अपराजिता -10

” चलो बाहर कहीं से घूम कर आते हैं..!”

“लेकिन ऐसे कैसे.. ? मतलब क्या सोचेंगे सब ?”

” कोई कुछ नहीं सोचेगा, क्योंकि किसी को कुछ पता ही नहीं चलेगा। भीड़ भाड़ देख रही हो ना कि तुम्हारे भाई को भी नहीं पता कि उसकी बहन कहां है..?”

” ऐसा नहीं है मानव को पता चल जाएगा कि मैं गायब हूं..!”

” हां तो पता चल ही गया तो क्या बिगड़ेगा?
कौन सा तुम अपने बॉयफ्रेंड के साथ बाहर जा रही हो? पति हूं तुम्हारा, मेरा हक है तुम पर और तुम्हारा भी पूरा हक है मुझ पर..!
चलो ना अकेले में मुझ पर अपना हक जता लेना, अभी कुछ देर पहले जैसे आंखें फाड़ फाड़ कर मुझे देख रही थी वैसे ही देख लेना..।”

“छी… !”

धीरे से फुसफुसाकर रेशम नीचे देखने लगी। उसके होठों की कोर पर मुस्कान आकर अटक गई थी। और अथर्व उसका हाथ पकड़े खड़ा हो गया।
उन दोनों को खड़े होते पूर्वा भी खड़ी हुई, लेकिन अथर्व ने उसे शांत बैठने को कह दिया..

” आपकी सहेली का पान खाने का बहुत मन कर रहा है। मैं बस इसे पान खिला कर ले कर आता हूं। ठीक है? तब तक यहां संभाल लेना। अगर कोई कुछ पूछे तो यह मत बोलना कि रेशम कहीं बाहर गई है..!”

” फिर क्या बोलूंगी जीजू..?”

” हाय जितनी भोली मेरी बीवी है, उतनी ही मासूम साली साहिबा भी है, बोल देना वॉशरूम वगैरा गई होंगी। अपनी साड़ी वाङी ठीक करने ऊपर गई होगी, या हो सकता है लिपस्टिक सही करने गई हो..।”

मुस्कुराकर रेशम का हाथ थामे अथर्व वहां से निकल गया..
रेशम को अथर्व का इस तरह अपना हक जताना बेहद भा रहा था।
वह अजनबी सा उसका सीनियर उसके तन मन पर छाता चला जा रहा था। जितनी उसकी शक्ल लुभावनी थी, उससे कहीं ज्यादा उसकी हरकतें दिल लूट ले जाने वाली थी। पता नहीं कैसे वह इतना सब जानता था, उसे अच्छे से मालूम था कि वह रेशम को कब कैसे छूकर पिघला सकता है।
उस जादूगर की हर एक बात पर रेशम पूरी तरह से वारी जा रही थी…..।

उसे अब जाकर मालूम चल रहा था की एक स्पर्श भी कितना मोहक कितना जानलेवा हो सकता है..।

कार के पास आकर अथर्व ने कार का दरवाज़ा खोल दिया..
रेशम अपनी साड़ी संभाल कर अंदर बैठ गयी..
अथर्व ने उसका पल्लू समेट कर उसकी गोद में रखा और दूसरी तरफ से आकर ड्राइविंग सीट पर बैठ गया…
उसने गाडी तेज़ी से आगे भगा दी…

*****

अपनी ओपीडी में बैठा राजेंद्र दवाओं के स्टॉक रजिस्टर को जाँच रहा था, की तभी वहीं चिर परिचित बुलेट की आवाज उसके कानों में पड़ने लगी।
उसने खिड़की से बाहर की तरफ देखा उसे कुसुम कुमारी नजर आ गई..

कुसुम भावना का हाथ पकड़े अंदर चली आई। सामने ही बैठे बिट्टू पर नजर पड़ते ही उसने डॉक्टर साहब है कि नहीं इशारे से पूछा और बिट्टू ने अपना अंगूठा डॉक्टर के केबिन की तरफ दिखा दिया। कुसुम कुमारी ने सीधे-सीधे केबिन में प्रवेश करने की जगह झांक कर अंदर आने के लिए पूछ लिया..

” हम अंदर आ सकते हैं डाक साब ?”

“हम्म.. आइये.. कैसा है आपका पैर, दिखाइए वापस ड्रेसिंग कर देता हूं। वैसे अब तो सूख गया होगा.. !”

