!! काश अपने घर में बताना इतना आसान होता। और हम बता भी देते, लेकिन पहले यह तो पता चले कि डाक साहब भी हमसे प्यार करते हैं या नहीं..!”

” अरे हां वह तो सबसे ज्यादा जरूरी है। पता चला तुम ने बड़े प्यार से अपने डाक साहब को प्रपोज किया और उन्होंने कह दिया कि मुझे तो तुममें अपनी मरी हुई बहन नजर आती थी कुसुम कुमारी। और मैं इसीलिए तुम्हारा लाया हुआ खाना बड़े प्यार से खा लिया करता था मैंने तो तुम्हें कभी ऐसी वैसी नजर से देखा ही नहीं..!

” चुप करो जाहिल लड़की!! ऐसा कुछ नहीं होगा,हम कहीं किसी एंगल से उनकी बहन नहीं लगते..।”

कुसुम ने भावना को साथ लिया और एक बार फिर उस अनछुई अस्पृश्य बस्ती में अपनी गाड़ी घुसा दी। जहां उसके जैसे लोगों के जाने की मनाही थी। डॉक्टर साहब के घर के ठीक सामने पहुंच कर उसने बाइक रोकी और टिफिन बॉक्स को हाथ में लिए बड़े प्यार से घर के अंदर दाखिल हो गई। घर क्या था एक कमरा ही था, जिसके एक तरफ छोटा सा पर्दा डालकर रसोई जैसी बनाई गई थी। उन्हीं दरवाजे के पीछे ही बाथरूम था। उसी कमरे में एक चारपाई पर राजेंद्र लेटा हुआ था। उसकी बांह उसकी आंखों पर मुड़ी हुई रखी थी और उसके पास ही एक कुर्सी पर बैठा बिट्टू अपने मोबाइल पर बुरी तरह से व्यस्त था…

” क्यों बिट्टू ? तुमसे बताया नहीं गया कि डाक साब बीमार पड़ गए हैं..

बिट्टू चौक कर खड़ा हो गया। वह कुसुम कुमारी से मन ही मन भय खाता था…

” वह कुसुम दीदी, ऐसा था कि डॉक्टर साहब ने हमें मना कर रखा था। वरना हम तो सबसे पहले आप ही को फोनियाने वाले थे..

” चुप करो बदतमीज। अच्छा ये बताओ इन्हें किसी डॉक्टर को दिखाया..?”

” दीदी यह तो स्वयं डॉक्टर हैं..!”

” हां फिर? डॉक्टर है तो क्या खुद का भी इलाज कर लेंगे? किसी सर्जन को अपने ज़ख्मो पर छुरी चलाते देखा है कभी..? मिथुन चक्रवर्ती और धर्मेंद्र के अलावा ?”

” वह बात अलग होती है जी लेकिन दवाई तो डॉक्टर खुद ले सकता है ना..?
डॉक्टर साहब ने जो जो दवाई बताई थी हम उनके लिए ले आए थे और वह खा भी रहे हैं…!”

“हम्म.. दिखाओ !”

बड़े हक से डॉक्टर साहब के बगल में बैठती हुई कुसुम कुमारी ने एक हाथ से दवाइयां देखी और अपना दूसरा हाथ राजेंद्र के माथे पर रख दिया..
राजेंद्र का माथा तवे की तरह तप रहा था..
चौंक पर कुसुम ने तुरंत अपना हाथ हटा लिया..।

” हे राम इन्हें तो बहुत तेज बुखार है। ऐसा तो बुखार माथे तक पहुंच जाएगा और दिमाग में पहुंचा बुखार दादी कहती हैं बहुत नुकसान करता है।
बिट्टू इतनी देर से बैठे क्या हो?
माथे पर ठंडी पट्टियां नहीं रख सकते थे? जाओ एक बर्तन में ठंडा पानी और रुमाल लेकर आओ..

कुसुम की बात सुनकर बिट्टू तुरंत एक भगोने में पानी और एक रुमाल ले आया… कुसुम ने सामने टेबल पर उस पानी को रखा और रुमाल को भीगा भीगा कर राजेंद्र के माथे पर पट्टियां रखने लगी… बिट्टू ने वाकई इस ओर ध्यान ही नहीं दिया था कि राजेंद्र का शरीर बुरी तरह से तप रहा था..!

भावना को अब भी डर लग रहा था इसलिए वह चुपचाप एक तरफ हाथ बांधे खड़ी थी। उसने बिट्टू को आंखों से इशारा किया और बिट्टू ने खुली हुई खिड़की पर पर्दा डाल दिया। थोड़ी देर में ही सरना भी चला आया..

” अरे आप यहां, लेकिन कैसे..?”

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