
मायानगरी भाग -18
मायानगरी में कुछ ज्यादा ही देर हो रही है.. कहानी कुछ ज्यादा ही लम्बी हो गयी है, लेकिन कहानी का अंत भी करना ज़रूरी है..
इसलिए आज मायानगरी का भाग दे रही हूँ…
अब तक आपने पढ़ा..
सबरवाल जी भुवन की जगह एक पुराने मंत्री सज्जन राणा को टिकट देते हैं, जिससे सबरवाल परिवार में उदासी का माहौल है। इस बात के लिए पूरे परिवार के साथ-साथ भुवन की मां ने भी सबरवाल जी को माफ नहीं किया, लेकिन उन्होंने इसका कौन सा दूरगामी परिणाम सोच रखा है, यह पूरे परिवार को नहीं पता। सज्जन राणा का पारिवारिक जीवन भी उथल-पुथल भरा है।
उसके दोनों बेटे प्रशासनिक सेवा में है, बावजूद उनके और उनकी पत्नियों की आपस में नहीं बनती। सज्जन राणा की धर्मपत्नी सरोज भुवन की मां आनंदिनी की बचपन की सहेली है, जो हमेशा से यह चाहती थी कि भुवन की शादी उसकी बेटी श्रद्धा से हो जाए।
पूरे परिवार में श्रद्धा ही एक ऐसी है जो अपने बलबूते प्रशासनिक सेवा में जाना चाहती हैं, और दिल्ली में अलग रहकर पढ़ाई कर रही है।
टिकट मिलने के बाद सज्जन राणा अपने फार्म हाउस पर पार्टी करके घर लौटता रहता है, इस बीच उसकी गाड़ी का एक्सीडेंट होता है, और वह वही मारा जाता है। इसके बाद कहानी में एक नया मोड़ आता है। लीना इस केस की इंक्वारी कर रही है, जिसके लिए वह भुवन की मदद लेती है, और एक-एक करके उन्हें कुछ नए सुराग मिलते जाते हैं।
सज्जन राणा के फार्म हाउस की साज संभाल करने वाला शंकर भुवन को बहुत मानता है, और इसीलिए भुवन की बात मानकर लीना को सब बताने के लिए राजी हो जाता है।
शंकर को जितना जो कुछ मालूम है, उसके अनुसार मंत्री जी के पीए अमर कुमार और श्रद्धा के बीच कुछ कोमल संबंध थे। अमर कुमार अनुसूचित होने के कारण घर पर पसंद नहीं किए जाते, और इसलिए मंत्री जी और उनका बेटा चरित्र राणा अमर की बेइज्जती करके उसे घर से निकाल देते हैं।
उस वक्त जाते हुए अमर गुस्से में मंत्री जी को मार डालने की धमकी भी देता है। इसके बाद मंत्री जी अमर के पीछे पड़ जाते हैं, और उसे उसके पद से नीचे गिरा दिया जाता है। उसका स्थानांतरण किसी सुदूर प्रदेश में कर दिया जाता है। इस सब के बाद लीना को यह महसूस होता है कि हो सकता है मंत्री जी के एक्सीडेंट के पीछे अमर कुमार का हाथ हो।
…
इसके साथ ही कुछ और नये राज खुलते है, जैसे मंत्री जी के साथ उस दिन उनका हमेशा का ड्राइवर नहीं था बल्कि कोई नया ड्राइवर था..।
और उस नये ड्राइवर को चरित्र राणा का छोटा भाई सुमित्र राणा लेकर आया था..।
इस सब को जान कर लीना पसोपेश में है कि मंत्री जी की मौत के पीछे असल में कौन है..?
इन्हीं सब बिंदुओं पर वह विचार करती रहती है कि तभी उसके पास भुवन का फोन आता है, और भुवन उसे बताता है कि मंत्री जी के ना रहने पर उनके बड़े बेटे चरित्र राणा को पार्टी के द्वारा टिकट दी जा रही है। क्योंकि उसके ताऊ जी का सोचना है कि मंत्री जी के बाद उनके सहानुभूति वोट चरित्र राणा को मिलेंगे, और जिससे पार्टी को फायदा होगा।
चरित्र राणा ने इसीलिए अपनी अच्छी खासी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया है, यह सब जानकर लीना के सामने एक बार फिर यही सवाल खड़ा हो जाता है कि मंत्री जी की मृत्यु के पीछे असल में कौन है, चरित्र राणा? सुमित्रा राणा? या अमर कुमार…?
अब आगे…
लीना अपने ऑफिस में बैठी सोच में डूबी हुई थी। उसके पास अब तक इस केस से जुड़े जितने भी महत्वपूर्ण बिंदु आए थे, उन सब पर विचार करने के बाद उसे यही समझ में आ रहा था कि मंत्री जी का परिवार ही उनकी मौत का जिम्मेदार था।
कहीं ना कहीं चरित्र राणा, विधायक के पद के लिए लालयित हो उठा था, और जैसा कि शंकर ने उसे बताया था कि चरित्र राणा की जगह उम्र और अनुभव के कारण सज्जन राणा को सबरवाल जी ने टिकट दिया था। इसलिए यह भी हो सकता है कि अपनी टिकट की दावेदारी प्रस्तुत करने के लिए उसने ही अपने पिता को रास्ते से हटा दिया हो।
वह, यही सब कुछ सोच रही थी कि दरवाजे पर दस्तक देकर भुवन अंदर चला आया..।
“आओ भुवन बैठो.. ।
शंकर को क्या तुमने अपने घर पर रखा हुआ है.. ?”
