संस्कारी बहु

      संस्कारी बहू–

अटारी  आस पास के सभी गावों मे सबसे बड़ा गांव माना जाता है,जैसा ही भरा पूरा गांव,वैसे ही भले लोग यहाँ रहते हैं ।
      ज्यादातर घरों के बच्चे पढ़ने लिखने लखनऊ,या कानपुर ही जाते हैं,और जो चिरैय्या एक बार घोंसले से उडी वो फिर नही लौटती।।

     दीनदयाल बाजपाई जी का बड़ा नाम हैं,गांव मे। नाम होने लायक सज्जन हैं भी वो….उनकी श्रीमती कमला और उन्होनें बड़ी खूबसूरती से अपनी गृहस्थी सजाई है।
      
             गांव भर की औरतें सामने तारीफ करती नही थकती,और पीठ पीछे जल भुन के कोयला होती रहतीं हैं ,कारण भी है….उनके 4सुशील पुत्र और 4संस्कारी पुत्रवधुएं ।।
          आज के युग मे  सुशील पुत्र मिलना तो फिर भी आसान है,पर संस्कारी बहू मिलना….
       कोई कोई औरत तो दिल मे बड़ा सा पत्थर रख के कई बार बोल भी चुकी “हाय कमला बहन ,कितने पुण्य किये हैं जी तुमने,एक बहू भी ऐसी नही की कोई उंगली उठा दे।”
 
     “सारी की सारी अभी इस जमाने मे भी देखो सर पे पल्लू रखे साडी मे ही सरसराती रहती हैं ।एक हमारी आई की शादी की दुजी सुबह ही अन्ग्रेज मेमो सा गाऊन पहने रसोई मे आ धमकी….. कहती है मम्मी जी इनकी चाय दे दो।”

  “अब मैं क्या बोलूं,बहुयें तो सच मेरी खरा सोना हैं,पर सच्ची बात बोलू ,सब कुछ बेटे पे रहता है,हमने तो भाई बचपन से ही चारों को ये बात भले से समझा दी थी की संस्कार बहुत ज़रूरी है बेटा।”
     “अब जब बेटा ही राजी ना होगा तो बहू को मानना ही पड़ेगा ना।””वैसे भी इन सब मे रखा क्या है।”

     ‘सही कह रही कमला,अब मेरी वाली तो विदेश जा बसी है,पिछली छुट्टियों मे मै गई थी,महीना भर के लिये,एक दिन कपड़े तह किये और बहू को दिये की पोते की पैंट को रख ले,तो वो हंस पड़ी,बोलती है ,अरे मम्मी जी ये हाफ पैंट तो मेरी है।”

     पूरी महिला गोष्ठी खिलखिला के हंस पड़ी।।

    अटारी मे सारे आमोद उत्सव साथ ही मनाये जाते,लगभग सभी बाम्हण परिवार ही थे,इक्का दुक्का लाला भी थे ।।
     
      अबकी बार फाग की धूम थी,बाजपेयी जी के आंगन ही सारा आयोजन था,चारो दशरथ नन्दन इधर से उधर भागते सारा काम धाम देख रहे थे,आंगन खचाखच भरा था,,एक तरफ खाने पीने का आयोजन,दुसरी तरफ रंग गुलाल ।।

        कुल मिलाकर पूरा माहौल अबीरी हो गया था,शाम को फागोत्सव हुआ,,खूब गाना बजाना हुआ,,महिलायें भी एक आध कविता पाठ कर लेती थी।   कमला जी की बड़ी बहू यामिनी को पढ़ने लिखने का खूब शौक था,कुछ कभी लिख भी लेती थी,उसे बड़े इसरार से उसकी सास ने बुलाया,बहुत धीमे से अपना घूंघट संभालती वो आई ,पायल की रूनझुन सुनाती ,,हाथ भर चूडियां बजाती आई और एकदम ही हल्के हाथों से अपने पति से माईक लिया और माँ सरस्वती पे लिखी अपनी कविता सुना दी।

     तालियों की गूँज से आसमान फटने लगा,दीनदयाल जी के कन्धे कुछ और तन गये,कमला जी भी सगर्व मुस्कुराने लगी,और यमिनी के पति का तो पूछो मत।।

