अपराजिता -13

अथर्व ने हाँ में सर हिलाया और अपनी शर्ट के बटन खोलने लगा..
उसका खुला सीना देखते ही शरमा कर रेशम वापस मुड़ गयी…

वो तुरंत नीचे उसके लिए चाय लेने चली गयी..
ये अच्छी बात थी कि हमेशा अपने घर में रहने के बावजूद उसे खाना चाय सब बनाना आता था.. बहुत अच्छा तो नहीं लेकिन कामचलाऊ वो सब कुछ कर लेती थी..।
खाना बनाने में तो मानव की मास्टरी थी..।
वो बचपन से ही शेफ बनना भी चाहता था,लेकिन हमारे शहर में क्या स्कोप है ? समोसे का ठेला लगाना फिर? मोमोस बेचने का शौक लग गया क्या ? जैसे जुमले सुनने के बाद उसके पापा ने मानव को समझा बुझा कर इंजीनियरिंग करवा दी, और पढ़ने में होशियार वो पढाई के बाद ही नौकरी पा गया लेकिन अपना शौक नहीं भुला.. अब भी वो जब मौका लगे कुछ ना कुछ पकाता ही रहता था..
मुस्कुरा कर वो रसोई में चली आई..

“क्या चाहिए बहु ?”

सासु माँ के सवाल पर रेशम ऊपर कमरे की तरफ इशारा कर बोल पड़ी..

“वो मम्मी जी उनके लिए चाय लेकर जानी है ! चाय बना लूँ ?”

“हाँ हाँ बहु..बना लो !”
रेशम ने चाय बनायीं और ऊपर जाने लगी की उसकी समझदार सासु माँ ने एक प्लेट में कचौड़ी और खस्ता भी साथ रख दिया..

“कुछ खा भी लेगा चाय के साथ ! और खाना भी तैयार है.. थोड़ी देर में खाने आ जाओ !”

हाँ में गर्दन हिला कर वो ऊपर पहुँच गयी..

कमरे में धीरे से घुसने के बाद उसने देखा अथर्व घोड़े गधे बेच कर सो रहा था….
उसकी थकान उस पर इस कदर तारी थी वो अपने होश खोये सो रहा था..
रेशम ने चाय एक तरफ रखी और अपने रोमांस से लबरेज कर्तव्यनिष्ठ पति को देखती रह गयी..

दो दिन से अस्पताल में एक ज़िंदगी बचाने जूझ रहे थे, इसलिए जनाब के नशे में भीगे मेसेज नहीं आ रहें थे।.

रेशम ने वहीं पैरों के पास पड़ी चादर उठायी और अथर्व को ओढ़ा दी….

उसकी सास ने उसे पुकारा और वो नीचे चली गयी.. खाना खाने का उसका मन नहीं था, लेकिन सब खाने जा रहे थे तो खाना ही था..
वो डायनिंग पर बैठने जा ही रहीं थी कि उसे लगा उसे सासु माँ के पास चले जाना चाहिए.. वो रसोई में चली गयी..
सासु जी गरमा गर्म फुल्के सेंक रहीं थी.. उन्होंने उसे तीन थालियां परोसने का आदेश दे दिया..

“तीन… आप नहीं खाएंगी ?”
रेशम के भोले सवाल के पीछे ये जिज्ञासा थी की देवर ससुर और रेशम के अलावा सासु माँ भी तो खाने के लिए बची थी..
और सासु माँ ने अपने जवाब से उसे चौंका दिया..

“नहीं तुम और मैं बाद में खा लेंगे.. पहले घर के मर्द खा लें.. !”

ओह्ह तो तीसरी थाली अथर्व की थी..

“मम्मी जी ये तो सो गए हैं !”

“अरे सो कैसे गया.. ? खैर थक भी तो बहुत गया था, दो दिन से घर नहीं आया, ये प्राइवेट वाले भी ना.. जितना पैसा देते हैं उससे ज्यादा निचोड़ लेते हैं !”…

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