“जी, हमें उनके लायक कोई सुरक्षित ठिकाना ढूंढना पड़ेगा, और तब तक हमें लगा कि वह हमारे घर में सबसे ज्यादा सुरक्षित है ।”
“तुम ठीक कह रहे हो, वैसे शंकर को कौन मारना चाहता होगा?”
“लीना जी, शंकर भाई को वही लोग मारना चाहते हैं, जो मंत्री जी को मार चुके हैं। क्योंकि कहीं ना कहीं शंकर भैया से हमें काफी सारी महत्वपूर्ण बातें पता चल गई हैं…।”
“हां ! तुम सही कह रहे हो, उस नए ड्राइवर का पता ठिकाना भी मिल गया है। मैंने अपनी टीम को उसे उठाने के लिए भेजा हैं। कुछ देर में वह लोग उसे पकड़ कर ले आएंगे..।”
लीना और भुवन बात कर रहे थे कि तभी एक हवलदार ने दरवाजे पर दस्तक दी और लीना को आकर यह बताया कि उस ड्राइवर को लीना के ऑफिस में उसकी टीम लेकर आ चुकी है।
यह सुनते ही लीना अपनी जगह पर खड़ी हो गई, और उस ड्राइवर से सवाल जवाब करने बाहर निकल गई। भुवन भी उसके पीछे हो लिया..।
पहले पहल तो ड्राइवर ने अपना मुंह बिल्कुल सील बंद कर रखा था, लेकिन पुलिस के दो डंडे खाते ही उसने सब कुछ उगल दिया..
“मैडम हम पेशेवर ड्राइवर नहीं थे। हमारा नाम सुरेश है, और हम अभी पिछले दो महीने से ही स्कूल की एक वैन चला रहे थे..।”
“तुम स्कूल की वैन चलाते हो, फिर सुमित्रा राणा की तुमसे मुलाकात कैसे हुई? मतलब वह तुम्हें कैसे जानता है..?”
“उनके दोनों बच्चे हमारी वैन में ही स्कूल जाते हैं। हम रोज उनके घर से बच्चों को उठाकर स्कूल पहुंचाते हैं, और स्कूल से वापस लाते हैं। एक दिन जब सुमित्र साब बच्चों को वैन में चढ़ाने आए, तब उन्होंने हमसे हमारा नाम और मोबाइल नंबर पूछा। वैसे उनकी मैडम के पास हमारा मोबाइल नंबर था, लेकिन फिर भी हमने साब को दे दिया।
उसी शाम साहब ने हमें फोन करके बुलाया और कहा कि उन्हें बहुत जरूरी काम है। हमने पूछा कि क्या काम है ?
तो उन्होंने कहा कि हमें हफ्ते भर के लिए उनके पिता की गाड़ी चलानी होगी, क्योंकि उनके पिता का ड्राइवर छुट्टी पर गया है। हमने असमर्थता जताई, क्योंकि हम स्कूल में वैन चलाते हैं।
तब उन्होंने कहा कि सुबह के वक्त के लिए उन्हें ड्राइवर नहीं चाहिए। सिर्फ शाम को दो-चार घंटे का काम रहेगा,और मोटा पैसा मिलेगा..।
मैडम हम कमाने के लिए ही तो यह काम कर रहे थे, हमने पूछ लिया कितना पैसा देंगे ?
उन्होंने एक हफ्ते का चौदह हजार देने को कहा, यानी कि एक दिन का लगभग दो हजार।
इतना तो हम महीने भर वैन चला कर कमाते थे, इसलिए हमने हां कह दिया..।”
“तो इसका मतलब मंत्री जी की गाड़ी तुमने एक हफ्ते चलाई है ?”
“नहीं मैडम! एक हफ्ते नहीं चलाना पड़ा हमें, जिस तारीख से हमें बुलाया था, उस तारीख पर हम गए, तब तक मंत्री जी कहीं निकल चुके थे।
उसके दूसरे दिन मंत्री जी कहीं नहीं गए, और तीसरे दिन ही यह हादसा हो गया..।”
“तुम कहां सो रहे थे,? हादसे के वक्त तुम तो गाड़ी में मौजूद नहीं थे, जबकि फार्म हाउस से तुम ही मंत्री जी को लेकर निकले थे..।”
“जी मैडम, मंत्री जी को फार्म हाउस से हम ही लेकर निकले थे, थोड़ा दूर ही हम पहुंचे थे कि, हमारा फोन बजने लगा।
हमने फोन साइलेंट मोड में डाल दिया, लेकिन फिर दोबारा किसी अनजान नंबर से हमें फोन आने लगा। मंत्री जी ने खुद ही हमें कहा कि फोन उठा लो। हमने फोन उठाया तो पता चला कि घर पर हमारी बीवी की तबियत एकदम से बिगड़ गई है, और हमें तुरंत अस्पताल पहुंचना होगा।
हमारी पत्नी को वैसे भी पेट की समस्या बनी रहती है। हमें लगा कुछ ज्यादा चिंता वाली बात ना हो जाए, हम उस फोन के बाद बहुत घबरा गए थे। मंत्री जी ने जब हमें इतना घबराया देखा, तो उन्होंने सारी बातें पूछी और हमें जान को कह दिया। हम मंत्री जी को गाड़ी देकर तुरंत वहां से अस्पताल की तरफ भागे.. ।”
“तो क्या तुम्हारी बीवी वहां मौजूद थी..?”.
