अपराजिता -15

अगली सुबह उसे अपने चेहरे पर कुछ महसूस हुआ और उसने चट से आंखें खोल दी..
अपनी एक बाँह पर अपना सर टिकाये अथर्व अपने दूसरे हाथ की ऊँगली को रेशम के चेहरे पर चला रहा था… ….

वो तुरंत उठ बैठी..

“हमें मंदिर जाना है… सबसे पहले मैं बालाजी के दर्शन करना चाहती हूँ.. !”

“हाँ हाँ.. चल रहें.. ऐसी क्या आफत हो गयी.. !”

वो भी मुस्कुरा कर उठ बैठा…
रेशम पलक झपकते बाथरूम में घुस गयी..
उन लोगों ने वीआईपी पास कटवा रखा था, इसलिए मंदिर की छोटी लाइन पूरी कर वो लोग बालाजी के दर्शनों के लिए खड़े थे..

“हे प्रभु ! सालों से आपके दर्शन की चाह थी जो आज पूरी हुई… मुझे मेरे डर से लड़ने की शक्ति दो प्रभु…।
आप तो जानते हैं उस चेहरें और नाम से भी सिहरन होती है मुझे।
बस ज़िन्दगी में कभी उससे आमना सामना ना हो… इतनी विनती है मेरे देवता..।
मेरी और मेरे पति की रक्षा करना !”

होंठो ही होंठो में उसे कुछ बुदबुदाते देख अथर्व मुस्कुरा रहा था..
दोनों दर्शन कर वहाँ से बाहर निकल आये..

“कुछ जादू टोना कर रहीं थी क्या ? मैं तो वैसे ही तुम्हारे जादू में मगन हूँ… और कितना करोगी.. !”

अथर्व की भीनी सी बात रेशम को प्यार से सहला गयी.. वो दोनों आसपास के बाकी मंदिर घूमने निकल गए…


इंद्रभान के घर पर कुसुम कुमारी को देखने जाने की तैयारियां की जा रहीं थीं….
औरतें फल मिठाइयों के टोकरे सजा चुकी थी…
साड़ियां संग रखनी थी..
घर की काम वाली बाई को शचीरूपा ने ऊपर अपने कमरे में पलंग पर पड़ी पांचों साड़ियां उठा लाने को कहा..
इसी सब व्यवस्थाओ के बीच अखंड भी नीचे दालान में अपनी दादी के पास बैठा था…
उसे इन तैयारियों से कोई लेना देना नहीं था..
एक तरह से वो सारे संसार से बैरागी हो चुका था..
उसे मालूम था उसके छोटे भाई के लिए ये सारा इंतजाम हो रहा था, लेकिन ना उसे इस बात से कोई दुःख था और ना ही कोई ख़ुशी हो रहीं थी…

कामवाली बाई ऊपर से साड़ियां उठा लायी..
उन्हें देख कर शचीरूपा उस पर झींकने लगी..

“अरे ये क्या उठा लायी… ये नहीं वो पलंग में किनारे तरफ रेशमी साड़ियां पड़ी है, वो उठा कर ला..
नयी बहुरिया देखने जा रहें हैं उसके हाथ में रेशम ही रखेंगे ना.. !”

रेशम… रेशम…

ये नाम सुनते ही अखंड के दिमाग में खलबली सी मच गयी.. बहुत दिनों से जिसे जी जान से भूलने की कोशिश में वो खुद को भुलाये बैठा था उसी का नाम सामने आते ही उसकी बेचैनी बढ़ने लगी..
उसे लगा उसके सीने में कोई आग धधक रहीं हो.. और किसी तरीके से भी इस जलन में राहत नहीं मिल पा रहीं हो… उसने सामने रखा पानी का जग उठाया और अपने मुहँ में डालने लगा..
मुहँ से होते उसका पूरा सीना उस पानी से भीग गया, उसका सफ़ेद कुरता उसके सीने से चिपक गया, लेकिन उसकी जलन शांत नहीं हुई..

अपनी जगह से उठ कर वो ऊपर अपने कमरे में जाने लगा..

“अखंड.. कहाँ चल दिये राजा ?”..

“कमरे में जा रहा हूँ !”..

“काहे.. ? तुम नहीं चलोगे साथ ?”

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Avantika
Avantika
2 years ago

Nice