
अतिथि -62
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अपनी बीमारी के बारे में सब कुछ जानने के लिए माधव डॉक्टर से सलाह कर रहा है, जहां डाक्टर उसे बताते हैं कि उसके दिमाग की गांठ ऐसी जगह पर फंसी हुई है, जिसको ऑपरेट करके नहीं निकाला जा सकता।
इसलिए डॉक्टर ने पहले उस गांठ को छोटा करने के लिए कुछ दवाई दी है।
लेकिन अब भी डॉक्टर माधव को पूरी तरह आश्वस्त नहीं कर रहे हैं। उनका कहना है कि अब भी माधव के स्वास्थ्य के बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता। और इसीलिए माधव यह तय करता है कि उसे डिंकी से अपनी प्रस्तावित शादी को तोड़ना होगा।
वह जब डॉक्टर के पास बैठा होता है, उस वक्त डिंकी के बहुत बार कॉल आते हैं, जिन्हें वह उठा नहीं पाता और इसीलिए घबरा कर डिंकी उससे मिलने उसके फ्लैट पर चली आती है।
जहां माधव को देखकर उसे लगता है कि माधव बीमार है, और वह उसकी सेवा टहल में लग जाती है। जिससे माधव को अपनी परेशानियां कम लगने लगती है।
और वह बहुत हल्का महसूस करने लगता है।
दूसरी तरफ योगिता दीपक से नाराज होकर घर छोड़कर जरूर गई थी, लेकिन बहुत इंतजार के बाद भी जब दीपक उसे लेने नहीं आता तो वह वापस लौट आई है।
घर लौटने के बाद दीपक और उसकी बेटी चारू का बर्ताव योगिता को अच्छा नहीं लगता। लेकिन वह कुछ कर भी नहीं सकती।
जहां एक तरफ दीपक उससे अबोला करके अपनी नाराजगी जता रहा होता है, वही चारू उसे हर बात पर चार बातें सुना कर अपने नाराजगी दिखा रही होती है। थक हार कर योगिता अपने कमरे में जाकर पलंग पर पड़ जाती है।
अब आगे…
योगिता पलंग पर लेटी छत को देखती हुई अपने ख्यालों में खोई हुई थी। अब उसके दिमाग में भूषण की प्यार मोहब्बत वाली बातें नहीं आ रही थी, बल्कि रह रहकर भूषण ने उसे कैसे धोखा दिया, यही आ रहा था। और वह बार-बार खुद पर नाराज हुई जा रही थी।
वह छत पर चलते पंखे को अपलक देख रही थी। तभी कमरे के दरवाजे पर हल्की सी दस्तक हुई और दरवाजा खुल गया।
वह अपने जिस पति को दुनिया जहान का सबसे गंवार आदमी समझती थी, वह आज भी अपने ही कमरे में आने से पहले बंद दरवाजे पर दस्तक जरूर देता था।
यह सोचकर योगिता के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गई।
दीपक कमरे के अंदर आ गया। दीपक को कपड़े बदलने थे, उसने पलट कर एक बार पलंग की तरफ देखा, योगिता उसी की तरफ देख रही थी। दीपक ने अलमारी में से कपड़े निकाले और बाथरूम में घुस गया।
योगिता को यह बात बुरी तरह से अखर गई। उसी का पति आज उसी के सामने कपड़े बदलने में भी संकोच करने लगा था।
इतने साल की शादी के बाद ये कैसी आंधी चली कि एक झटके में एक हंसते खेलते जोड़े को दो अपरिचितों में बांट गई थी..।
योगिता भी उठ कर बैठ गयी…
वो दीपक का इंतज़ार करने लगी..
उसे लगा यूँ एक दूसरे के बीच जमी बर्फ को पिघलाना ज़रूरी है, वरना उनके बीच की खाई बढ़ती ही चली जाएगी..।
बाथरूम का दरवाज़ा खुला और दीपक कमरे में चला आया।
वो पलंग पर एक तरफ बैठ कर अपने किसी दोस्त को फोन लगाने लगा.. योगिता ने धीमे से हिम्मत कर के उसे टोक दिया।
“सुनिए.. !”
“हम्म.. !” दीपक ने इससे ज़्यादा कुछ नहीं कहा
“हमसे बात नहीं करेंगे ?”
