अपराजिता -17

“हम्म राजनीती तो बहुत कठिन खेला है.. जिसे आ गया सो आ गया वरना इसमें फंसे तो जान फंसी…..”

कुसुम की माँ ने यज्ञ के चेहरें पर अपनी तवज्जो कर ली.. लड़का ये भी सुंदर था, वहीं नैननक्श, वहीं डीलडौल लेकिन बड़े सी बात नहीं थी….

“छोटा बाबू क्या करते हैं ये जानकारी तो मिल गयी, लेकिन उनसे मिलना नहीं हुआ ?”..

“हाँ आज अचानक कोई ज़मीन की रजिस्ट्री फंस गयी, बस उसी में जाना पड़ गया… उसका तो काम ही ऐसा है रात दिन एक किये रहता है। कोर्ट कचहरी ज़मीन के काम में उसका ऐसा दिल लगता है कि शहर जाना ही नहीं चाहता.. उसका बड़ा भाई उसे बुला बुला के हार गया, लेकिन उसे यही सब भाता है…..
आसपास कहीं किसी का ज़मीन का कैसा भी मुआमला हो, हर कोई यज्ञ के पास ही फरियाद लिए चला आता है.. किसानो को मनचाही रकम देकर ज़मीन खरीदता है और फिर बड़े व्यापारियों को बेच देता है… !
बड़ी मेहनत करता है.. अब क्या कहें.. हमारी देवरानी का लड़का भी अब इसी में जुड़ गया है.. !”

कुसुम की माँ के चेहरे से ही लग रहा था की वो बुरी तरह से प्रभावित हो चुकी हैं…।

कुसुम के पिता सब से मिल मिला के पहले ही बाहर निकल गए थे..
चंद्रभान भी कुछ देर बैठ कर औरतों के बीच कौन बैठे सोच कर एक काम का बहाना कर निकल गया…

शची की देवरानी ने इस बार बात दुहरा दी…

“बहनजी अगर सारी बातें स्पष्ट है तो हम लोग ओली डाल लेते हैं.. !”

“हाँ हाँ क्यों नहीं.. ?”

कुसुम की माँ ने भी ततपरता दिखाई…

लेकिन उनकी हाँ सुनते ही कुसुम चौंक गयी, उसने साथ बैठी भावना की तरफ देखा, भावना के चेहरे पर भी हवाइयाँ उड़ रहीं थी…..

शची और उसकी देवरानी अपनी जगह पर खड़ी हो गयी.. और उनके आगे बढ़ते ही कुसुम अपनी जगह पर खड़ी हो गयी..

“रुकिए.. !”

सारे लोग आश्चर्य से उसकी तरफ देखने लगे..
भावना को पता था कि कुसुम साहसी और दबंग है लेकिन वो इतने लोगों के बीच ऐसा दुस्साहस कर जायेगी भावना ने नहीं सोचा था…।

वो स्वभाव से संकोची और शर्मीली थी, उसे ऐसे कुसुम का बड़ों को टोक देना डरावना लग रहा था…
पता नहीं अब कुसुम क्या बोलने वाली थी, कहीं भरी महफ़िल में ये अपने डाक साब का राज़ ना उगल दे… सोच सोच कर भावना की जान निकली जा रहीं थी कि तभी कुसुम की माँ ज़रा नाराज़गी से पूछ बैठी..

“क्या हुआ कुसु ?”

“हम आप सब से कुछ कहना चाहते हैं !”

बेडा गर्क !! हे भगवान, अगर कहीं हो तो इन औरतों के बीच होने वाली फ़ज़ीहत से पहले मुझे उठा लो ईश्वर …
सोचती हुई भावना के माथे पर पसीने की बूंदे छलक आयीं…
उसने धीरे से दुपट्टे से अपना माथा पोंछ लिया… और कुसुम की तरफ देखने लगी. !


रेशम और अथर्व बाँहों में बाँहे डाले अपने होटल लौट आये…
अथर्व ने पहले ही होटल वालों से बात कर रखी थी इसलिए उनके ना रहने पर उनके कमरे को सज़ा दिया गया था…

अथर्व इस बारे में जानता था, लेकिन रेशम इस बात से अनजान थी…

अथर्व ने कमरे का दरवाजा खोला और रेशम को पहले अंदर घुसने दिया..
कमरे की बत्ती जलते ही कमरे की सजावट देख कर रेशम मुस्कुरा उठी…
वो चहक कर पीछे पलट गयी..

“ये देखिये, हम नहीं थे तो इन लोगों ने कितना प्यारा सरप्राइज हमारे लिए रेडी रखा है.. !”

अथर्व मुस्कुरा उठा..

“तुम्हें पसंद आया ?”

“हम्म… बहुत.. !”

खुश होकर रेशम ने कहा और पलंग पर सजी बेला की लड़ियों को हाथ में लेकर सूंघ लिया…

“मुझे इनकी खुशबू बहुत पसंद हैं…. !”

रेशम ने आंखें बंद कर उसकी खुशबू अपने अंदर भर ली…

“और मुझे तुम्हारी…. !”

अथर्व ने उसके कंधे पर अपना चेहरा रख दिया…
अचानक उसके ऐसे पास आ जाने से रेशम सिहर उठी…
लेकिन इस बार उसने खुद को तैयार कर रखा था कि चाहे जो हो जाये वो अपने पति को निराश नहीं करेगी…

अथर्व की उँगलियाँ धीरे से उसके चेहरे से होकर उसकी गर्दन को पार करती कंधे तक आई और रेशम का दुपट्टा उँगलियों में फंस गया..
अपनी ऊँगली से ही अथर्व ने दुपट्टा हटा कर नीचे फेंक दिया…. ..
लेकिन रेशम की साँसे बढ़ने लगी…
अथर्व मुस्कुरा उठा… वो उसके कान के पास चला आया..

“अभी तो कुछ किया भी नहीं है जान और तुम ऐसे घबराने लगी…. अगर कुछ करने पे आया तो क्या होगा तुम्हारा… ?”

अथर्व ने उसे छेड़ने के लिए कहा लेकिन ये वाक्य सुनते ही रेशम के पूरे शरीर पर चींटियां सी रेंगने लगी….

“अभी तो छुआ भी नहीं और तुम इतना घबरा गयी… अगर अपनी करने पे आ गए हम, तो तुम्हारा क्या होगा डाक्टर ?”

अखंड की आवाज़ उसके कानों में गूंजने लगी….

अपनी बढ़ती सांसो को संभालने की कोशिश करती रेशम अथर्व के गले से लग गयी…
अथर्व ने भी मुस्कुरा कर उसे बाँहों में भर लिया… कुछ देर दोनों यूँ ही शांत खड़े रहें लेकिन अथर्व आखिर कब तक खुद को रोक पाता…. ….

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