
मायानगरी -19
भुवन जानता था कि लीना अपने काम के प्रति बहुत समर्पित और ईमानदार है..।
हर एक इंसान किसी दूसरे को अपने खुद के चश्मे से देखता है यही लीना की समस्या थी।
वह खुद ईमानदार थी, और उसे लगता था पूरा सिस्टम उसी की तरह है। जबकि सिस्टम में कई खामियां मौजूद थी। भुवन इन बातों को समझता था, और इसलिए वह नहीं चाहता था कि लीना सीधे तौर पर इन लोगों से उलझे, लेकिन वह यह भी जानता था कि लीना जैसी जिद्दी लड़की को समझाना खुद अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा था।
“क्या हुआ भुवन साहब, आपको डर लग रहा है?”
” नहीं! हमें खुद के लिए कभी डर नहीं लगता। लेकिन आप लड़की हैं, अकेली रहती हैं।”
” लड़की हूं, और अकेली रहती हूं, इसलिए कोई मेरा कुछ बिगाड़ लेगा,ऐसा नही है।
मैं लड़की हूं, लेकिन साथ ही पुलिस वाली हूं।
इस बात को क्यों भूल जाते हैं आप?”
” नहीं इस बात को नहीं भूलता, लेकिन यह बात भी हमें मालूम है कि पुलिस विभाग में भी हर कोई आपके जितना ईमानदार नहीं है। कहीं इस केस के कारण जो आग आपके विभाग और प्रशासन में लगेगी, उसकी लपटे आपको ना घेर ले।”
” भुवन जी मेरी इतनी चिंता करने के लिए धन्यवाद, लेकिन मैं भी जानती हूं कि इन लोगों से कैसे निपटना है…. ।”
लीना ने वारंट इश्यू करवाने के लिए अपने मातहत को भेज ही दिया था।
भुवन जानता था कि अब लीना को रोकना असंभव है। लीना से इजाजत लेकर वह अपने घर चला गया।
रास्ते भर उसके दिमाग में यह बात चलती रही कि वह कैसे लीना को इस सारे झमेले से दूर रख सकता है। और आखिर उसके दिमाग में एक आईडिया आ ही गया।
वह घर पहुंच कर सीधा अपने ताऊ जी के ऑफिस में दाखिल हो गया। उसके ताऊजी उस वक्त अपने पीए के साथ कुछ जरूरी बात पर चर्चा कर रहे थे। वहाँ कुछ दो चार लोग और भी बैठे थे !
” ताऊजी हमें आपसे कुछ जरूरी बात करनी थी।”
” हां भुवन बोलो।”
भुवन अपने ताऊजी के ठीक सामने चला आया।
“ताऊजी दरअसल हम आपको कुछ बताना चाहते थे।”
” हां हां, सब कुछ बताओ, बैठो।”
भुवन ने एक नजर अपने ताऊजी के पीए पर डाली, और वापस उन्हें देखते हुए बताने लगा।
” ताऊजी सज्जन राणा की मौत जिन परिस्थितियों में हुई है, उसके बाद पुलिस विभाग को लगता है कि यह एक सामान्य और साधारण मौत नहीं है। बल्कि उन्हें किसी ने षड्यंत्र के तहत मारा गया है ! मतलब उनकी हत्या करवाई गई है!
हमारी एक दोस्त हैं आईपीएस लीना, वह इस केस की छानबीन कर रही है, और उनकी छानबीन से उन्हें जो सबूत और तथ्य मिले हैं, उसके आधार पर वह सज्जन राणा के दोनों बेटों और अमर कुमार इन तीनों के नाम पर वारंट इशू करवा रही है। उसके बाद वह इन तीनों को थाने ले जाकर इन पर केस करने की तैयारी में है।”
यह सब सुनकर भुवन के सामने बैठे ताऊ जी के माथे पर हल्की सी चिंता की लकीरें नजर आने लगी।
” तो इसमें हम क्या कर सकते हैं?”