     होली के दूसरे दिन सभी बच्चे लखनऊ कानपुर लखीमपुर लौट गये।

       यामिनि के बेटे का इसी वर्ष स्कूल मे प्रवेश हुआ है,,लखनऊ के सिटी मोन्टेसरी मे नही भाई एक दूसरे कॉन्वेन्ट में ।

      सुबह सुबह 7 बजे बच्चे को स्कूल पहुचाने माता पिता  दोनो भागे भागे गये…..प्रथम दिवस…. प्रथम प्रयास ….प्रथम अनुभव….प्रथम तो प्रथम ही होता है,,एक ही बार आता है,,इसी से देर ना हो जाये ऐसा सोच के यामिनी ने कुर्ता पहनने मे भी अपना अमुल्य समय नष्ट नही किया।

        बच्चे को खूब लाड़ लड़ा के चूम चाट के माँ ने मदर के हवाले किया ,,और भारी मन से कार मे आ बैठी ,पतिदेव ने कार चलाते हुए पेशकश रखी की कही रास्ते मे ही रुक के नाश्ता कर लिया जाये,क्योंकि घर पहुंच के नाश्ता बनाने खाने मे ऑफ़िस के लिये देरी की सम्भावना है।

        दोनो रास्ते के किनारे पे खड़ी गुमडी अर्थात ठेले पे रुक गये,पतिदेव ने दो प्लेट दोसा बोला लाने को…..यामिनि ने खाने से मना किया कहा पैक करवा लो मै घर जाके ही खाऊंगी ।
           पतिदेव दोसे के स्वाद मे डूबे खाने लगे ,तभी यामिनि के पीछे किसी को आते देख उन्होने बड़ी शालीनता से नमस्ते की……..यामिनी ने पीछे मुड के देखा और धक!
        वही गांव वाली पड़ोसन बुआ जी अपनी बिटिया के साथ उन्ही की तरफ बड़ी तेज रफ्तार से दौडी चली आ रही थी…..
          यामिनी को काटो तो खून नही…….गौतम कुल गोत्रोत्पन्ना सरयूपारिण पण्डित श्रीपति शुक्ला की कन्या ,बीस बीसवा कान्यकुब्ज सर्वश्रेष्ठ सर्वोत्कृष्ट श्री बाजपेयी की सबसे बड़ी कुलवधू सरेआम लखनऊ की सड़क पे जीन्स और टी शर्ट पहने एक ठेले पे खड़ी थी।

        यामिनी को लग रहा था,,हे धरती मैय्या जैसे वैदेही के लिये फट पड़ी वैसे ही आज मुझे भी अपनी गोद मे समा लो !!,
             हे सूर्य देवता !कुछ देर को कही जाके छिप जाओ ,थोड़ा अन्धेरा ही कर दो की मै भाग सकूं ।

        पर सिर्फ सोच लेने से ही समाधान नही होते ,ना धरती फटती है ना सूर्य चमकना छोड़ देता है।
        बुआ जी पास आई,यामिनी को नीचे से ऊपर फिर ऊपर से नीचे देखा,पूरी नज़र से देखा,जी भर के देखा और बोली
           “अरे हम तो कार्तिक को पहचान के यहाँ आई,ये बोलने की घर चलो ,हमारी रत्ना का घर यही तो पीछे है बेटा।”

      “अरे नही नही बुआ जी ,,मुझे तो बस ऑफ़िस के लिये देर हो रही थी,तो सोचा यही खा लूं ।”
    “आज अथर्व का स्कूल का पहला दिन था ना ,तो उसे छोडने गया था,बस वही से लौट रहा।”

      यामिनी को समझ आ गया था ,जेलर की पकड़ तेज़ है,रिहाई मुश्किल है,उसने बुआ जी के पैर छुए और रत्ना जिज्जी के भी।
    “अरे भाभी तुम हो,हमे तो लगा भईय्या जाने किसके साथ खड़े बतिया रहें हैं ।”

      यामिनी और कार्तिक बड़ी ही कठिनाई से मुस्कुरा पाये,दोनों माँ बेटी बड़ी देर तक निरर्थक बातें बनाती रही और आंखों ही आंखों में संस्कारी बहू को पीती रही।
       “देखा माँ,ना तो हाथों मे चूडियां थी ना मंगल सूत्र,अरे ठीक है जीन्स पहनी तो क्या बिन्दी भी ना लगायेंगी,,ना बिन्दी ना सिन्दूर….इन्हें देख किसी को समझ भी आयेगा की शादीशुदा ,बाल बच्चे वाली है। ….”
        
