शाम के समय दालान में बैठी औरतें साथ में चाय पी रहीं थी.. दादी अपने तख़्त पर विराजी उस तस्वीर को उलट पलट कर रहीं थी..
वहीँ एक तरफ शचीरूपा और उसकी देवरानी शकुन मोढ़े पर बैठी चाय सुड़क रहीं थी..
“लड़की तो सुंदर है… पर कास अखंड मान जाता तो उसी से इसके फेरे करवा देते.. !”
दादी ने ठंडी आह सी भरी… उनके प्राण इनके सबसे बड़े नवासे यानी अखंड में बसते थे….
और अखंड के जीवन में पांच साल पहले ऐसा कुछ हुआ था की उसने आजीवन शादी ना करने की अखंड प्रतिज्ञा कर ली थी….
दादी की बात सुन उनकी बहु शची बोल पड़ी..
“क्या कहें अम्मा जी ! एक से बढ़ कर एक लड़की दिखा डाले लेकिन उसके पता नहीं क्या भूत सवार है ! सोने जैसे लड़का हमारा बौरा गया है एकदम !”
“काहे जिज्जी वो पीपल वाले बाबा जी के पास एक बार फुंकवा काहे नहीं देती.. ! हो सकता है कोई चुड़ैल चिमटी हो.. वो बढ़िया झाड़ फूँक के सब उतार देते हैं !”
“अरे वो बावला किसी की सुने तब तो… !
कितना सुंदर चंचल लड़का था हमारा.. लोग देख कर आह भरते थे.. सब कहते थे का खा कर पैदा की हो शची, ये तो साच्छात यक्ष गंधर्व लगे हैं.. …
जले ज़बान सब की.. हमारे लड़का को नज़र लगा दी.. !”
“सही कह रहीं जिज्जी.. कैसे कुम्हला से गये है अखंड.. !
कहने को शगुन अखंड और यज्ञ की चाची थी, पर अपने भतीजो को भी वो सम्मान दिया करती थी..
इस घर में लड़कों का एक विशेष स्थान था..
पहली लड़की जनने के बाद अपनी सास जेठानी और पति के ताने सुन कर वो अवसाद में चली जाती अगर उसका दूसरा लड़का नहीं पैदा हुआ होता… ..
एक और लड़के के लालच में दन्न से दूसरी भी लड़की हो गयी और कहीं तीसरी लड़की भी ना हो जायें इसलिए शगुन ने मायके जाकर ऑपरेशन करवा लिया..
जैसा उनका परिवार था लड़कियों के अट्ठारह पार होते ही दोनों ही लड़कियों का ब्याह कर परिहार परिवार अपने कर्तव्यों से मुक्ति पा गया…
अब सारे रिश्तेदार अखंड के ब्याह पीछे पड़े थे और घर का ये सबसे बड़ा लड़का भीषण प्रतिज्ञा किये बैठा था, जिससे घर भर की औरतें तंग आ चुकी थी..
रोज़ रोज़ की रिश्तेदारों की पुछवायी से तंग आकर बड़े ठाकुर ने यज्ञ के लिए लड़की ढूंढने का ऐलान कर दिया था…
तीनों औरतें बातें करती बैठी थी कि तभी बाहर कहीं जीप आकर रुकने की आवाज़ आई.. और उस आवाज़ को सुन कर शची चौंक गयी..
वो अपने बेटे की गाड़ी की आवाज़ भी पहचानती थी.. तभी घर का पुराना नौकर कलुआ भागता चला आया..
“बड़े भैया आये हैं.. !”