” ताऊजी, सज्जन राणा भले ही आज जीवित न हो, लेकिन वह एक प्रसिद्ध मंत्री थे, उनका अपना तगड़ा फैन बेस है, उनके कार्यकर्ता कभी भी यह नहीं चाहेगे कि उनका पारिवारिक विवाद इस तरह लोगों के सामने आए।
इसके अलावा चरित्र और सुमित्र उनके दोनों ही बेटे प्रशासनिक अधिकारी हैं। अमर कुमार खुद एक ऊंचा नाम है। ऐसे में इन लोगों को जेल में डालने से कहीं लीना के ऊपर कोई आंच ना आए।
हम सोच रहे थे कि अगर आपका हाथ लीना को सपोर्ट करने के लिए उठ जाता, तो वह जरा सुरक्षित हो सकती थी।”
सबरवाल जी कुछ सोचते हुए इधर-उधर देखने लगे..
” देखो भुवन तुम्हारी वह दोस्त खुद आईपीएस अधिकारी है, और यह सभी उनके कभी ना कभी रह चुके सहकर्मी है।
ऐसे में अपनी विभाग के लोगों को सिर्फ शक की बिनाह पर अगर वह जेल दाखिल करने का संकल्प ले रही है, तो यह गलत है।
उसे पहले पूरी छानबीन कर लेनी चाहिए। उसके बाद ही उसे किसी पर हाथ डालना चाहिए। अगर वह बिना पूरी छानबीन के ऐसा करेगी, तब ये उसके लिए गलत साबित हो सकता है।”
“हम उसे यह बात समझा चुकें हैं ताऊजी, और इसलिए हम चाहते हैं कि आप इस मामले को देख लेते।
“भुवन हम इस केस में इंवॉल्व नहीं हो सकते।
हमारी नजर में तो यह एक स्वाभाविक मौत थी, क्योंकि सज्जन राणा उस वक्त शराब के नशे में गाड़ी चला रहे थे।”
” आप सही कह रहे हैं ताऊजी, लेकिन लीना इस बात को मानने को तैयार नहीं है। और कहीं ना कहीं हम भी जानते हैं कि सज्जन राणा का एक्सीडेंट स्वाभाविक नहीं था। वह कितने भी नशे में हो, लेकिन उनका अपनी गाड़ी पर कंट्रोल कभी नहीं हटता था। इतना तो हम भी जानते हैं, और हमें पता है कि उनका मर्डर करवाया गया है। लेकिन कोई बात नहीं अगर आप हमारा साथ नहीं देना चाहते, तो कोई बात नहीं ।”
भुवन पलटा और वहां से बाहर निकलने आगे बढ़ गया लगा और तभी उसके ताऊ जी ने उसे आवाज लगा दी..
“तुम गलत समझ रहे हो भुवन, हम तुम्हारा साथ देना चाहते हैं, लेकिन हम ऐसे किसी आईपीएस अधिकारी को रोक टोक नहीं सकते, और हमारी मानो तो तुम भी इन मामलो में पीछे ही रहो !”
भुवन ने रुक कर अपने ताऊजी पर एक नजर डाली और बाहर की तरफ निकल गया.. ।
“कोई बात नहीं ताऊजी,वो हमारी दोस्त है और इसलिये हम उसकी मदद तो कर के रहेंगे !”
भुवन शांति से बाहर निकल गया और सबरवाल जी का पीए चिंतित सा सबरवाल जी के सामने चला आया..
“ये तो गलत हो गया सर..।”
सबरवाल जी ने जाते हुए भुवन पर से नजर हटा कर अपने पीए राजशेखर की तरफ देखा..
“क्या गलत हो गया शेखर ?”
“चरित्र को आप पार्टी टिकिट देना चाह रहे थे, और अब उसे पुलिस में फंसना पड़ रहा है, अब क्या होगा ?”
“तुम बताओ क्या होगा ?” मुस्कुरा कर सबरवाल ने राजशेखर की तरफ देखा
“सर अगर चरित्र इस सब में फंस गया तब तो उसका खूब नाम खराब होगा, ऐसे में क्या पार्टी के और लोग उसे टिकट देने देंगे.. ?
और फिर मान लिया कि आपके डर से किसी ने कुछ नहीं भी बोला, लेकिन तब भी अगर टिकट मिलने के बाद जानता में उसके प्रति व्याप्त रोष के कारण वो हार गया, तो हमारा तो एक टिकट बर्बाद ही हो गया न..।”
“हम्म, तो अब क्या करना चाहिए.. ?”
“मेरे ख्याल से उसका नाम टिकट की दावेदारी से हटा देना चाहिए।”
“लेकिन अब मेरे पास कोई और है नहीं.. इतने कम समय में एक नए बन्दे को तैयार करना जरा मुश्किल काम नहीं है ?”
