अपराजिता -9

“दूर्वागंज के ठाकुरों की बेटी है…
बीए तक की पढाई यहीं कस्बे के गर्ल्स कॉलेज से कर रहीं.. अभी फाइनल ईयर में है.. लड़की हीरे की खान है, कुसुम कुमारी !
चंद्रभान सिंह तोमर नाम तो सुन रखा होगा आपने.. ?बस उन्हीं की छोटी बहन है !”

“हाँ हाँ चंद्रभान को कौन नहीं जानता… उससा लड़का आसपास ढूंढने पर नहीं मिलेगा….
अच्छा उसकी बहन है.. उसके घर तो कई बार आना जाना हुआ है पर छोरी कभी नजर ना आई !”

“वो भी आपकी तरह बड़े लोग हैं.. इनके घर की लड़कियां ऐसे ही थोड़े हाट बाज़ार घुमती मिलेंगी.. अपनी बहन के लिए हर व्यवस्था घर में कर रखी है…
कहते है राजकुमारी सा पाला है..।
लड़की बाज़ार नहीं जाती उसे कुछ खरीदना हो बाज़ार घर आ जाता है..।
खाना बनाने में माहिर है, घर परिवार को लेकर चलने वाली लड़की है ! बाकी अगर आपको ठीक लगे तो एक बार कुंडली… ?”

“हाँ लड़की तो अच्छी लग रहीं है… अखंड की माँ से कह कर यज्ञ की कुंडली निकलवाते है। और आपके घर भिजवाते हैं… !”

उतनी देर में पंडित जी के लिए चाय नाश्ता लिए घर के नौकर चले आये.. उन्हीं के पीछे इंद्रभान की धर्मपत्नी शचीरूपा जी भी चली आयी..
सुलटे पल्ले की साड़ी में सर पर धरा पल्ला उन्होंने वहाँ पहुँच कर ज़रा और माथे पर खींच लिया..

” परनाम करते है पंडित जी.. !”

“ख़ूब खुसी रहो ठकुराइन ! भाग सोहाग बना रहें !”

“बड़े दिनों बाद दरसन दिये हैं ब्रम्हा जी ने.. कहाँ निवास रहा आजकल ?”
“अब पंडित का कभी एक जगह निवास रहा है भला.. जब जहाँ जजमान बुला लें, वहीँ हमार डेरा ! “

“बड़े दिनों से सत्यनारायण कथा सुनना चाहते थे.. !”

“जब बुलाओ, सुना देंगे !”

मुस्कुरा कर उन्होने पंडित जी को प्रणाम किया और पंडित जी ने तस्वीर उठा कर पूरी चपलता से ठकुराइन के हाथ में दे दी..
तस्वीर पर एक उड़ती सी नज़र डाल ” हम्म अच्छी है ” कह कर उन्होंने वापस टेबल पर रख दी और मुहँ लटकाये खड़ी रह गयी..

” क्या हुआ ठकुराइन… तस्वीर पसंद नहीं आई क्या ?”

“काहे नहीं पसंद आएगी पंडित जी.. लेकिन हमारा मन तो हमारे अखंड के लिए जलता रहता है… बताइये बड़ा भाई कुंवारा बैठा है और छोटे का ब्याह रचा देंगे तो अच्छा लगता है क्या भला.. ! दुनिया बात नहीं बनाएगी कि लड़का में ही कोनो खोट होगा जभी ना बड़के को बैठा कर छुटके का ब्याह रचा रहे !”

उनके ऐसा कहते ही इंद्रभान अपना हुक्का ज़ोर से फेंक कर चीखते हुए अपनी जगह पर खड़े हो गए..

” तो जाकर उस बावले को समझाती काहे नहीं है, वो कसम ख़ा कर बैठा है हम नहीं..
ये आजकल के लड़के भी, कम ज़िद्दी नहीं है.. हमारा बस चलता दो थप्पड़ लगा कर दुरुस्त कर देते, लेकिन जवान जहान लड़का पर हाथ भी तो नहीं छोड़ सकते..
अजीब पागल सनकी लड़का पैदा की हैं.. !”

“हम का किये हैं जी.. हम पर काहे रिसिया रहे ?”

“तो… और किसे कहें…? शहर जाकर जो बैठा है वापसी का नाम नहीं ले रहा.. यहाँ आता है तो अलग मुहँ फुलाए बैठा रहता है, इससे तो अच्छा उसी समय नहीं बचाये रहते तो अच्छा रहता..।
जीवन भर का कलेस हो गया है ये लड़का.. !”..

