अपराजिता -8

कुसुम का दिल दप्प से बुझ गया..
बेचारी अभी अभी तो प्यार में पड़ी थी…अभी अभी तो प्यार की पींगों में झूलती वो आसमान तक उड़ कर पहुंचना चाह रहीं थी और अभी ही उसकी सहेली ने झट उसकी पतंग की डोर काट दी…

उसे लगा जैसे वो धड़ाम से ज़मीन पर गिर पड़ी हो..

“चलो चल कर पूछ लें ?”

“अभी नहीं… अब दो दिन बाद आएंगे, वरना उन्हें लगेगा तुम एकदम ही बौरा गयी हो.. अभी चलो, हमें ये किताबें लाइब्रेरी में वापस भी करनी है.. !”

“कितना पढ़ती हो भावना तुम.. ? कैसे पढ़ लेती हो इतना ? देख लेना एक दिन कलक्टरनी बन कर आओगी.. यहीं इसी जगह.. !”

“तुम्हारे मुहँ में घी शक़्कर… अब चले ?”

“चलो…

क्रमशः

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Seema Kashyap
Seema Kashyap
1 year ago

Nice part

ritakumariverma23
2 years ago

बहुत बेहतरीन भाग 👌👌👌👌👌👌👌