अपराजिता -13

“तुम्हारे प्यार के चक्कर में किसी दिन हम कहीं मरे पड़े मिलेंगे.. !”

“शुभ शुभ बोलों यार.. पंडिताइन हो.. तुम्हें नहीं पता, दिन में कभी एक बार जीभ पर सरस्वती माता विराजती है… और तुम्हारी जीभ पर तो आठ दस बार विराजती होंगी.. !”

“पगलैट… चलो फटाफट दर्शन निपटाओ और कॉलेज की तरफ गाड़ी भगाओ.. !”

बाइक से उतर कर मुस्कुराती हुई कुसुम अस्पताल में दाखिल हो गयी..
राजेंद्र के कमरे का दरवाज़ा लगा हुआ था.. उसने सामने बैठे बिट्टू से पूछा..

“ये डाक साब दरवाज़ा बंद कर के क्या कर रहें अंदर ?”

“कोई महिला रोगी है, उनकी जांच कर रहे हैं..?”

” यह क्या बात हुई महिला रोगी हो या पुरुष दरवाजा तो खुला होना चाहिए ना..?”

बिट्टू ने आंख उठाकर कुसुम कुमारी की तरफ देखा और वापस नीचे सर झुका कर रजिस्टर भरने लगा..

” महिला रोगियों की जांच के लिए दरवाजा बंद रखना पड़ता है दीदी…का है ना कपडा उपडा हटाना पड़ता है ना.. अब ऐसे में खुले में कैसे जांच करेंगे डॉक्टर साहब कोई आ गया अचानक तो..?”

यह सुनकर कुसुम ने अपने खुले मुंह पर अपना हाथ रख लिया…

” कपड़ा उपड़ा हटाकर कौन सी जांच कर रहे हैं डॉक साब ?”

कुसुम दरवाजे को धक्का देकर अंदर जाने को थी कि बिट्टू ने उसे रोक लिया ।
वह दरवाजे के ठीक सामने आकर खड़ा हो गया..

” अंदर मत जाइए दीदी डॉक्टर गुस्सा हो जाएंगे..!”

” भाड़ में गए तुम्हारे डॉक्टर साहब और उनकी मरीज..!”

तमतमाते हुए कुसुम ने दरवाजा अंदर की तरफ ठेला और कमरे में घुस गयी…

अंदर दो महिलाएं बैठी थी। राजेंद्र अपनी टेबल पर रखे पैड पर दवाइयां और बाकी की जांचे लिख रहा था। उसकी बगल में मरीज वाली स्टूल पर बैठी महिला अपना आंचल सही कर रही थी और एक प्रौढ़ महिला सामने की बेंच पर चुपचाप बैठी थी..।

” यह दरवाजा बंद करके जांच करने का कौन सा तरीका है डाक साब ?”

राजेंद्र की तरफ देखते हुए कुसुम ने कहा और राजेंद्र ने उसे इशारे से उस प्रौढ़ महिला के बगल की खाली जगह में बैठने का इशारा कर दिया..

अपना मुंह फुलाए हुए कुसुम कुमारी जाकर उस बेंच पर बैठ गई..
भावना को कुसुम की इन हरकतों से बहुत संकोच सा लगता था, लेकिन अपनी सहेली को हर बात पर टोकना भी उसे सही नहीं लगता था, इसलिए भावना भी चुपचाप उसके बगल में जाकर बैठ गई..।

” इस जांच के लिए आपको शहर तक जाना पड़ेगा.. और इस जांच की रिपोर्ट आप मुझे दिखाइएगा इसके बाद मैं आपका ट्रीटमेंट शुरू करूंगा!”

“ठीक है डाक्टर साहब.. अगला महीना में हम जाँच के लिए जायेंगे.. !”

“मेरे हिसाब से जितनी जल्दी जायें उतना अच्छा है..
मैंने इसमें सरकारी अस्पताल के उस डॉक्टर का भी नाम लिख दिया है जो यह जांच करेगा ।
आप वहां जाकर मेरा नाम बताइएगा आपका काम आसानी से हो जाएगा..।

हां में गर्दन हिलाकर वह महिला मरीज अपनी जगह से उठ गई। वह लड़की मुश्किल से 22- 23 बरस की थी और वह अपनी सास के साथ राजेंद्र के पास अपनी कुछ जांच करवाने आई थी। राजेंद्र को नमस्ते करके दोनों सास बहू वहां से निकल गई ।
उन लोगों के वहां से निकलते ही राजेंद्र ने कुसुम की तरफ देखा..

” कहिए क्या परेशानी है आपकी..?”

” उस औरत को क्या हुआ था ? क्या दिखाने आई थी वह आपके पास?”

“उसके राइट साइड के ब्रेस्ट में एक छोटी सी गांठ जैसी उसे लग रही है..।
उसी की जांच करवाने आई थी वह ! जांच-पड़ताल करने के बाद मैंने कुछ टेस्ट लिखे हैं उसके बाद ही पता चलेगा कि क्या है?”

“आपने अपनी आंखों से देख कर जांच पड़ताल की?”

“बेशक। “

राजेंद्र के मुंह से यह सारी बातें सुनकर कुसुम पल भर के लिए लजा गई.. लेकिन दूसरे ही पल उसके दिमाग में यह खुराफात चलने लगी कि राजेंद्र ने खुद उस लड़की की जांच की होगी ।
वह खुलकर कुछ बोलने वाली थी की भावना ने उसके कंधे पर हाथ रख दिया!
राजेंद्र भी उठ कर अपने हाथ धोने के लिए अपने केबिन से निकलकर बाहर चला गया..!