“कर तो रहा हूँ !”
“ये भी कोई बात करना हुआ, ये तो सिर्फ एक औपचारिकता भर हुई, इससे अच्छा तो.. “
वो और भी कुछ कहती लेकिन तब तक में दीपक फ़ोन पर किसी से बात करने लगा था..।
अपने प्रयास में मिली असफलता ने योगिता में अजीब सी निराशा भर दी।
खीझ कर वो मुहं घुमा कर लेट गयी।
असल में ये उसका स्वभाव ही नहीं था..
उसके स्वभाव में कभी मुलायमियत रही ही नही थी.. वो हमेशा से खुद के बारे में सोचने वाली ही रही थी। उसने कभी किसी और के बारे में ज़्यादा सोचने का झंझट उठाया ही नहीं..।
वो आत्ममुग्ध थी और इसीलिए इतनी बड़ी गलती कर गुजरने के बाद भी उसे अपनी कोई गलती नजर नहीं आ रही थी।
अब भी अगर भूषण का धोखा उसके सामने नहीं आता तो वो उसी के पीछे घूमती..
उसके मन में चलती यही बात दीपक को बर्दाश्त नहीं हो रही थी।
दीपक जिस स्वभाव का था, वो योगिता को माफ़ कर के गले से लगा भी लेता, लेकिन एक बार तो सच्चे मन से योगिता को अपनी भूल समझ में आती।
लेकिन अपनी भूल को समझने की जगह वो अब भी खुद के भटकाव को दीपक के उसकी तरफ ध्यान नहीं देने का परिणाम साबित करने पर तुली थी, और उसकी यही चारित्रिक दुर्बलता दीपक को भीतर ही भीतर खाये जा रही थी।
वो अपने ख़यालो में खोयी थी, उसने पलट कर देखा, दीपक भी चुपचाप लेट कर छत की तरफ देख रहा था..
इतनी देर में तो अमूमन उसे नींद आ ही जाती थी, वो दिन भर में इतना थक जाता था कि बिस्तर पर लेटते ही खर्राटे भरने लगता था।
लेकिन अब उसकी भी नींद उड़ गयी थी।
****
माधव का नाश्ता ख़त्म होने पर सारे बर्तन समेट कर डिंकी रसोई में ले गयी..।
उसे मालूम था इस घर में काम करने के लिए कोई नौकर नहीं है। उसने खुद ही सारे बर्तन साफ़ कर दिए..।
बाहर आकर उसने माधव की पीठ के पीछे एक तकिया लगाया और टीवी चला दिया। अंदर से लाकर उसे एक चादर ओढ़ा दी और खुद घर की सफाई में लग गयी।
माधव के माता पिता को गए दो दिन बीत चुके थे। और इन दो दिनों में माधव अपने आप से जूझते हुए थक चुका था, दो दिन से न घर की सफाई हुई थी और न कुछ और काम।
शादी में जाने वाला सारा सामान एक कमरे में फैला पड़ा था।
लड़कियां सोलह कलाओं के साथ जन्म लेती हैं, उन्हें ये सब कोई हाथ पकड़ कर नहीं सिखाता..।
ये सब वो वक्त और ज़रूरत के हिसाब से सीख ही जाती हैं, और अगर कोई लड़की ये सब सलीका नहीं सीख पाती, मतलब या तो वो ज़बरदस्त आलसी है या हद दर्जे की फूहड़..।
डिंकी न आलसी थी न फूहड़।
उसका हाथ लगने से एक कुंवारा घर चमक गया।
डिंकी ने घर भर की खिड़कियां खोल दी। सारे फैले कपड़ों को मशीन में धुलने लगा दिया, धुले कपड़ों की तह लगा दी, उन्हें करीने से आलमारी में लगा दिया।
शादी की खरीदारी वाले सामान को एक साथ कर के टेबल पर जमा दिया, और रसोई को धो पोंछ के चमका दिया।
सब करने के बाद उसने कमरे में मौजूद एक अदद हनुमान जी की तस्वीर के सामने धूप बत्ती जला दी..
पूरा घर चंदन की महक से भर गया..।
बाहर शाम ढल रही थी, और घर के अंदर उसका सिंदूरी रंग भरता जा रहा था..।
माधव के चेहरे पर मुस्कान चली आई..।
इतना सब करने के बाद अब भी डिंकी रसोई में ही कुछ कर रही थी..
