अपराजिता -8

और वो शरमा कर ना में गर्दन हिला गयी..
पंडित जी की तरफ हाथ बढ़ाना हो या कोई और काम हर बार वो रेशम को किसी न किसी बहाने छू जाता और वो सिहर कर रह जाती..

ले देकर पूजा सम्पन्न हुई….
वहाँ बैठे सभी लोगों को प्रसाद के बाद नाश्ता देकर अथर्व की माँ ने उन दोनों को भी नाश्ते की प्लेट पकड़ा दी..
ज्यादातर लोग खा कर निकल चुके थे, टेबल पर अथर्व की माँ मासी बुआ रिश्ते के दो तीन भाई बहन और रेशम ही थे..
अथर्व की सगी बड़ी बहन और जीजा भी थे…
इतने लोगों के बीच रेशम को वैसे भी खाने में संकोच सा लग रहा था..
उस पर अथर्व वहाँ उसकी तरफ देख भी नहीं रहा था..

कुछ ज्यादा ही अजीब नहीं है ये.. अब तक तो ऐसे चिपक रहा था जैसे मौका मिल जायें तो तुरंत कस कर गले से लगा ले और अब खाने की टेबल पर बिल्कुल अनजान अपरिचित हो गया..।
अपने जीजा से बातों में लगे अथर्व की प्लेट में जैसे ही उसकी माँ ने पूड़ी डाली वो बिगड़ गया..

“अरे मुझे और नहीं चाहिए थी माँ !”

“कोई बात नहीं, अब खा ले.. क्या फर्क पड़ता है एक पूड़ी से !”

“पड़ता है.. !”

और उसने अपनी प्लेट से उठा कर पूड़ी रेशम की प्लेट में डाल दी..
एक बार फिर वो इतने लोगों के बीच संकोच में गड़ गयी..
क्या सोचेंगे ये सब.. एक ही दिन में इतना प्यार पनप गया की अपनी जूठी प्लेट से खाना ही डाल दिया..
लेकिन अथर्व का हक़ से उसकी प्लेट में पूड़ी डालना रेशम को अंदर तक सहला गया..

सच में अग्नि के पवित्र फेरों में कोई जादू तो होता है.. वरना ये सारे जीवन भर के रिश्तों पर कैसे उसका एक दिन पहले जुड़ा रिश्ता भारी पड़ गया..
आज तक वो भी अपने भाई की प्लेट में अपना खाना ऐसे ही सरकाती आई थी, और आज अथर्व ने भी उतने ही हक़ से वहीं काम किया था..
वो मुस्कुरा कर खाने लगी..

उसी वक्त उसके मोबाइल पर मेसेज बीप बजने लगी..
उसकी गोद में मोबाइल था, उसने देखा ‘अथर्व सर’ नाम से नोटिफिकेशन थी, उसने सर उठा कर सामने देखा.. अथर्व अपने जीजा से बात करने में व्यस्त था..

“जल्दी नाश्ता खत्म कर के ऊपर कमरे में चली आना.. ! हमारा किस बाकी है !”

हे भगवान !! कैसा निर्लज्ज आदमी है.. बात बात पर सब के सामने शर्मिंदा किये दे रहा..

सिर्फ एक मेसेज पढ़ कर रेशम की कान की लोरिया जल उठी और वो सामने बैठा मजे से सबसे बातचीत में लगा रहा..

उसी वक्त रेशम के ससुर जी बाहर वाले कमरे से अंदर चले आये..

“अरे सुनती हो.. ये बहु के भाई साहब आये हैं.. इन्हें भी कुछ खिलाओ पिलाओ..

ये शब्द सुनते ही रेशम एक झटके से खड़ी हुई और पीछे घूम गयी.. सामने मानव को खड़ा देखा वो बिना कुछ सोचें समझे उसके पास जाकर उसके सीने से लग गयी..
मानव ने भी प्यार से उसके सर पर हाथ रख दिया..

अथर्व की माँ मुस्कुराते हुए मानव के पास चली आई… मानव ने उनके पांव छुए और अपनी माँ के हाथ भेजा सारा सामान उनके हाथों में रख दिया..

” अरे इतना सब लाने की क्या ज़रूरत थी.. ?”

मानव के हाथ से फल मिठाइयां हाथ में लेते हुए उन्होंने कहा और सामान रखने चली गयी..
अथर्व मानव के पास पहुँच गया..
मानव रिश्ते का मान रखते हुए अथर्व के पैर छूने झुकने को था कि अथर्व ने उसे रोक लिया..
और उसे सीने से लगा लिया..

“आप बड़े है, पैर कैसे छुवा सकता हूँ आपसे !”

“हमारे तरफ छोटी बहन के भाई पैर ही छूता है तो इस लिहाज़ से..

