संविधान

” मैं नही खाती नॉनवेज !! मुझे पसंद नही।”

” जब कभी खाया ही नही तो कैसे पता कि पसंद नही आयेगा।”
   कुछ देर सोच कर मैने कहा__

” हिंदू हूँ,पंडिताईंन!! मेरे धर्म में  नही खाते ,इसिलिए नही खाती, समझे!!”

  अपनी ज्ञान भरी बात पर मैं इठला गयी,पर तभी उसने कुछ ऐसा कहा कि एक ग्लेशियर पिघल गया, एक पतझर झर गया और एक सावन बह गया ….

” मैं भी नही खाता,इसलिये नही क्योंकि मेरा धर्म कहता है मत खा! मै इसलिये नही खाता क्योंकि मैं किसी जीव को अपने मुहँ के स्वाद के लिये मार नही सकता…सिर्फ कुछ एक मांस पेशियों की मज़बूती के नाम पर एक लाश पका कर नही खा सकता,,मैं नही खा सकता क्योंकि मैं मानवता को सर्वोपरी मानता हूँ, वही है मेरा धर्म, मानव धर्म!!

   ये मेरे जीवन का संविधान लिखा था उसने ,जिसके बाद मैं उसकी हो गयी,, और हमेशा हमेशा के लिये मेरी स्वतंत्रता छिन गयी….
       उसके बंधन जो बंध गयी थी।।

aparna…

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इंदु कपूर
इंदु कपूर
1 year ago

वाह क्या खूब लिखा।

जो किसी प्राणी की हत्या नहीं कर सकता वो अपने प्यार को कितनी नजाकत से रखेगा ।

प्रीतिका
प्रीतिका
4 years ago

बेहद खूबसूरती से जवाब दिया गया जो वास्तविकता दर्शाता है। बहुत उम्दा।👌👌👏👏🙏🙏