अतिथि-67

अतिथि -67

शुरू में माधव गांव में हम लोगों के साथ इतना रम गया था कि, उसे शहर जाने का मन ही नहीं करता था। बहुत रो-रो कर गया था, लेकिन फिर उसे धीरे-धीरे समझ में आ गया कि उसे रहना तो अपने माता-पिता के साथ ही है।
     उसके जाने के बाद हम दोनों भी बहुत अकेले हो गए थे। गांव में काम बहुत था, लेकिन माधव के जाने के बाद जो सूनापन आया गया था, उसे कोई नहीं भर सकता था। इसीलिए हर दस दिन में हम किसी न किसी बहाने माधव को देखने के लिए शहर पहुंच जाते थे।
    लेकिन जल्द ही हमें समझ में आ गया कि सुलक्षणा को यह बात पसंद नहीं आती। हमारे सामने वह माधव को अक्सर कमरे में बंद कर देती, या पढ़ने बैठा देती। वह बित्ते भर का बच्चा उसकी आंखों से डरने लगा था। उसके डर की वजह से वह दौड़कर हम लोगों के पास भी नहीं आ पाता था, हम भी मन मसोस कर बस उसे देखते रह जाते थे…।

पहले पहल जब हम जाते थे, तो उसके लिए ढेर सारा सामान लेकर जाते थे। उसकी पसंदीदा खाने पीने की चीजें, कुछ गांव के खिलौने, देसी घी का कनस्तर, गांव का गुड राब और भी जाने कितनी सारी चीजें। लेकिन सुलक्षणा सब कुछ हमारे हाथ से लेकर सीधे रसोई में जाकर रख दिया करती। शुरुआत में हमें देखकर वह पैर छूकर रसोई में हमारे लिए चाय पानी का बंदोबस्त करने चली जाती थी, और उसके कमरे से जाते ही हम माधव को अपने गले से लगा लेते थे।
     अक्सर वह हमसे चिपक कर रोना शुरू कर देता था, लेकिन उस समय हमें पता नहीं था कि रसोई से छुप-छुप कर सुलक्षणा यह सब कुछ देखा करती थी। इसलिए कुछ दिनों बाद जब हमने जाना शुरू किया तब उसने हम लोगों के लिए चाय चढ़ाना भी बंद कर दिया। वहीं हम लोगों के सामने बैठे बैठे ही अपनी काम वाली को हर एक आदेश थमा दिया करती थी। आखिर हम उसके सास ससुर थे, अगर हमारा चाय नाश्ता नहीं देखती तो केदार बिगड़ सकता था, और उसका सबसे बड़ा लक्ष्य था केदार को अपने हाथ में, अपनी मुट्ठी में कैद कर रखना।

     इसलिए वह उसे भी नाराज नहीं कर सकती थी। उसके सामने कई बार वह झूठे मुहँ हमसे कह चुकी थी कि हम वहां रह क्यों नहीं जाते?
लेकिन इतने दिनों में हम उसका स्वभाव अच्छे से समझ चुके थे। पता नहीं हमारे जाने के बाद वह माधव को किस कदर प्रताड़ित करती रही होगी कि बच्चा हमारे पास आना, हमसे चिपकना ही भूल गया था।
   बस दूर बैठा अपनी होमवर्क की कॉपी में पेंसिल से जाने क्या लिखता रहता था? हमें देखने के लिए भी वह अपनी मां के इधर-उधर होने का मौका ढूंढता था। अपनी मां से नजर चुरा कर वह हमें देखा करता, और उस देखने दिखाने में ही हम सारा लाड़ उस पर लुटा लेते थे।

     धीरे-धीरे हमें समझ में आ गया कि हमारी ले जाने वाली चीजों को भी उसे नहीं खिलाया जाता। एक बार हमने केदार के बाबूजी से इस बारे में बात की, उनसे शिकायत की।
    शिकायत क्या कि अपने दिल का बोझ कहते कहते हम रो पड़े। लेकिन उन्होंने साफ और स्पष्ट शब्दों में हमसे कह दिया कि अगर बच्चे को जिंदा रखना चाहती हो तो उसकी गृहस्थी में ज्यादा सेंत लगाना छोड़ दो।
हम भरी भरी आंखों से केदार के बाबू को देखते रह गए। क्या हम अपने लड़के की घर गिरस्ती खराब करना चाहते हैं..?
वह हमारी इस बात पर जरा भड़क गए।
  
