पुरुष के मन मस्तिष्क
शब्द हृदय
हर जगह छाई हो।
ओ स्त्री!!!
तुम कहाँ से आई हो?
वो कहता है
मैंने तुझे पंख दिए।
परवाज़ दिए
उड़ लो, जितना मैं चाहूं
ओ स्त्री !!!
क्या तुम उसकी मोहताज हो?
उसका घरौंदा बनाया
तिनका तिनका सजाया
पर जब वक्त आया तुम्हारा
उसने तुम्हें
अपने पैरों पे गिराया
ओ स्त्री!!!
तुम कैसे उसकी सरताज हो?
वो बेबाक है बिंदास है
जो जी में आये
करने को आज़ाद है
कूबत तो तुम्हारी भी है
फिर
ओ स्त्री!!!
तुम क्यों हर मर्तबा
झुकने को तैयार हो?
कभी ये ना पहनो
का अधिकार
कभी ऐसे न बोलो
का अहंकार
पर हर दफा उसकी
सुन कर चुप
रह जाने वाली
ओ स्त्री!!!
तुम खुद में एक अंगार हो
क्यों जानती नही,
तुम खुद को मानती नही
वो ‘मैं’ में अड़ा रहता है,
क्यों पहचानती नही?
तुम खुद को घोल घोल
ज़िन्दगी को पी गयी
ओ स्त्री !!!
तुम स्वयं एक संसार हो…
To be continued …..
आप सब चाहें तो मेरी इस रचना को अपने शब्दों से सजा कर आगे बढ़ा सकतें हैं…. ” ओ स्त्री!!”
बिंदास लिखिए
बेबाक लिखिए..
क्योंकि..
कलम को जितना चला लो ये शिकायत नही करती…
aparna…

[…] ओ स्त्री!!! […]
बहुत सुंदर जी
एक ही पंक्ति में कहना चाहूंगी अपर्णा जी, क्योंकि वो स्त्री है।
ये पुरूषों के “मैं” का वर्चस्व बनाये रखने को ही शायद स्त्री को “हम” बनके जीना पड़ता है, और जो इस लकीर से आगे निकलने की कोसिस करती है उन्हें न जाने कितने उपमाओं से बांधने की कोशिश की जाती है
🙏🙏🙏👍👍👍👍
बिल्कुल सही स्त्री अगर चाहे तो कुछ भी कर सकती है पर घर-परिवार की शांति के लिए हमेशा चुप रह जाती है
❣️❣️