“छी.. कुछ भी बकते हैं… कैसा मुश्किल से जान बचा है लड़के का और एक ये हैं,जो मुहँ में आया बोल जाते है…
दुसमन है आप अपने ही लड़का के.. !”

“हम तुमको दुसमन लग रहें और तुम्हारा लड़का जो बुढ़उती में हमारे प्राण लिए दे रहा वो कुछ नहीं..!
ये नहीं की सब भूल भाल कर ब्याह कर ले, अरे घर बस जायेगा तो उसे भी राहत मिलेगी और हम सब को भी, लेकिन समझे तब ना.. !”

अखंड की माँ ने और कुछ नहीं कहा, अपनी रुलाई रोकने के लिए मुहँ में आंचल ठूंस कर वहाँ से चली गयी..
दोनों पति पत्नी की लड़ाई के बीच पंडित जी भी उन्हें प्रणाम कर निकल भागे..

लेकिन कुसुम कुमारी की तस्वीर वहीँ टेबल पर फड़फड़ाती रह गयी….

इधर भावना के कमरे में पहुंची कुसुम ने उसके हाथ की किताब छीन कर एक तरफ फेंक दी..
और उसे साथ चलने का इशारा कर दिया.. भावना ने तुरंत ना में गर्दन हिला दी..
उसी समय भावना की माँ दोनों के लिए चाय लिए आ गयी..
” चाय पियोगी ना कुसुम ?”

“हाँ चाची, काहे नहीं पिएंगे.. आपके हाथ की चाय तो अमृत बराबर होती है.. !”

मज़े से चाय का प्याला मुँह से लगाने जाती कुसुम के कान में अचानक ये शब्द सुनाई पड़ने लगे..
“मैं चाय नहीं पीता’..
राजेंद्र के शब्द याद आते ही उसने कप नीचे रख दिया..

“क्या हुआ ? चीनी कम हो गयी क्या ?”

“नहीं चाची, वो आज हमारा व्रत है, इसी से नहीं पिएंगे ?”

“हैं… ऐसा कौन सा व्रत है बिटिया जिसमे चाय छोड़ना पड़ता.. हम औरतें तो चाय के भरोसे ही सारे व्रत उपवास पार लगा लेती है … !”

“राजेंद्र गुरु जी का व्रत है माते, तुम नहीं समझोगी.. !”

भावना ने कुसुम का प्याला भी उठा कर गटकना शुरू कर दिया..

“अच्छा ठीक है चाय ना पियो, हम लस्सी बना लाते हैं..

“नहीं चाची, रहने दीजिये.. अभी हम कुछ नहीं खायेंगे पिएंगे.. !”

“तुम जाओ अम्मा, कुसुम कुमारी अब खाएंगी पियेंगी तो बस अपने डॉक्टर साहब के हाथों.. !”

भावना कुसुम को छेड़ उठी.. उसकी माँ उनकी बातों के बीच उठ कर जा चुकी थी..

” जल्दी चाय सुड़को और चलो हमारे साथ !”

“कहाँ ?”

“और कहाँ ?”

“अरे नहीं कुसुम, ऐसे लाज शरम बेच ना खाओ यार ! वो डॉक्टर भी समझ गया है !”

“तो समझ जाने दो ना.. हम तो चाहते ही है की वो समझ जाये.. !”

“पगला गयी हो क्या ? और अगर कहीं वो शादीशुदा निकला तो ?”

“तो…. तब की तब देखी जायेगी.. वैसे शक्ल से तो कुंवारा लग रहा !”

“शक्ल पे ऐसा कुछ नहीं लिखा होता लड़कों के !”

“वो सब तुम हम पर छोड़ दो भावना… हम पता कर लेंगे.. तुम बस चलो हमारे साथ…।”

भावना के पलंग के किनारे टेबल पर भावना और कुसुम की बहुत प्यारी तस्वीर लगी थी.. आज फ्रेम खाली दिख रहा था उसे देख कुसुम ने फ्रेम उठा लिया..

“ये खाली कैसे हैं ? इसकी तस्वीर कहाँ गयी ?”

कुसुम के सवाल पर भावना का ध्यान भी उस खाली फ्रेम पर चला गया..

“पता नहीं ! अम्मा ने पोंछने निकाली होगी शायद और तस्वीर डालना भूल गयी.. !”

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ritakumariverma23
2 years ago

बहुत अच्छा भाग 👌👌👌