    “तुमको काहे नहीं समझ में आता केदार की अम्मा, केदार के लड़के को उसकी नई मां जैसा पालना चाहती है, पालने दो। अगर हम ज्यादा बीच बचाव करते रहे तो कहीं लड़के की और दुर्गति ना कर दे! माधव की अभी उम्र बहुत कम है, उसके दिमाग पर अभी से जो बातें धंसती जाएंगी वह आगे हमेशा के लिए गहरा नासूर बन जाएंगी, और उन्हें उसके दिमाग से निकालना हमेशा के लिए कठिन हो जाएगा।

    इसलिए उन्हें उनके हाल पर छोड़ दो। हो सकता हम उनके बीच में कम बोले तो शायद बहु को माधव के लिए प्यार जाग जाए।”

हमें भी उनकी बात समझ में आ गई। और फिर हमने बार-बार कानपुर जाना जरा कम कर दिया। फिर भी माधव का मोह ऐसा था कि महीने में एक बार हम किसी न किसी नौकर को साथ लेकर चले जाते थे। माधव के दादा ने वहां जाना एकदम ही छोड़ दिया। हम जब भी जाते हमें हमेशा वही हाल नजर आता ।

कुछ दिनों बाद सुलक्षणा उम्मीद से हो गई। हमें ऐसा लगा अब शायद माधव के दिन बहुर जाएंगे। क्योंकि खुद मां बनने के बाद शायद सुलक्षणा के अंदर की सोई हुई ममता जाग जाए, और अपने बच्चे के साथ वह माधव को भी प्यार देने लगे, लेकिन हम गलत साबित हुए…।

सुलक्षणा की जचकी के समय इसकी मां उसके पास चली आई । उन्होंने तो माधव को घर का नौकर बनाकर छोड़ दिया। जिस दिन सुलक्षणा की जचकी हुई, उसी दिन हम और केदार के बाबू भी वहां चले गए। माधव की जो हालत देखी हमें रोना आ गया।

    हमने धीरे से सुलक्षणा की अम्मा से कहा कि अब तो सुलक्षणा के पास छोटा बच्चा है, वह उस पर ध्यान देगी या माधव पर? इसलिए माधव को हम ले जाते हैं। लेकिन हमारी बात सुनकर सुलक्षणा चीख पड़ी।

   ” नहीं माधव को यहां से कोई नहीं ले जाएगा। वह यही रहेगा, हमारे साथ।”

हम कुछ नहीं कह पाए। लेकिन हां इसके बाद जब भी कानपुर जाना हुआ, हम माधव को कान्हा की चाकरी करते ही देखते रहे
      सुलक्षणा ने अपने बेटे का नाम कान्हा रखा था। माधव के नाम से मिलाकर। लेकिन दोनों में जमीन आसमान का अंतर था।
        कान्हा घर का छोटा लाडला बेटा ही रहा और माधव एकदम से घर का सबसे बड़ा और जिम्मेदार बच्चा बन गया।
            पर एक बात बताएं, माधव ने कभी अपने माता-पिता की किसी से भी शिकायत नहीं की। बल्कि हमसे मिलने पर हमेशा यही कहता कि उसकी मां बहुत अच्छी है। उसका बहुत ध्यान रखती है। धीरे-धीरे दिन गुजरने लगे। हमें समझ आ गया कि माधव हमसे झूठ बोलता है।

       वह शायद सोचता था कि सच जानकर हमें दुख होगा। हमें लगा हमारा इतना छोटा सा बच्चा कितना बड़ा हो गया है।

     और फिर एक दिन अचानक केदार के बाबू हम सबको छोड़ कर चले गए। वह सब लोग आए, घर पर रुके, इतने दिन तक बड़ी चहल पहल रही। जाते वक्त हमारे पीछे पड़ गए, अपने साथ ले जाना चाहते थे। लेकिन हम जानते थे, यह आवभगत चार दिन की चांदनी बस है। उसके बाद यह बुढ़िया सुलक्षणा को फूटी आंख नहीं भायेगी।

      जब हीरे जैसे लड़के को ही उसने कांच की तरह रखा, तो हमारी क्या बिसात। कम से कम जब तक हाथ पैर चल रहा है, हम अपने घर में अपने गांव में रानी बनकर तो रहेंगे। इसलिए माधव का भी मोह हमने काट दिया।

धीरे-धीरे वह भी बड़ा हो गया। पढ़ाई लिखाई सब कर ली, नौकरी में भी लग गया और देखो खुश भी कितना रहता है। लेकिन हम जानते हैं, उसके दिल का एक कोना आज भी कितना सूना है। कितना अकेला है।
वह हमेशा हर मिलने जुलने वाले को अपनी मां की प्यार भरी कहानी सुनाता है, यह कहानी उसने खुद बनाई है अपने चारों तरफ…।

जानती हो यह कहानी उसने सबसे पहले किसको सुनाई?”

