अपराजिता -13
रेशम आरव के साथ घर वापस आ गयी…
मायके से लौटने का किस लड़की का मन करता होगा लेकिन ससुराल की भी याद आने लगी थी..
बड़ी कठिन होती है ये लड़कियों की ज़िंदगी.. हर वक्त एक नयी उलझन मुहँ बाएं रास्ता देखती रहती है.. !
रेशम की माँ ने उसके हाथ बहुत सारा सामान भेजा था, वो सब सासु माँ को सौंप कर वो अपने कमरे में चली आई.. ऐसा लगा उसके कमरे ने भी आगे बढ़ उसे गलबहियां डाल उसका स्वागत किया |
कई लड़कियां उस बात की शिकायत करती नज़र आती है की मायके के लोग बोलते हैं ये तुम्हारा घर नहीं ससुराल तुम्हारा घर है, ससुराल में सास कहती है पराये घर से आई हो..
लेकिन सही मायनों में देखा जायें तो अपने पति के साथ फूस की झोपड़ी भी अपना घर लगती है..
शायद इसीलिए वैदेही श्रीराम के साथ महल छोड़ कर चली गयी…
हे भगवान !! ये शादी जो ना करवाए.. कैसी फिलाॅसोफर सी सोच हो गयी है मेरी.. !
अपनी सोच पर शरमा कर रेशम ने अपना चेहरा अपने ही हाथ से ढंक लिया..
वाकई आज ये कमरा उसे बेहद अपना सा लग रहा था..
कमरे में पलंग पर अथर्व की उतार कर छोड़ी हुई टीशर्ट पड़ी थी… रेशम ने जाकर उसे हाथ में ले लिया..
उस टीशर्ट को अपनी नाक से लगा कर उसने एक गहरी सी साँस भर ली, जैसे अथर्व के शानदार बॉडीवॉश की खुशबू को खुद के अंदर भींच लें रहीं हो..
