रोज़ी …by अमृता प्रीतम जी

नीले आसमान के कोने में
रात-मिल का साइरन बोलता है
चाँद की चिमनी में से
सफ़ेद गाढ़ा धुआँ उठता है

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सपने – जैसे कई भट्टियाँ हैं
हर भट्टी में आग झोंकता हुआ
मेरा इश्क़ मज़दूरी करता है

तेरा मिलना ऐसे होता है
जैसे कोई हथेली पर
एक वक़्त की रोजी रख दे।

जो ख़ाली हँडिया भरता है
राँध-पकाकर अन्न परसकर
वही हाँडी उलटा रखता है

बची आँच पर हाथ सेकता है
घड़ी पहर को सुस्ता लेता है
और खुदा का शुक्र मनाता है।

रात-मिल का साइरन बोलता है
चाँद की चिमनी में से
धुआँ इस उम्मीद पर निकलता है

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जन्मदिन मुबारक अमृता प्रीतम जी!!

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Duhanmukesh
4 years ago

बहुत सुंदर

Duhanmukesh
4 years ago

बहुत सुंदर जी

Anamika#komal
Anamika#komal
4 years ago

👌👌👌

Seema Kwatra
Seema Kwatra
4 years ago

बहुत बढ़िया 👏👌

Mokshdaaggrawal
Mokshdaaggrawal
4 years ago

बेहतरीन 👌👌👌👌