अपराजिता -14

“सरना … तुम भी खा लो !”

सरना ने उस लड़की की तरफ देखा, वो उसका इशारा समझ पलट कर रसोई में चली गयी..

कुसुम को उस लड़की का इस हक़ से उसके डाक साब के घर पर राज जमाना पसंद नहीं आ रहा था..

“आप भी कुछ खाएंगी.. ? ” राजेंद्र ने सिर्फ औपचारिकतावश पूछ लिया…
भावना ने तुरंत ना में गर्दन हिला दी..

“नहीं हम दोनों खा के आये हैं !”

राजेंद्र के चेहरें पर एक तीखी सी मुस्कान चल आयी… वह इस गांव की नियम कायदे अच्छे से जानता था!
वो जानता था बड़े घर की ये लड़कियां उसके आसपास मंडरा भले लें, लेकिन उस छोटी जाति वाले लड़के के घर बैठकर यह कुछ खा नहीं सकती…
इतनी देर में एक कुरसी खींच कर कुसुम वहाँ बैठ गयी और राजेंद्र की थाली से ही रोटी का टुकड़ा तोड़ कर अपने मुहँ में रख लिया..

राजेंद्र के साथ साथ सरना, भावना और उस लड़की का भी मुहँ खुला का खुला रह गया…
तब तक में सरना की थाली परोस कर लायी उस लड़की ने थाली सरना की तरफ बढ़ा दी। जिसे राजेंद्र ने ले कर कुसुम को थमा दिया..

“गेंदा!! पानी भी ले आओ.. !” राजेंद्र ने आदेश सा दिया और वो लड़की दो बड़े बड़े गिलास में पानी ले आई…

“देखिये डाक साब भूख ना होते हुए भी हमनें आपका खाना चख लिया आप हमारा खाना देखेंगे भी नहीं.. ?”

कुसुम की बड़ी बड़ी आँखों में आँसू आते आते रह गए.. राजेंद्र ने पहली बार कुसुम के चेहरे की तरफ ध्यान से देखा… कुसुम का पागलपन उसे भी समझ आता था, पर वो अपने और कुसुम के बीच की गहरी खाई को जानता समझता था..
भले ही वो शहर में रह कर पढ़ा लिखा था,पर वो गांवों में होने वाले भेदभाव से अनजान ना था…
अपनी नीची जाती के कारण उसने अपने कॉलेज और बाकी जगह भी बहुत कुछ सहा था….
ये और बात थी कि मेडिकल सेलेक्शन से लेकर कॉलेज की पढाई में गोल्ड मेडल कमाने तक उसने कहीं भी अपना वंशवृक्ष दिखाता जाति प्रमाण पत्र नहीं लगाया था…
जातिगत आरक्षण का लाभ उसने अपने जीवनकाल में अब तक कहीं नहीं लिया था, आज तक वो हर एक प्रतियोगी परीक्षा में अपने दिमाग की बदौलत ही अपनी धाक जमाता आया था…

कुसुम के चेहरें की मासूमियत और अपनापन देख उसे कुसुम पर तरस आने लगा, लेकिन वो ये भी समझता था कुसुम ठाकुरों की बेटी है, उससे साधारण बात व्यवहार की भी उसे अनुमति नहीं है..

फिर कुसुम जो उससे चाह रही है, वो तो बहुत दूर की बात है…..!

“यहाँ कैसे आना हुआ ?”

बात बदलने के उद्देश्य से उसने कुसुम से सवाल पूछ लिया लेकिन भावना की तरफ देखते हुए…

भावना एकदम से इस बात का कोई जवाब नहीं दे पाई लेकिन कुसुम ने अपने मन की बात कह दी..

” आपसे बहुत दिन से मिलना नहीं हुआ था बस इसीलिए आप का हाल-चाल जानना चाहते थे… लेकिन अब लग रहा है हमनें यहाँ आकर गलती कर दी… !”

कुसुम ने गेंदा की तरफ देख कर कहा..
गेंदा उतनी देर से चुप ही खड़ी थी…
कुसुम ने गेंदा की तरफ देख जिस मंशा से कहा उसे राजेंद्र समझ गया….

“ये गेंदा है, यहीं पड़ोस में रहती है.. जब तक बाबा थे वही खाना बनाया करते थे, तब भी अक्सर गेंदा बाबा के लिए खाना बनाकर ले आया करती थी। जब से मैं आया बाबा ही यह सब संभालते थे, अब उनके जाने के बाद गेंदा ही मेरे खाने पीने का ध्यान रख रही है। अक्सर उसकी मां खाना बनाकर भेज देती है, या फिर कभी कभार गेंदा ही यहां रसोई में आकर कुछ बना जाती है…!”