        और इधर कार मे घर वापस होते हुए दोनो पति पत्नी का अलग ही राग छिड़ा हुआ था।बेचारी यामिनी मुहँ लटकाये बैठी थी,और कार्तिक का हंस हंस के बुरा हाल था…
          “वो तो अच्छा हुआ यामिनी तुमने खाने से मना कर दिया ,वर्ना सोचो इतनी संस्कारी बहू इतने सारे मर्दों के बीच जीन्स पहनी ठेले पे खड़े होके खा रही …..कितना अजूबा हो जाता ,नहीं …..”
   कार्तिक ने फिर एक ज़ोर का ठहाका लगाया और गाड़ी आगे बढा दी।।
       

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वैष्णवी प्रभा

“हाफ पैंट मेरी है” हाहाहा😂एब्रोड में सब कम्फर्ट के हिसाब से ही कपड़े पहनते है, जो सही भी है।
ये व्यंग्य बहुत मजेदार था मैम😂गांव की औरतें अगर संस्कार की बात करे तो उनका मतलब कपड़ों से ही होता है😅
बेचारी यामिनी, बहुत बुरी फंसी। उसपर आपका बखान, सरयूपरिण की कन्या, कान्यकुब्ज की बड़ी बहू😁
आगे क्या होगा, जब ये बात वाजपेयी जी को मालूम चलेगी😅

Ghimire Diksha
Ghimire Diksha
4 years ago

Bahot Mushkil se dhundh paayi mam 🙄but achha laga thanks God aap mil gayi mujhe 🤩🤩🤩

yugjyotika
yugjyotika
4 years ago

बहुत ही बेहतरीन। मेरे साथ भी ऐसा हुआ था एक बार । ननदोई जी एक बार बिना बताए घर पहुँच गए मैं उस टाइम lower टीशर्ट में थी peep hole से झांक कर देखा। पतिदेव भी घर पर नही थे समझ नही आ रहा था दरवाजा खोलू या नही??

Advsarika
Advsarika
4 years ago

Bilkul satya h… Sab in laws aisa hi chahte h. Are bhai kya ghunghat lene se sanskaar dikhte h? Yamini ne sadak pr khade hokr pair chuye kya ye usk sanskaar ni the.. Pr logo ko to bs point pakadna h … Aur samay k sath parivartan jaruri h.. Ab jahan in laws rahte to kya office aur school bhi ghunghat krk jayegi….. Sanskar kapdo se ni karmo me dikhte h…

Sarita Saini
Sarita Saini
4 years ago

😂😂😂😂😂bahar rah Kr ye hi hota hai…. village me ja Kr ure sanskar nibate hai …or city me SB jaldi me hote hai….Sahi hai sanskar BHI jaroori hai….badi k samne izzt BNI rahti hai….

Anjana Solanki
Anjana Solanki
4 years ago

😅😅😅😅😅😅

Seema Kwatra
Seema Kwatra
4 years ago

Wah

Amit Singh
Amit Singh
4 years ago

😂🤣😂

Rashmi Nigam
Rashmi Nigam
4 years ago

Pritilipi par pahle padh chuki this phir bhi poor I pafhe Nina raha nhi gya bahut hansi AAJ bhi pahle ki tarah hi ..

Manu Bajpai
Manu Bajpai
4 years ago

😄😄😄, samidha padhne ke baad isne muskan la hi di. Bajpain ke ghar ab gosthi hogi😉😁 aur kartik ji abhi jo daant dikha rhe h, maa ke samne bolti bnd ho jayegi.🤣