“ऐ कुसुम डॉक्टर साहब के सामने कोई बौड़मपना मत कर देना! वह डॉक्टर है, और उस सामने वाली औरत को मरीज समझकर उसकी जांच कर रहे थे! इस सब में तुम अब अपनी नाक मत घुसा देना..!”

” तुम तो हमें एकदम ही पगलेट समझ ली हो !”

” तुम हो गई हो समझी.. वह आदमी डॉक्टर है उनके लिए सामने खड़ा इंसान सिर्फ मरीज होता है औरत या आदमी नहीं! वह अगर अपनी मरीज की जांच करते वक्त उसके शरीर के अंगों को देखते भी हैं तो डॉक्टर के नजरिए से देखते हैं, किसी लफंडर लड़के की नजर से नहीं!
इसलिए तुम्हारे अंदर ये जो कुलबुला रहा है ना उसको शांत करके बैठा दो…
अभी तुम्हारा दिमाग खराब हो रहा है तो तुम हमारे साथ कॉलेज चलो और अगर तमीज से बैठ कर बात करना है, तभी यहां रुकना.. !”

भावना की बात बिल्कुल सही थी। कुसुम के दिमाग में खलबली तो मची हुई थी लेकिन भावना की कही बातें भी उसे धीरे से समझ में आ गई, और वह चुपचाप बैठ गई।
इतनी देर में राजेंद्र भी हाथ धो कर एक छोटे टॉवल से हाथ पोंछता वहां चला आया। उस ने कमीज की बाहें कोहनी तक मोड रखी थी…

उसकी बांह में महीने भर पहले की खरोच का निशान अब तक बना हुआ था…

” आपका घाव भरा नहीं अब तक?”

राजेंद्र की बांह के उस हिस्से को देखते हुए कुसुम ने पूछा और राजेंद्र ने उसकी नजर अपनी बांह पर देखकर कमीज की बांह नीचे करके उसका बटन लगा लिया..।

“लगभग भर गया है.. आपका घाव कैसा है? वैसे बहुत दिनों के बाद आई हैं आप..!”

” हां हमें हमारे नाना जी के घर जाना पड़ गया था, हमारे मामा की बेटी की शादी थी ना! तो बस ।
वैसे हमारा मन तो नहीं था, लेकिन अम्मा जबर्दस्ती करके ले गई…!”

राजेंद्र ने उसे देखा और वापस अपने टेबल का सामान उलटने पलटने लगा…

कुसुम कुमारी का ख़ून जल गया..
कहाँ तो एक महीने बाद वो वापस आई थी, और कहाँ ये खड़ूस उसकी तरफ देख कर हालचाल पूछने की जगह अपने कागज़ और दस्ते को देख रहा है…

भावना ने उसे कुहनी मारी..

“क्या है.. ?” झल्ला कर कुसुम ने पूछा..

“चले.. ?”

भावना ने उसे चलने का इशारा किया और अपनी जगह पर खड़ी हो गई..

उसी समय सरना भागता हुआ वहाँ चला आया..

“ऐ राजी, जल्दी चलो यार.. तुम्हारे बाबा की साँस उखड़ रहीं है… ! उनकी तबियत बिल्कुल सही नहीं है..!”

सरना की बात सुनते ही राजेंद्र फट से उठा और बाहर निकल गया.. उसके पीछे ही कुसुम और भावना भी लपके…

सरना अपनी बाइक में आया था.. उसने गाड़ी स्टार्ट की और राजेंद्र पीछे बैठ गया..सरना ने गाड़ी भगा दी..

कुसुम ने भी गाड़ी गाड़ी स्टार्ट कर दी.. भावना जैसे ही पीछे बैठी कुसुम ने सरना के पीछे गाड़ी भगा दी..

“कुसुम पगला गयी हो क्या.. ? उस मुहल्ले में गाड़ी मत मोड़ों यार.. तुम तो लाड़कुंवर हो, तुम्हें तुम्हारी अम्मा फिर भी बचा लेगी हमें तो कद्दू समझ कर काटा जायेगा.. !”

लेकिन कुसुम ने भावना की एक ना सुनी..

सरना और कुसुम लगभग एक ही समय पर पहुंचे.. राजेंद्र भागता हुआ अंदर चला गया..

उसके दादा जी को साँस लेने में बहुत तकलीफ हो रहीं थी..
राजेंद्र उनके पास पहुँच गया.. उसने तुरंत उनकी नब्ज़ टटोली.. नब्ज़ एकदम धीमी होने लगी थी… सरना से मांग कर उसने तुरंत उनका बीपी लेना शुरू कर कर दिया..

दादा जी का बीपी नीचे गिरने लगा था..
राजेंद्र एक डॉक्टर था, उसकी अनुभवी आँखों ने मृत्यु की गंध सूंघ ली…
उसने ऊपर देखते हुए भगवान को प्रणाम किया और दादा जी को उठाने की कोशिश करने लगा..

” सरना, बाबा को शहर के अस्पताल लें जाना पड़ेगा.. यहाँ इतनी सुविधा फ़िलहाल नहीं है की बाबा का इलाज शुरू कर पाऊँ.. ! कहीं से गाडी लें आओ भाई.. !”

सरना ने हाँ में गर्दन हिलायी और बाहर जाने लगा कि वहीँ खड़ी भावना बोल पड़ी..

“घर पे गंगा जल रखा है ?”

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