अपराजिता -11

वो एक लेदर का बैग कंधे पर टाँगे भागता हुआ भीतर चला आया..
शची ख़ुशी से खड़ी हो गयी..

लम्बे लम्बे डग भरता वो अंदर चला आया..
आते ही उसने सबसे पहले अपनी दादी के पैर छुए फिर अपनी माँ के पास जाकर उनके पैरों में झुक गया..

उसकी माँ की आंखें अपने लाड़ले को देख भर आई..
खुलता हुआ सा रंग और बड़ी बड़ी आँखों को ढंकते हुए माथे पर फ़ैले बेतरतीब बाल आधा चेहरा ढक रहे थे, और बाकी का चेहरा उसकी दाढ़ी ने छुपा रखा था…।
वो पैर छू कर खड़ा हुआ और उसकी माँ ने उसे सीने से लगा लिया…
माँ के आँसू उसकी कमीज़ भीगा गए..

“ये क्या अम्मा… हमारे आते ही रोने बैठ गयी.. अरे अभी मरे थोड़ी ना है.. जब मर जायेंगे तब अपना ये रोने का शौक पूरा कर लेना.. !”

उसकी माँ ने एक हल्का सा थप्पड़ उसके गाल पर लगा दिया और वो अपना गाल सहलाता मुस्कुरा कर चाची की तरफ बढ़ गया..
उनके पैर छूकर वो अपने कमरे में जाने को था की उसकी चाची ने उसे रोक लिया..

“बैठ जाओ लल्ला.. हमारे साथ ही चाय पी लो.. !”

हाँ में सर हिला कर वो बैठ गया…

नीचे मोढ़े पर बैठने पर उसके लम्बे पैर रखे नहीं जा रहे थे.. अपने पैरों को हाथों के गोल घेरे में लपेटे वो ओसारे को देखने लगा…

उसकी आँखों में तैरती उदासी देख उसकी माँ अपनी रुलाई रोकती उसके लिए चाय लेने चली गयी…

क्रमशः

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