अपराजिता -14

“अरे ज़रूरत कैसे नहीं है ? इसे तो हर दो घंटे में भूख लग जाती है, और फिर बाहर का अजर गजर खा कर बीमार पड़ने से अच्छा है घर का ही खाओ..
तुम्हारी पैकिंग हो गयी है तो नीचे आ जाओ.. खाना परोसना है !”

इतना कह कर वो नीचे चली गयी…।

खाना परोसना ऐसा कोई बड़ा काम नहीं था, बावजूद उसकी सास उसी से करवाना चाहती थी.. ये भी थोड़ी अजीब बात थी… रेशम ने अपने हाथ का सामान पलंग पर रखा और नीचे उतर कर रसोई में चली गयी…

क्रमशः

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