अब तक सांस रोके सारी बात सुनती बैठे डिंकी ने आंखें फाड़ कर दादी की तरफ देखा।

” किसे सुनाई दादी?”

” अपने आप को। खुद को उसने यह कहानी गढ़ कर अपने आप को यह विश्वास दिला दिया है कि उसकी मां उसके भले के लिए उसे डांटती है। उसकी मां हमेशा से चाहती थी कि वह खूब पढ़ाई करें, इसलिए उसे जबरदस्ती अपने साथ ले गई। और बस यही कहानी उसने अपने दोस्त यार, जान पहचान वालों को रिश्तेदारों को कहनी शुरू कर दी।

और धीरे-धीरे करके उसने इन कहानियों को सच मान लिया। हमें तो लगता है कि यह उसका अपने दुख को भुलाने का एक अलग और अनोखा ही तरीका है। उसने अपने दुख को ही अपनी ताकत बना ली। बचपन से ही रात दिन पढ़ने में एक कर दिया उसने। बारहवीं के इम्तिहान में पूरे जिले में पहला स्थान पाया था हमारे माधव ने। जबकि आठ साल की उम्र तक गांव में पढा था, सरकारी स्कूल के हिंदी मीडियम में।

        और कॉलेज अंग्रेजी मीडियम से की। फिर भी प्रथम स्थान पाया। इंजीनियरिंग का इम्तिहान भी पहली बार में ही निकाल लिया। कॉलेज में भी हमेशा सबसे आगे रहा। तीरंदाजी किया करता था, और अब भी करता है, बहुत सुंदर।
   लेकिन उसकी मां को पसंद नहीं था, इसलिए कॉलेज के बाद उसने वह सब कुछ छोड़ दिया….।

उसके पिता चाहते थे वो नौकरी करे, जबकि वो व्यापार करना चाहता था.. लेकिन अपने पिता की बात मान कर उसने नौकरी तलाशी और नौकरी करने लगा..।

उसे कोई दिमाग की बीमारी नहीं, जो वो फिजूल कहानियां बुने…।”

क्रमशः

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Nisha
Nisha
6 months ago

Madhav ne kitna saha hai ager dinki dadi ke paas nahi aati toh kabhi jaan hi nahi pati

Jyoti
Jyoti
7 months ago

Very nyc part 👌

Shanu singla
Shanu singla
7 months ago

💫💫💫💫💫💫💫💫💫💫💫💫

Samiksha
Samiksha
7 months ago

Wow

Gouri sarwa
Gouri sarwa
7 months ago

😳😳😳😳😳🥺🥺🥺🥺🥺🥺🥺🥺🥺🥺🥺🤍🤍🤍🤍🤍🤍🤍🤍🤍🤍

Geeta Prasad
Geeta Prasad
7 months ago

इस पार्ट को पढ़कर दिल दुखी हो गया।।।क्या माधव के जीवन में खुशियां नहीं आएंगी? शुरू से वो प्यार को तरसा,अब सच्चा प्यार उसके जीवन में आया तो ये जानलेवा बीमारी भी आ गई।।हे प्रभु🙏🏻
चमत्कार हो जाए🙏🏻🙏🏻

Last edited 7 months ago by Geeta Prasad
Neelu
Neelu
7 months ago

Nice part….

Poonam Aggarwal
Poonam Aggarwal
7 months ago

🫢🫢🥺🥺🥺😢😢💔💔

Manu Verma
Manu Verma
7 months ago

हमेशा की तरह बेहद खूबसूरत भाग 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻💐💐💐💐💐

Rekha Dhanaliya
Rekha Dhanaliya
7 months ago

Lovely story humesa ki trh…Dil ko bhari kr dene Wala part