“हां मैडम वह अस्पताल में ही थी। उसकी तबीयत बहुत खराब हो गई थी। लेकिन हमारे पहुंचने तक डॉक्टर ने इंजेक्शंस और दवा देकर उसे सुला दिया था। हमारे वहां पहुंचने के आधे से एक घंटे बाद में होश में आई। और फिर हम उसकी छुट्टी करा कर घर ले आए। लेकिन इसी बीच बहुत देर हो गई और मंत्री जी की गाड़ी का एक्सीडेंट हो गया। उस वक्त हमें लगा मैडम कि हम अपना सर फोड़ लें।
हम भागे भागे से उनके घर पहुंचे, छोटे साहब से मिलने।
हमने उनके पांव पकड़ लिए कि हमसे इतनी बड़ी भूल हो गई। अगर हम सारा वक्त उनके साथ रहते तो इतना बड़ा एक्सीडेंट नहीं होता।
” फिर सुमित्रा राणा ने क्या किया ?”
“उन्होंने हमें कुछ पैसे दिए और कहा कि हम कुछ समय के लिए यहां से दूर चले जाएं। हमने कहा भी कि पुलिस जो भी हमसे पूछताछ करेगी, हम सब सहन कर लेंगे। लेकिन उन्होंने कहा नहीं वह नहीं चाहते कि बेगुनाह होते हुए भी हम जबरदस्ती किसी मामले में फंसे ।जबकि सीधी सी बात थी कि नशे में होने के कारण ही मंत्री जी कार कि एक्सीडेंट हुआ था।”
“ओके! तो तुम्हें शहर से भगाने की प्लानिंग थी और तुम शायद भाग भी गए थे, क्योंकि हमें तो मिले नहीं।”
: जी मैडम हमारी पत्नी ने भी कहा कि जब सब लोग खुद कह रहे हैं, तो हम क्यों इतना सोच रहे हैं? और हम उसे लेकर गांव चले गए..।”
“गांव तो चले गए, लेकिन अपना पता ठिकाना यहीं छोड़ गए.. अच्छा हुआ जो छोड़ गए, उसी के बलबूते तो तुम तक हम पहुँच पाए.. ।
अच्छा एक बात सच सच बताओ, क्या मंत्री जी की मौत के पीछे उनके बेटे सुमित्र राणा का हाथ हो सकता है ?”
ड्राइवर कुछ पलों के लिये खामोश हो गया..
लेकिन उसकी ख़ामोशी लीना ने पढ़ ली..
वो तुरंत अपनी जगह से खड़ी हो गयी, उसने अपने मातहत को बुला कर तीन वारंट तैयार करवाने का हुक्म दिया और वहाँ से बाहर निकल गयी..
ये सब सुन कर भुवन को दहशत सी होने लगी..
क्या ये सिरफिरी पुलिस वाली अब चरित्र, सुमित्र और अमर, इन तीनो को उठा कर थाने में बैठा देगी ?
तीनो के तीनो प्रशासनिक अधिकारी है, उनके साथ ऐसा कुछ भी करना अपने खुद के पैरो पर कुल्हाड़ी मारने जैसा था.. ।
क्रमशः

Lina ne ager unpe sidhe ungli uthayi toh khud musibat me pad jayegi
एक बात बताओ डॉक्टर साहिबा …. आप इतना CID मे क्यों भर्ती नहीं हुई 🤔मतलब इतना खतरनाक दिमाग़ पाकर इतनी शरीफ सी डॉक्टरनी बन गई।
मायानगरी की माया है सब उलझे पड़े है, भुवन जैसे सीधे आदमी को लीना जैसी सिरफिरी मे उलझा रही हो, जोड़ी बड़ी खूब बना रही हो 👌🏻।
लाजवाब लिखती हो आप 👌🏻👌🏻👌🏻बहुत अच्छा भाग 👌🏻👌🏻
Nyc part 👌
Sirfiri nhi Syco hai 😂👌👌👌
भुवन बिल्कुल भी नहीं जानता कि लीना अपने काम को लेकर कितना सिरफिरी है।
👌👍nice Part
Nice👍👍 part
Very nice part.
Nice mam
बहुत सुन्दर रचना 🌹🌹