मासूम मुहब्बत ….
ऐनक की…..
आज का टॉपिक मासूम देख कर मुझे मेरी बचपन की मासूम मुहब्बत याद आ गयी…
बड़ी अजीब सी मुहब्बत थी ये … चश्मों की मुहब्बत…
कॉलेज सेकंड ईयर में पहुंचते ही हम सब एकदम से सीनियर्स बन गए, और कॉलेज में आई जूनियर्स की बहार…
एक सतर पंक्ति में सर झुकाये चलती फर्स्ट ईयर की लड़कियों में चौथे या पांचवे नम्बर पर उसे देखा मैंने…
सुंदर सी मासूम सी लड़की और उसकी छोटी सी नाक पर टिका ब्लैक प्लास्टिक फ्रेम का बड़ा सा चश्मा..
पर सच कहूँ तो ये समझना मुश्किल था कि चश्मा लगा कर वो ज्यादा खूबसूरत लगने लगी या उसके लगाने से चश्मा सुंदर हो गया..
मेरी एक दोस्त ने कहा भी” हाय कितनी सुंदर है और अभी से चश्मा चढ़ गया”
” अच्छी तो लग रही है। और चश्मा तो सुपर है। “
मेरी दोस्त ने मुझे अजीब नज़रों से घूर कर देखा…
और मुझे मेरे बचपन का पागलपन यानी चश्मे से प्यार याद आ गया…
घर पर कोई भी मेहमान आये मैं उनका टेबल पर रखा चश्मा चुपके से ले उड़ती…….
फिर अपने कमरे में वो चश्मा अपनी नाक पर चढ़ाये आड़े तिरछे मुहँ बना कर खुश होती रहती…
मेहमानों के जाने के पहले चुपके से वापस चश्मा रख आती…
जिन्हें चश्मा लगा होता उनके लिए मन में एक अलग सा सम्मान पैदा हो जाता, यूँ लगता इनसे सिंसियर कोई हो ही नही सकता।
घर पर मम्मी पापा दोनो को चश्मा लगा था…शायद इसलिए चश्मे के लिए आदर भाव था…
स्कूल में पसंदीदा टीचर भी चश्मे पहनते थे, पर लाख कोशिशों के बावजूद मुझे चश्मा नही लग पा रहा था।
मम्मी अक्सर कहतीं “मोनी रात में लैम्प जला कर मत पढ़ा करो बेटा चश्मा लग जाएगा और मैं सोचती काश लग जाये…
पापा अक्सर सुबह सूरज की रोशनी में पढ़ने की सलाह देते…आंखों की ज्योति बढ़ती है सुबह उगते सूर्य के दर्शन करो, आंखों में पानी के छींटे डाला करो, सुबह सवेरे नंगे पैर गीली घास पर चलो, ओस से पैर भीगते हैं तो आंखों की रोशनी बढ़ती है।
और मैं सोचती क्या पैर के तलुओं से ओस आंखों तक पहुंच पाएगी( इस बात पर भरोसा करना मुश्किल होता) लेकिन पापा ने कहा है तो कोई लॉजिक तो होगा इसलिए इस बात को पूरी तरह नकारा भी नही जा सकता था..
यही सोच कर पापा के नेत्र ज्योति बढ़ाने वाले कोई उपाय नही करती, मुझे चश्मा जो चाहिए था…
पर लगातार पढ़ने, टीवी देखने के बावजूद मुझे चश्मा नही लगा…
लेकिन मेरी बहुत प्यारी सहेली को चश्मा लग गया और उस रात मैं फुट फुट कर रोई…
तब तक शाहरुख खान ने बताया नही था कि जिस चीज़ को शिद्दत से चाहो कायनात उसे आपसे मिलने…. वगैरह वाला डायलॉग..
पर कुछ दिनों बाद एक चमत्कार हुआ…
, उस वक्त बारहवीं जमात में थी, शायद पढ़ाई या मेडिकल एंट्रेंस का टेंशन था। हफ्ते भर से सर का दर्द जाने का नाम नही ले रहा था…
आखिर पापा डॉक्टर के पास ले गए… आंखों की जांच हुई और डॉक्टर ने पापा को अगले दिन अकेले बुला लिया…
डॉक्टर से मिल कर पापा वापस आये और मुझे अपने पास बुला कर बिठा लिया, प्यार से सर पर हाथ फेरते मुझे समझाने लगे…
” बेटा परेशान होने की बिल्कुल ज़रूरत नही है!”
मैं घबरा गई,लगा अभी तो एंट्रेंस दिया भी नही रिज़ल्ट भी आ गया…
पापा फिर धीरे से आगे बढ़े, पापा को बहुत धीमी गति से बोलने की आदत है और उनकी स्पीड पर मैं कई बार इमपेशेंट हो जाती हूँ……
” देखो बेटा डॉक्टर ने कहा है….
मेरा दिल शताब्दी से होड़ लगाने लगा, मुझे एक पल को लगा मुझे ब्रेन ट्यूमर तो नही हो गया जो पापा इतनी भूमिका बांन्ध रहे।
मुझे ब्रेन ट्यूमर से ज्यादा चिंता ट्रीटमेंट के लिए मुंडाए जाने वाले बालों की होने लगी कि पापा ने बात आगे बढ़ाई…
” डॉक्टर का कहना है लगातार लगाओगी तो एनक उतर जाएगी।”
हाय! बस अब और कुछ नही चाहिए उस ऊपर वाले से। उसने मेरी झोली चश्मे से जो भर दी….
इधर मेरी खुशी सम्भल नही रही थी, उधर पापा की समझाइश खत्म नही हो रही थी……
फ़ायनली वो ऐतिहासिक दिन मेरे जीवन में भी आ गया जब मैं अपने शहर के सबसे बड़े चश्मे के शो रूम में खड़ी थी। चारो तरफ चश्मे ही चश्में देख कर मेरे चेहरे की मुस्कान जा नही रही थी और मुझे मुस्कुरातें देख पापा के चेहरे पर राहत थी…
हालांकि इतने शौक से बनवाया मेरा पहला सुनहरी फ्रेम का पतला सा चश्मा सिर्फ छै महीनों में उतर गया…
मैं तो उतारना नही चाहती थी पर पापा की ज़िद थी आंखे चेक करवाओ…
और एक बार फिर मेरा दिल हार गया और आंखें जीत गयी..
और मेरी मासूम मुहब्बत मेरा चश्मा जाने कहाँ खो गया….
कभी कभी कुछ बेमतलब की बातें कुछ बेखयाली खयाल भी लिख लेने चाहिए….
बस ऐसे ही लिख दिया… कुछ बेसर पैर का…
aparna


सचमुच बहुत प्यारा होता है बचपन👏👏👏🌹🌹🌹🌹🌹
बहुत अच्छा लगा दीदी…यहाँ पढ़कर भी…बहुत अच्छा सफ़र यूँ ही चलता रहे…😊🙏
हार्दिक आभार भाई