पैर का वह पहला घाव कुसुम कुमारी को बुलेट स्टार्ट करने में लग गया था। तब उसे नहीं मालूम था कि पैर का ये ज़ख्म उसे असल में इश्क़ का दर्द दे जायेगा.. ।

वो घाव काफी हद तक भर चुका था… इसलिए कुसुम कुमारी को लगा कि कहीं यह खड़ूस डॉक्टर उसे वापस आने से मना ना कर दें, इसलिए इस बार वह वापस एक ताजातरीन जख्म बना कर ले गई थी! उसके पैर के जख्मों की जांच करने के बाद राजेंद्र ने उसे दोबारा पट्टी नहीं बांधी..

” अब तो यह लगभग सूख गया है.. इस पर किसी मरहम पट्टी की जरूरत नहीं है!”

“ये है ना.. !”

कहकर कुसुम कुमारी ने अपनी बांह पर बांध रखे रुमाल को खोल दिया। खून बलबलाकर बह निकला, उसे देखते ही राजेंद्र के मुंह से आह निकल गई..

” जी इतना गहरा जख्म कहां से हुआ? यह तो काफी लंबा और गहरा है, इस पर तो टांके लगाने पड़ेंगे..!”

” हां तो लगा दीजिए ना! हमें भी कोई जल्दी नहीं है, और शायद आपको भी जल्दी नहीं होगी घर जाने की..!”

राजेंद्र ने सवालिया नजरों से उसकी तरफ देखा और उसे मरीजों के बैठने वाले स्टूल पर बैठा दिया। तुरंत बिट्टू को आवाज देकर उसने बुलाया और ड्रेसिंग का सारा सामान वहां मंगवाने लगा..

” बहुत गहरी चोट लगवा ली है आपने कुसुम जी.. !”

“ये तो फिर भी नज़र आ रहीं है.. ना नजर आने वाली चोट तो इतनी गहरी है की उस पर कोई मरहम काम नहीं आएगा..।”

कुसुम का फिल्मी डायलॉग सुनकर भावना ने उसे धीरे से कुहनी मार दी। कुसुम भावना की तरफ देखने लगी और भावना ने उसे चुप रहने का इशारा कर दिया..

” उस दिन इंजेक्शन से घबरा रही थी, आज टाँके लगवा पाओगी..?”

कुसुम ने गले से थूक निगली और हाँ में सर हिला दिया..
राजेंद्र वहाँ से उठ कर बिट्टू को साथ लिए दूसरे कमरे में चला गया…

” जहर हो तुम कुसुम कुमारी ! तुम अपने आप को चोट लगवाने से पहले सोची भी थी? कितना गहरा जख्म बना रहीं हो ?  कम से कम नहीं तो छह टांके डालेंगे डॉक्टर साहब इसमें…. क्या करोगी फिर?
इंजेक्शन के नाम पर तो तुम्हारा कलेजा मुंह को निकल आता है, और अपने हाथ से अपने जख्म बनाते समय तुम्हें दर्द नहीं हुआ..?”

भावना ने अपना हाथ अपने माथे पर मार लिया..

” प्यार अंधा होता है यह सुना था हमने,  लेकिन इतना नॉनसेंस होता है, यह नहीं मालूम था !”

” अब तुम बकना बंद करोगी..! इतना दर्द हमको जख्म में नहीं हो रहा है,उससे ज्यादा तुम्हारी जली हुई बातों से हो रहा है, समझी.. !”

भावना उसे घूर कर कुछ बोलने जा रही थी कि राजेंद्र हाथ में इंजेक्शन लिए वहां दाखिल हो गया। उसके पीछे ही बिट्टू बाकी सारे सामान के साथ चला आया। इंजेक्शन देखकर एक बार फिर कुसुम घबराने लगी…
और उसी समय भावना के मोबाइल पर उसकी मां का फोन आने लगा। भावना ने राजेंद्र की तरफ देखा और राजेंद्र ने उसे फोन उठाने का इशारा कर दिया। भावना अपना फोन उठाएं बात करती हुई कमरे से बाहर चली गई। और राजेंद्र ने इंजेक्शन को भरकर सामने बैठे कुसुम की आंखों में देखा…
कुसुम के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थी…
राजेंद्र ने बिट्टू की लाई हुई स्पंज बॉल कुसुम के दूसरी हथेली में पकड़ा दी…

“इस बॉल को दबाते रहना तो तुम्हें डर नहीं लगेगा! आंखें बंद कर लो.. !”

कुसुम ने आंखें बंद कर ली राजेंद्र जैसे ही इंजेक्शन लगाने जा रहा था कि कुसुम बॉल फेंककर चीख उठी..