माधव का मन किया उसे आवाज़ लगा दे लेकिन वो इस वक्त अपने आसपास फैली इस पवित्र शांति को अपने अंदर महसूस करना चाहता था..
वो इस शांति से अपने अंदर ऊर्जा भर रहा था, और इसलिए इसे महसूस करता बैठा रहा..
कुछ देर में चहकती हुई डिंकी बाहर चली आई..
“सुनिए.. आपको खाना खिला दूँ ?”
“अभी तो इतना कुछ खाया है, अब कुछ नहीं खाऊंगा !”
“ऐसे कैसे कुछ नहीं खाएंगे ?”अपने साथ वो एक तश्तरी में कटे हुए खरबूज लायी थी, उसने फल माधव के सामने रख दिए !
“अरे भाई मैं इतना ज़्यादा नहीं खाता !”
“तभी तो ऐसे कमजोर से हो गए हैं.. आपको मालूम भी है आपका कितना वजन गिर गया है ?”
उलाहना सा देते हुए डिंकी ने कहा लेकिन उसकी ये बात माधव के स्वप्न महल को धराशायी कर गयी..
वो सच ही तो कह रही थी, इधर दो चार महीनो में ही उसके दिमाग की गांठ ने उसके शरीर को निगलना शुरू कर दिया था..
वो पहले से दुबला दिखने लगा था..!
माधव को सोच में डूबा देख डिंकी ने तुरंत अपनी बात संभाल ली…
“शादी की कुछ ज़्यादा ही टेंशन ले ली क्या आपने ? सुनिए आपके लिए मैंने पराठे सेंक कर रख दिए हैं, छोटे वाले डिब्बे में भिंडी की सब्जी भी है, आपको जब भूख लगे तब आप खा लीजियेगा.. ठीक है ?”
माधव ने हाँ में गर्दन हिला दी..
“देर हो रही, अब मैं जाती हूँ !”
वो मुस्कुरा कर जाने को थी कि माधव ने उसका हाथ पकड़ लिया..
वो मुड़ी और माधव के सीने से लग गयी…
क्रमशः

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Kash ki madhav thik ho jaye kyunki dinki usse duri ab bardast nahi kar payegi 😓😓
Nice
👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻
कितना प्रेम व अपनापन है दोनों के बीच
मुझे नहीं लगता कि ये बीमारी भी दोनों को अलग कर पाएगी
ऐसा लगा ही नहीं कि डिंपी को माधव की बीमारी का पता चलने पर कोई फर्क़ प़डा है ब्लकि अब तो उनका प्रेम और गहरा गया है 💞💞💞💞💞💞💓💓💓💓💓💓💓😍😍😍😍😍😍😍😍😍😍😍
Madhav ki bimari ka pata Dinki ko lag jani chiye
🤗👍 nice part.
Aap kahin aur b likhti h kya?? Actually google pr baut ads aane lge h ab nd in ads m half story to chip hi jaati h
जल्दी ही ये प्रॉब्लम solve हो जाएगी
कौन कहता है उम्र के साथ तजुर्बा, समझ बढ़ती है अभी ही देख लो एक बस 19-20 साल की लड़की ने कैसे प्रेम से अपने होने वाले पति की बीमारी में सेवा की और दूसरी तरफ योगिता एक 15-16 साल उम्र की बेटी की माँ होकर भी कैसे अपना घर बर्बाद कर रही और इतना कुछ गलत करने के बाद भी अपनी गलती उसे नजर ही नहीं आ रही। दीपक अपनी जगह सही है ये रिश्ता जो दो अजनबी लोगों को विश्वास की डोर से एक दूसरे से बाँधता है अगर वही डोर टूट जाए तो रिश्ते की तो अहमियत ही ख़त्म हो गई। मैंने अक्सर देखा है एक औरत अपने आप को खत्म कर देती है रिश्तों को निभाते, बचाते पर यहाँ तो योगिता जैसे लोग भी है दुनिया में..। अजब गजब दुनिया है 😊।
लाजवाब भाग 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻🙏🏻।
👌👌👌👌👌👌👏👏👏👏👏