मानव की बात पर ना कहते हुए अथर्व उसे साथ लिए आगे बढ़ गया..
मानव भी सब के साथ बैठ गया..
एक बार फिर वहाँ हंसी ठिठोली शुरू हो गयी.. अथर्व की माँ मानव के लिए भी चाय नाश्ता ले आई…
मायके में दिन दिन भर बोल बोल के सबके सर में दर्द कर देने वाली रेशम आज यहाँ चुप बैठी सबकी बातें सुन रहीं थी..
उसके रिश्ते के देवर ननन्द उसे छेड़ते भी जा रहें थे..
और वो मुस्कुरा कर रह जाती थी.. मानव भी उन सब के साथ गपशप में शामिल था…

इसी सब के बीच रेशम की नजर सामने बैठे अथर्व पर पड़ी.. वो बीच बीच में उसे बड़ी गहरी नज़र से देख लेता था..
इस बार रेशम की जैसे ही उस पर नजर पड़ी उसने उसे ऊपर आने का इशारा किया और मानव से मैं दस मिनट में आया बोल कर निकल गया..।

हद है ये आदमी ! अब इतने लोगों के बीच से कैसे निकल कर जाऊं ? ये सब लोग समझ नहीं जायेंगे कि आखिर ऐसा क्या माजरा हो गया जो दोनों दूल्हा दुल्हन अपने कमरे में चले गए..
बाकियों की छोडो, मानव क्या सोचेगा ?
छी ये आदमी सबके सामने इज्जत उतार कर मानेगा…।

इतने सब के बावजूद अब रेशम से वहाँ रहाई भी नहीं पड़ रहीं थी..
अथर्व उसे बुला कर गया था और यहाँ से निकल कर जाने में उसकी जान मुहँ को आ रहीं थी..।
लेकिन एक मन जाने को बेकरार भी हुआ जा रहा था..

उसी समय अथर्व की माँ कुछ पैकेट्स हाथ में लिए वहाँ चली आई..

“शाम को आरव को भेज दूंगी, बहु को लाने !”..

आरव अथर्व का छोटा भाई था.. वो भी वहीं बैठा अपनी नयी नवेली भाभी को देख कर मुस्कुरा रहा था..

“आंटी जी, वो दअरसल ताऊ जी के बेटे यानी रघु भैया की भी शादी है ना.. परसों ही तो बारात है इसलिए मम्मी का कहना था रेशम शादी तक वहीँ रुक जाती.. रिसेप्शन
के बाद मैं खुद छोड़ जाऊंगा !”

अथर्व की माँ का मुहँ बन गया.. लेकिन उसी समय उसके पिता चले आये..

“अरे हाँ तिवारी जी का कार्ड आया तो है.. परसों ही तो बारात है ना शायद.. हाँ भाई अब बड़े भाई की शादी है तो बहु को रुकना ही पड़ेगा.. एकदम ही साथ साथ रख दी शादी आपके परिवार ने !”

“जी अंकल जी ! रघु भैया की तो पहले से तय थी, रेशम की ही अचानक में हुई तो फटाफट सब हो गया.. !”

अथर्व के पिता ने मानव के कंधे थपथपा दिये…
मानव मुस्कुरा उठा, उसने रेशम की तरफ देख कर हलके से चलने का इशारा कर दिया…

बाहर हलकी हलकी सी बारिश हो रहीं थी.. घर के अंदर ढ़ेर सारी चहल पहल थी.. मौसम बहुत सुहावना था..
एक तरफ पीहर बुला रहा था, दूसरी तरफ सासरा छोड़ा नहीं जा रहा था..

” मैं सामान पैक कर लूँ ?”

रेशम ने धीरे से इजाज़त ली और मानव ने पलकें झपक कर हाँ कह दिया..

अपने दिल की धड़कनो को संभाले हुए वो ऊपर अपने कमरे तक पहुंची.. दरवाज़ा खोल कर अंदर जाने में उसकी साँस आफत में पड़ गयी..
अंदर अथर्व उसी का इंतज़ार करता बैठा था…लेकिन उसी वक्त उसका मोबाइल बजा और उसे फ़ोन उठाना पड़ गया…
अस्पताल से कोई इमरजेंसी थी.. उसे बुलाया जा रहा था..
वो छलांग लगा कर पलंग से उतरा और अगले ही पल अपनी जींस चढ़ा कर वो अस्पताल निकलने के लिए तैयार था..

रेशम उसे देखती रह गयी.. सुबह से अब तक उसे छू भर लेने के लिए तरसता उसका ताज़ा ताज़ा पति अस्पताल के एक फ़ोन पर कर्तव्यपरायण डॉक्टर के चोले में आ गया था..

वो रेशम के करीब आया और उसके कंधे पर कोमलता से हाथ रख दिया..

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Seema Kashyap
Seema Kashyap
1 year ago

Nice part

ritakumariverma23
2 years ago

बहुत बेहतरीन भाग 👌👌👌👌👌👌👌