राजेंद्र उसे घूर कर देखने लगा..

” मुझसे नहीं हो पाएगा, तुम ऐसा करो, शहर के अस्पताल में चली जाओ !”

“नहीं…. अब हम नहीं चीखेंगे…. विद्या कसम !”

राजेंद्र ने एक गहरी सी सांस ली और इंजेक्शन का एयर बबल निकालकर उसे वापस कुसुम की तरफ घुमा दिया। कुसुम ने राजेंद्र की कमीज पकड़ ली। राजेंद्र ने धीरे से उसकी बाँह में निश्चेतक का हल्का सा डोज़ डाल कर पेन से गोल घेरा बना दिया.. उस ज़रा सी घड़ी में कुसुम चीख पड़ी..
लगभग पांच मिनट बाद राजेंद्र ने कुसुम की बाँह का वो हिस्सा अपनी उँगलियों से सहला दिया..
वो असल में देख रहा था उस जगह पर कहीं कोई एलर्जी तो नहीं हुई है। जब उसने देखा कि निश्चेतक का कोई बुरा असर कुसुम पर नहीं पड़ रहा तब उसने बाकी का इंजेक्शन भी लगा दिया..
अपनी रुलाई रोकने के लिए कुसुम ने अपने दूसरे हाथ से राजेंद्र की बाँह को कसकर पकड़ रखा था…

राजेंद्र ने निश्चेतक देने के बाद उस घाव को साफ किया और उस पर टाँके लगाने लगा ।
एक के बाद एक उसने सारी सिलाई पूरी की और उसके बाद उस जगह को फिर से साफ करके उस पर दवा लगा दी। दवा लगाने के बाद ऊपर से रुई लगाकर उसने स्टिकर चिपका दिया…।

इतनी देर में कुसुम का रो रो कर बुरा हाल हो गया था भावना भी फोन पर बात खत्म करके आ कर चुपचाप पीछे खड़ी थी। कुसुम की मरहम पट्टी खत्म हुई और राजेंद्र ने सारा सामान एक तरफ रख दिया। इसके बाद उसने धीरे से कुसुम का हाथ अपनी बांह पर से हटाया और उसे आंखें खोलने को कह दिया। डर की वजह से कुसुम ने अपनी आंखें बंद रखी थी, लेकिन उसके आंसू बहते चले जा रहे थे…।

” ए कुसुम आंखें खोल लो.. हो गई तुम्हारी मरहम पट्टी!”

भावना ने उसे झिंझोड़ा और कुसुम ने आंखें खोल दी..।
उसने अपनी बाँह देखी और भावना से चिपक कर रो पड़ी..
भावना उसके बालों पर हाथ फेरती खड़ी रहीं..

“कुसुम… !”

भावना ने आवाज़ लगायी..

“हम्म !”  कुसुम ने कष्ट से कहा..

“डॉक्टर साब का ख़ून निकाल दिया तुमने !”

“हैं…. ?”

चौंक कर कुसुम भावना को देखने लगी..
भावना ने राजेंद्र की बाँह की तरफ इशारा कर दिया..
कुसुम का काम निपटा कर राजेंद्र अब अपनी बाँह पर दवा लगा रहा था…

कुसुम ने जिस वक्त राजेंद्र का हाथ ज़ोर से पकड़ रखा था उस वक्त अपने दर्द से लड़ती कुसुम ने अपने तेज़ नाखूनों से राजेंद्र की बाँह नोच ली थी..
उसने नाख़ून इतनी ज़ोर से गड़ा दिये थे कि बाँह पर ख़ून छलक आया था…

राजेंद्र उसे साफ़ कर रहा था..

” हा… ये क्या हो गया.. ? माफ कर दीजिए डाक साब… हमें होश ही नहीं रहा कि…

कुसुम अपनी बात कहते कहते चुप हो गई तभी अचानक उसे कुछ याद आया और उसने अपने पर्स में से एक डिब्बा निकाल कर राजेंद्र के सामने खोल दिया..

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Maya
Maya
2 years ago

Nice story

Shruti jindal
Shruti jindal
2 years ago
Reply to  Maya

nice story

Duhanmukesh
2 years ago

Nice ji

Rameshwar Dhiwar
Rameshwar Dhiwar
2 years ago

madam aap pratilip ko chhot kar aapne site pe likhna chalu kar diya nice

Aparna Mishra
2 years ago

जी ब्लॉग पर काम शुरू जार दिया हैं.. कोशिश हैं सोमवार से कहानियों के भाग ब्लॉग पर देने शुरू कर दूँ..