यह लड़की पड़ोसन है यह सुनकर कुसुम के दिल पर सांप लोट गए। उसे शक तो हो रहा था लेकिन मन में कहीं दबी छोटी सी एक आस थी, यह हो सकता है यह लड़की राजेंद्र के किसी दूरदराज के रिश्ते की बहन हो, और अगर वह लड़की राजेंद्र की बहन होती तो कुसुम उसे गले लगा कर माफ कर देती।
लेकिन नहीं यह तो पड़ोसन निकली और वह भी ऐसी छबीली पड़ोसन !
इसे देखकर तो अच्छे अच्छों का ईमान डोल सकता था। राजेंद्र तो फिर भी नयी उम्र का लड़का था। कुसुम का मन जाने क्यों व्याकुल सा हो गया, और उसके चेहरे के हाव भाव देखकर भावना सब समझ गई। भावना ने धीरे से कुसुम का हाथ पकड़ा और उसे वापस चलने का इशारा कर दिया, कुसुम ने झटके से अपना हाथ छुड़ा लिया…

” आप अस्पताल में कब से बैठना शुरू करेंगे डाक साब ?”..

“हम्म सोच रहा हूं,जल्दी ही बैठना शुरू कर दूँ ! वैसे भी अस्पताल ज्यादा दिन बंद नहीं रख सकता! मरीज यहां आने लगे थे, और मेरे पास भी ज्यादा छुट्टियां नहीं है! कल मंथली मीटिंग में जाना है वहां से लौटने के बाद परसों से डिस्पेंसरी शुरू कर दूंगा..!”

कुसुम के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान चली आई उसने भावना की तरफ देखा, भावना ने उसे घूर कर बाहर निकलने का इशारा किया और कुसुम ने धीरे से अपनी एक आँख दबा दी, वो भावना का हाथ थामे वहां से झूमते हुए बाहर निकल गई…

उसके सामने तो राजेंद्र ने उसे नहीं देखा लेकिन जब वह कमरे से बाहर निकल गई तब राजेंद्र धीरे से खिड़की की तरफ झांकने लगा ।
वही बैठे-बैठे वह कुसुम कुमारी को देखता रहा। कुसुम अपने निराले ही अंदाज में अपनी बाइक पर बैठी और मुस्कुराते हुए उसने अपनी बाइक घुमाकर रास्ते की तरफ मोड़ ली…

“ये आग है, इस आग से दूर रहना बाबू… इस आग से जले तो कहीं ठौर नहीं मिलनी है…!”

सरना ने कहा और उस दूसरी परोसी थाली को उठाकर खाने लगा। राजेंद्र भी अपनी थाली से खाने तो लगा लेकिन अब उसे खाने में स्वाद नहीं मिल रहा था… उसके मुंह का स्वाद तो वह अपने साथ लिए चली गई थी..

” अरे उनका डिब्बा तो यहीं छूट गया..!”

गेंदा का ही ध्यान सबसे पहले गया और उस डिब्बे को देखकर सरना और राजेंद्र दोनों परेशान हो उठे…!


अस्पताल में आए दिन के इमरजेंसी केस की व्यस्तता में फंसे अथर्व को अगले 2 दिन भी चैन से घर में बिताने नहीं मिले। शादी के बाद बीते पहले हफ्ते में सिर्फ दो रातें ही रेशम के साथ अथर्व बिता पाया और उसमें भी उसकी थकान उस पर इस कदर हावी थी कि, वह रेशम के कमरे में आने से पहले ही सो गया।
लेकिन आज सुबह से अथर्व बहुत खुश था। उसकी छुट्टियां अप्रूव हो गई थी और वह अपनी नई नवेली बीवी को साथ लिए घूमने जाने वाला था..।
वह पहले ही रेशम के लिए ढेर सारी शॉपिंग करके रख चुका था..

” सुनो अलमारी में उस लेफ्ट कॉर्नर पर तुम्हारे लिए कुछ कपड़े रखे हैं, उन्हें भी पैक कर लेना..!”

रेशम ने अलमारी खोली उसमें तरह-तरह के वेस्टर्न आउटफिट्स रखे थे। रेशम देख कर मुस्कुरा उठी…वो पहले भी जींस टॉप पहना करती थी… वो तो शादी के कपड़ों के नाम पर उसने साड़ी और सूट ही खरीदे थे वरना उसे आराम तो अपनी पसंद के इन्हीं कपड़ों में मिलता था…
रेशम ने उन कपड़ों को निकाला और अपने बैग में जमाने लगी… उन्हीं कपड़ों के बीच एक सुर्ख लाल रंग की घुटनों तक लम्बाई की बॉडीकॉन ड्रेस भी थी, उसे देख रेशम मुस्कुरा उठी..
उसने सलीके से सारे कपड़े जमा लिए..
मंदिर में दर्शन के लिए उसने एक रेशमी साड़ी भी रख ली…

उसकी पैकिंग चल रही थी कि उसकी सास ऊपर चली आयीं..

“बहु ये खाने का कुछ सामान है, ये भी साथ रख लेना.. !”

“जी इसकी क्या ज़रूरत है मम्मी जी ?”..

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