” रेशु एक इमरजेंसी है, मुझे तुरंत जाना होगा ! तुम मानव के साथ निकलो, मैं शाम को लेने आता हूँ.. !”
वो इतना कह कर आगे बढ़ा की रेशम ने उसकी बाँह पकड़ ली..
” लेकिन मैं आज शाम नहीं आउंगी.. ताऊ जी के बेटे रघु भैया की शादी है ना परसों.. !”
“तो… ?” अथर्व के माथे बल पड़ गए..
“तो.. शादी के बाद ही लौटूंगी !”
एक गहरी सी साँस छोड़ कर अथर्व ने हां में गर्दन हिलायी और कमरे से बाहर निकल गया..
अरे….. ये आदमी क्या है भला..?
ना गले से लगाया ना माथे को चूमा, बस गर्दन हिला कर निकल गया..
सुबह से तो यूँ लग रहा था कमरे में आते ही छोड़ेगा नहीं और एक फ़ोन आने से कैरेक्टर ही बदल गया डॉक्टर साहब का…
मुस्कुरा कर रेशम अपना सामान रखने लगी..
तभी दरवाज़ा वापस खुला अथर्व हड़बड़ा कर अंदर आया और रेशम के गालों पर अपने होंठ रख दिये..
” परसों शादी में आऊंगा, वहीं से अपने साथ वापस लें आऊंगा.. तैयारी रखना !”
वो पलक झपकते वापस बाहर निकल गया….
अपने तपते गालों पर हाथ रखें बैठी रेशम अपने पति की हरकत पर शरमा कर रह गयी…
दो दिन बीत गए थे…
एक बार फिर डॉक्टर साहब अपनी क्लिनिक पर बैठे मरीज़ देख रहें थे की फटफटिया की आवाज़ उनके कानों में चली आई.. खिड़की पे डला पर्दा ज़रा हटा कर राजेंद्र ने बाहर देखा, कुसुम कुमारी ही थी.. !
राजेंद्र मुस्कुरा कर मरीज़ देखने लगा..
कुसुम ने अंदर आने के बाद एक बार झांक लगायी..
राजेंद्र ने उसे अंदर आने का इशारा कर दिया..
वो और भावना अंदर चले आये..
भावना के हाथ में कुछ किताबें भी थी..
राजेंद्र ने उस मरीज़ को निपटाने के बाद कुसुम को अपने पास बुला कर मरीज़ों वाली स्टूल पर बैठा दिया..
उसका पैर उठा कर वो छोटी स्टूल में रख मुआयना करने लगा..
उसने धीरे से पट्टी खोल दी..
ज़ख्म गहरा ज़रूर था पर भरने लगा था.. वो वापस मरहम पट्टी में लग गया..
” काफ़ी बढ़िया इम्प्रूवमेंट है !”
“हाँ फिर… आखिर ज़ख्म किसका है ?”
राजेंद्र को कुसुम की इस शेखी पर हंसी आ गयी..
“उससे क्या फर्क पड़ता है ?”
राजेंद्र के ऐसा कहते ही भावना बोल पड़ी..
” इसके कहने का मतलब है ज़ख्म भी इससे डर गया.. !”
राजेंद्र को फिर हंसी आ गयी..
” और कौन कौन तुमसे डरता है कुसुम ?”
“सभी डरते हैं, पूरे गाँव में दबदबा है हमारा !”
“गज़ब… और तुम इंजेक्शन से डरती हो !”.
राजेंद्र की बात सुन भावना फिक्क से हॅंस दी और कुसुम उसे घूर कर देखने लगी..
ड्रेसिंग करने के बाद राजेंद्र हाथ धोकर आया, हाथ पोंछते हुए वो अपनी कुर्सी पर बैठ गया..
कुसुम ने अपने झोले से एक डिब्बा निकाल कर राजेंद्र के सामने रख दिया..
” ये आपके लिए लाये हैं… मूंग की दाल का हलवा !”
राजेंद्र ने देखा और मुस्कुरा कर डिब्बा बंद कर दिया..
” यहाँ नहीं खाता हूँ मैं, घर जाकर खा लूंगा !”
हाँ में गर्दन हिला कर कुसुम खड़ी रहीं..
राजेंद्र ने उसे देखा की वो जा क्यूँ नहीं रहीं, लेकिन वो मुस्कुराती हुई खड़ी रहीं.. ..
” खाइयेगा ज़रूर, शुद्ध घी में बना है.. हमारी भैंस ख़ूब गाढ़ा दूध देती है.. रोज़ का पाँव भर घी बनता है हमारे यहाँ… भैया लोग तो घी का ही पराठा खाते हैं.. !”
“हम्म… !” राजेंद्र ने अगले मरीज़ को बुला लिया..
भावना ने धीरे से कुसुम को चलने का इशारा किया लेकिन वो अब भी वहीं जमी रही..
” आपके लिए भी घी लें आएंगे, हम !”
“मैं घी नहीं खाता ?”
“अरे क्यूँ… घी तो अच्छा होता है.. !”
“होता होगा, मुझे नहीं पसंद.. मुझे दूध दही छाछ कुछ नहीं पसंद… !”
कुसुम का मुहँ बन गया..
” फिर क्या चाय बिना दूध की पीते हैं ?”
“चाय भी नहीं पीता हूँ.. !”
“हे राम… फिर जीते कैसे हैं ?”
राजेंद्र ने मुस्कुरा कर उसे देखा और भावना की तरफ देखने लगा..
भावना उसका इशारा समझ गयी..
” अब चलो कुसुम, डॉक्टर साहब को और भी मरीज़ देखने हैं !”
एक तरह से धकियाते हुए ही भावना कुसुम को वहाँ से बाहर ले गयी…
“तुम तो अंदर बिल्कुल ही पगला गयी थी कुसुम कुमारी ? अगर तुम्हारे चंद्रा भैया को मालूम चला ना कि उनकी लाड़ली बहन अस्पताल के नैके डॉक्टर के चक्कर में रोज़ यहाँ फरफरा रहीं है तो हो गयी तुम्हारी छुट्टी ?”
कुसुम ने भावना को देखा और मुहँ बना लिया..
” अच्छा सुनो कुसुम… सोचो अगर डॉक्टर साहब शादीशुदा निकले तो.. ?”

Nice part
बहुत बेहतरीन भाग 👌👌👌👌👌👌👌