अपराजिता -13

राजेंद्र ने भावना की तरफ देख कर ना में गर्दन हिला दी..

“मुझे नहीं पता.. !”

बाबा ने धीरे से आंख खोली और बहुत कष्ट से अपनी उंगली उठाकर एक तरफ को इशारा कर दिया। उस तरफ दीवार पर एक छोटी सी लकड़ी की तख्ती रखी थी जिसमें दो-चार नाममात्र के भगवानों की तस्वीरों के साथ एक छोटी पानी से भरी शीशी थी! भावना भागकर उस शीशी को उठा लाई..!
उसने सरना की तरफ देखा और उसे आदेश दे दिया..

” आस पास कहीं तुलसी का पौधा है तो तुलसीदल ले आओ!”

सरना हाँ में सर हिलाता हुआ बाहर निकल गया..
राजेंद्र भी अपने बाबा की हालत समझ गया था, फिर भी उसका डाक्टरी चित्त हार मानने को तैयार ना था..

सरना के तुलसी दल लाते ही भावना ने उससे जरा सा एक टुकड़ा लिया और गंगाजल के साथ दादाजी के मुंह में रख दिया..

” अभी इन्हें जल्दी से ले चलिए..!”

भावना के ऐसा करने के बाद सरना की सहायता से राजेंद्र अपने दादा जी को उठाने की कोशिश कर रहा था, की उनका शरीर निष्प्राण हो गया..

वहां खड़े वो चारों लोग निःशब्द रह गए ।
उन चारों ने ही पहली बार अपनी आंखों के सामने मृत्यु देखी थी…
राजेंद्र भरभरा कर ढह गया।
कुसुम ने आकर उसे पकड़कर सहारा दे दिया। बड़ी मुश्किल से सरना और भावना ने बाबा के शरीर को नीचे लिटाया…
भावना ने सरना को बाहर जाकर अड़ोस पड़ोस में सभी को बताने के लिए कहा और खुद मंदिर वाली पेटी के नीचे रखें दीपक में तेल और बाती डालकर जला कर लें आयी…

उन चारों ही नासमझ युवाओं के लिए यह सब कुछ पहली बार था।
भावना ने अपनी दादी के समय जो देखा था उसने वही किया। लेकिन थी तो वह एक कमजोर और कोमल दिल की लड़की ही।
उसकी रुलाई रुक नहीं रही थी और दीपक रखने के बाद वह जोर से सिसक उठी..।
अचानक उसे अपनी दादी का समय याद आ गया और इसी के साथ इतने सालों से दूर रहते अपने पिता की भी याद चली आई।
कुसुम राजेंद्र को एक तरफ बैठाकर भावना को संभालने लगी। रुलाई तो कुसुम को भी आ रही थी, लेकिन राजेंद्र की हालत देख देख कर वह चिंतित ज्यादा हो रही थी…।
अब तक बिट्टू भी अस्पताल बंद कर कर भागता दौड़ता वहां चला आया था। उसने जैसे ही देखा कि दादाजी नहीं रहे ,वह राजेंद्र के पास उसे सांत्वना देने पहुंच गया। उसे समझाते हुए अचानक बिट्टू का ध्यान वहीं पर खड़ी कुसुम और भावना पर गया और वह भागकर कुसुम के पास चला आया.. कुसुम भी अपने आंसू नहीं रोक पा रही थी और दोनों ही सहेलियां एक दूसरे को ढांढस बंधाती रो रही थी। बिट्टू ने आकर कुसुम के सामने हाथ जोड़ दिए..

” दीदी आप दोनों जितनी जल्दी हो सके यहां से निकल जाइए…! ठाकुर साहब को पता चल गया कि आप हम नीची जाति वालों के मोहल्ले में आई थी तो बड़ा कांड हो जाएगा..।
भावना दीदी बात को समझिये और आप दोनों जाइये यहाँ से.. !”

भावना ने उसकी बात को मानते हुए कुसुम का हाथ पकड़ा और कमरे से बाहर निकल गई, लेकिन कुसुम राजेंद्र को इस हालत में छोड़कर जाने को तैयार नहीं थी। उसने राजेंद्र की तरफ देखा और उसके पास चली आई..
राजेंद्र वहीं जमीन पर घुटनों में अपना चेहरा छुपाए बैठा था। कुसुम ने जाकर धीरे से उसके कंधे पर हाथ रख दिया..

” अपना ध्यान रखिएगा डॉक्टर साहब हम आते रहेंगे..

बिट्टू कुसुम के पास आकर वापस उसके हाथ जोड़ने लगा..

” दीदी आपका इस घर में मिलना डॉक्टर साहब के लिए बहुत गलत हो जाएगा।
बात को मानिए अगर चंद्रा भैया को मालूम चल गया ना तो डॉक्टर साहब को कल के कल गांव से बाहर खदेङ देंगे ।
आप जाइए यहां से..!”

एक तरह से खींचतान कर ही भावना कुसुम को वहां से निकाल ले गई..

उस मोहल्ले से निकलने के बाद आगे बढ़कर तालाब के पास कुसुम ने कुछ देर के लिए गाड़ी खड़ी कर दी। तालाब की सीढ़ियों में बैठकर वह जोर से रो पड़ी। उसने अपने जीवन काल में पहली बार यह सब देखा था और इसीलिए उसके अंदर की लड़की बेचैन हुई जा रही थी। भावना भी कुसुम को अपनी बाहों के घेरे में लिए उसके आंसुओं में अपने आंसू मिलाती रही। वो दोनों अबोध लड़कियां वहां तालाब के किनारे बैठे जी भर कर रोने के बाद अपना मुंह धो कर घर की तरफ निकल गई..।
कुसुम ने जैसे ही भावना को उसके घर के पास उतारा, भावना उतरकर कुसुम के पास चली आई..।

” कुसुम घर जाकर सर से नहा लेना.. छूत लगती है…”

” हम्म.. !”

कुसुम ने अपनी गाड़ी आगे बढ़ा दी घर पहुंच कर गाड़ी को बाहर खड़ा कर वह सीधे सीढ़ियां चढ़कर ऊपर अपने कमरे की तरफ बढ़ गई। दालान में बैठे उसके पिता ने उसे आवाज भी दी लेकिन उसने उन्हें अनसुना कर दिया….


क्रमशः

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