“आपके लिए कुछ मुश्किल नहीं है सर, बंदा आपकी आँखों के सामने है और आप यहाँ वहाँ ढूंढ रहे हैं।”
“किसकी बात कर रहे हो शेखर ?”
“सर भुवन की बात कर रहा हूँ..।”
भुवन का नाम आते ही सबरवाल जी के चेहरे पर कुछ अलग से भाव चले आये..
“या फिर सर एक और उपाय है.. ।”
“दूसरा उपाय क्या है, वो बताओ ।”
“आप पुलिस वालो को चरित्र को न पकड़ने का आदेश दे दीजिये..”
“हम्म.. नहीं पुलिस वाले जो कर रहे उन्हें करने दो, वो उनकी ड्यूटी है..।”
“तो फिर सर, अब क्या करना है..?”
“अब हमारे हाथ में बचा ही क्या? सज्जन राणा के बाद मैंने तो ईमानदारी से उसके बेटे को ही टिकट देने के लिये चुना था..।
सच कहूं तो भुवन तो दिमाग में दूर दूर तक कहीं नहीं था..।
लेकिन अब लगता है, और कोई उपाय नहीं बचा..।
चरित्र को कम से कम इस बात का ध्यान तो रखना चाहिए था न कि अपना नाम इन सब से अलग बचाये रखे..।
अब हम कहाँ कहाँ तक क्या क्या देखे?”
“जी सर.. ।”
“तुम शाम के वक्त पार्टी कार्यालय में एक बैठक बुलवाओ, वहीँ बाकी गणमान्य लोगो से भी चर्चा कर ली जाए..।”
“जी, जैसा आपको उचित लगे। लेकिन हमारा कहना है, अब बैठक में भुवन के नाम पर चर्चा करने से बेहतर होगा, आप अपनी तरफ से नाम पेश कर दीजिये.. बस।
वैसे भी यहाँ मौजूद सभी आदरणीय इस बात से सहमत लग रहे हैं.. !”
उन सभी ने समवेत स्वर में सहमति जता दी..
“लेकिन अगर बाकी लोग नहीं माने तो..?”
“बैठक के पहले ही सब से बात कर के सबको तैयार कर लूंगा सर..।
उसकी ज़िम्मेदारी मेरी.. आप निश्चिन्त रहे !”
“हम्म ठीक है..।”
“आप लंच के लिए जायेंगे क्या ? गाडी निकालने बोलूं..।”
“नहीं.. लंच यहीं मंगवा लो.. ।”
“जी सर..।”
शेखर ने मंत्री जी को प्रणाम किया और निकल गया..
शेखर के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान थी।
आखिर जाने वो कब से चाह रहा था कि भुवन को भी अब मुख्य धारा में शामिल कर लिया जाए..।
लेकिन इसके साथ ही उसे मंत्री जी के चेहरे के वो रहस्यमयी रंग भी रह रह कर याद आ रहे थे..।
वैसे अब तक उन्होंने एक बार भी खुद से भुवन का नाम नहीं लिया था..।
भुवन का नाम तो उसी ने प्रस्तुत किया था..।
आखिर उस रहस्यमयी मुस्कान के पीछे क्या राज है?
वो सोच रहा था कि उसकी पत्नी का फ़ोन आने लगा और वो उससे बात करता हुआ अगले काम की तैयारी भी देखने लगा..
क्रमशः

Bhuwan har tarah se is pad ke liye bana hai par jane kyun kuch thik nhi lag raha
बहुत अच्छा भाग 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻
Nyc part 👌
👌👌👌👌👌👌👌
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आखिरकार प्रत्याशी के लिए भुवन का नाम सामने आ ही गया । इसमें पार्टी अध्यक्ष भुवन के ताऊजी को कुछ कहना /करना नहीं पड़ा लेकिन उनकी मुस्कान देखकर लगता है कि इन सब घटनाक्रम के पीछे कहीं इनका ही तो काम नहीं है।
Nice chapter 👌👌👌👌👌
🙃🙃🙃🙃🙃💥💥💥💥👏👏👏👏
क्या ताऊजी खेला खेल रहे हैं 🤔😂👌👌
Very very nice part 👌👌