अपराजिता -12

” यार मम्मी आप तो हर 1 घंटे में मुझे ऐसे खिला रही हो, जैसे मुझे किसी भूखे कंगले के घर ब्याह दिया है! जहाँ मुझे खाने ही नहीं मिलता !”

“सच में मम्मा इतनी अति ना करो…वरना ये रेशम के धागे की जगह उसका ककून बन जायेगी.. !”

मानव ने उसके सर पर धीरे से एक टपली मारी और खुद नाश्ते की प्लेट उठाये खाने बैठ गया..
रेशम ने ना खाने के लिए गर्दन हिला दी..

“मुझे ये सब नहीं खाना.. !”

“फिर.. ? क्या खाना है बोल ?”
.मानव के पूछने पर रेशम ने मुस्कुरा कर मानव को कुछ इशारा किया और मानव ने हाँ बोल कर अपनी गाड़ी की चाबी उठा ली और खड़ा हो गया…

“चल फिर चले… !”

“अरे… अभी अब इतना सारा कुछ मैंने बना रखा है, वो सब छोड़ कर तुम दोनों राक्षस कहाँ चले ?”

“इसको कुल्फी खिला कर ला रहा हूँ.. !”

रेशम ने जींन्स पहन रखी थी, वो वैसे ही जाने लगी..

“कपड़े तो बदल लें रेशु !”

“ज़रूरत नहीं है मम्मी.. !”

मानव ने कहा और रेशम को साथ लिए निकल गया..
दोनों भाई बहन बाइक पर कुल्फी वाले के पास पहुँच गए..
वहाँ हाथ में कुल्फी आते ही रेशम को अथर्व की याद आ गयी… और वो हलके से मुस्कुरा कर रह गयी…

क्रमशः

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