
जीवनसाथी -3 भाग -150
सबसे पहले तो मेरे जीवनसाथी के पाठकों को डेढ़ सौ भाग पूरे होने की बहुत-बहुत शुभकामनाएं!
जीवनसाथी एक में जहां 103 भाग थे, दो में शायद 112 भाग और अब जीवन साथी तीन 150 वे भाग तक पहुंच चुका है!
अब भी ऐसा नहीं लग रहा कि कहानी खत्म होने वाली है।
पता नहीं जीवनसाथी कहानी कौन सा अमृत पीकर आई है कि खत्म होने का नाम ही नहीं लेती और आप पाठकों के धैर्य की भी दाद देनी पड़ेगी कि आप आज भी उतनी ही उत्सुकता से राजा साहब, बांसुरी और वासुकी का इंतजार कर रहे हैं।
आप सबके प्रेम के कारण ही यह कहानी लिखना संभव हो सका है। और आपके विश्वास के भरोसे ही इसे लिख रही हूं….।
आइये अब कहानी पर चलते हैं…
*****
दर्श के नीचे पहुंचने तक में सारिका दरवाजे पर पहुंच चुकी थी। उसने दरवाजा खोला और कली के साथ खड़ी बांसुरी को अपलक देखती रह गई। उसे समझ नहीं आया कि रानी बांसुरी उनके घर के सामने क्या कर रही है..?
थोड़ी देर के लिए तो वह बांसुरी को पहचान नहीं पाई। लगभग बीस साल पहले उसने इस चेहरे को देखा था, और महीनों तक वह बांसुरी के साथ रही थी।
बांसुरी के साथ रहकर उसका तन ही नहीं मन भी धुल पुंछ कर कांच की तरह साफ हो गया था। बांसुरी और वासुकी यह दो नाम उसके जीवन में ऐसे थे, जिन्होंने उसकी जिंदगी को कलुषता से बाहर निकाला था।
और दर्श ने उसका हाथ पकड़ कर उसे स्वर्ग के सिंहासन पर बैठा दिया था।
जब वासुकी उसे गांव से निकाल कर अपने साथ ले गया था, उस समय वह जानती भी नहीं थी कि उसका आगे का जीवन इतना सुखद इतना सुकोमल हो जाएगा। जब बांसुरी उस घर में रहने आई, तब पहले पहल सारिका उसके बारे में कुछ भी नहीं जानती थी। उसने ना कभी वासुकी से कुछ पूछा और ना वासुकी ने उसे कुछ बताया। सारिका बस इतना जानती थी कि उसे बांसुरी की सेवा करनी है।
बांसुरी की हर जरूरत का ध्यान रखना है। बांसुरी के चेहरे पर कभी शिकन नहीं आनी चाहिए, और बस इस बात का ख्याल रखते रखते वह कब बांसुरी के हाव भाव उसके बर्ताव, उसके स्वभाव में स्वयं भी घुलती चली गई उसे ही मालूम नहीं चला।
बांसुरी के आने के पहले वासुकी के घर में कोई मंदिर नहीं था।
बांसुरी ने एक छोटे से कान्हा जी बैठा कर पूजा करनी शुरू की थी, और आज वही जगह एक पवित्र मंदिर बन गई थी।
वासुकी आज भी भले ही भगवान के सामने हाथ नहीं जोड़ता था, लेकिन बांसुरी के जाने के बाद से आज तक कोई ऐसा दिन नहीं गया जब वह सीढियों पर से उतर कर उस मंदिर के सामने पल भर ठहरता ना हो।
पल भर के लिए कान्हा जी को देखकर वह घर से निकल जाता, जैसे कह कर जा रहा हो कि मैं लौट कर आऊंगा, मेरे घर का ख्याल रखना।
वापस लौटने के बाद भी वह एक बार वहां ठहरता जरूर है। जैसे उन्हें बता रहा हो कि मैं लौट के आ गया हूं।
बांसुरी ने वासुकी के महल को छूकर चंदन का महल कर दिया था, और आज वही चमत्कारी परी उसके सामने खड़ी थी, जिसने उसके जीवन को भी पवित्र कर दिया था।
सारिका की आंखों में आंसू झिलमिलाने लगे।
उसने दोनों हाथ जोड़ दिए…।
बांसुरी पहले तो सारिका को देखती रह गई।
याददाश्त पर बहुत जोर देने पर भी यह चेहरा उसे याद नहीं आ रहा था।
या शायद उस वक्त जब बांसुरी, सारिका के साथ थी, तब उसके दिल दिमाग पर छोटी सी कली इस कदर छाई हुई थी कि उसने कभी किसी और चीज पर ध्यान ही नहीं दिया।
उसके दिल दिमाग पर तो उसके राजा साहब और छोटा सा शौर्य ही छाये रहते थे। उन दोनों से दूर रहते हुए उसने अपने आप को जैसे सजा दी थी, ऐसे शायद ही कोई दे सकता था।
लेकिन नन्ही सी कली को पालने में उसने अपना हर पल इस कदर लगा दिया था कि बाकी दुनिया से वह कट कर रह गई थी।
फिर भी सारिका को देखकर उसे महसूस हो रहा था कि वह कहीं तो, कभी तो, इस चेहरे से मिल चुकी है। वह कुछ देर तक सारिका को देखती रह गई। सारिका के जुड़े हुए हाथों को उसने अपने हाथों में थाम लिया।
” हम इतने भी बुजुर्ग नहीं है कि आप इस तरह नमस्ते करें..।”
“रानी साहिबा आपने मुझे पहचाना..? कांपती सी आवाज़ में सारिका ने पूछा..
भावुकता में लिपटी सारिका बांसुरी के चरणों पर गिर गई। बांसुरी झुक कर उसे उठाने लगी…
सारिका को काँधे से पकड़ कर बांसुरी ने खड़ा कर दिया।
सारिका की आंखों से बहते आंसू देख बांसुरी आश्चर्य में थी। उसने कली की तरफ देखा ।
कली खुद उन दोनों को बड़े आश्चर्य से देख रही थी। उसने आज तक सारिका को हमेशा सिर्फ हंसते मुस्कुराते ही देखा था ।
सारिका कली पर जान लुटाती थी। मजाल कली कुछ कह दे और सारिका ना करे।
और सारिका को तंग करने में कली को बड़ा मजा आता था..।
कली को मनाने में सारिका मिन्नतें करती रह जाती थी, पर हद से ज्यादा तंग करने के बावजूद कली आज तक सारिका की आंखों में आंसू नहीं देख पाई थी, और आज बांसुरी को देखकर सारिका की आंखें आषाढ़ सावन सी बरस रही थी।
कली अपने आसपास किसी को रोते नहीं देख सकती थी। सारिका की आंखों के आंसू उसकी आंखों से भी बरसने लगे। बांसुरी ने अचरज से कली को देखा।
” तुम क्यों रोने लगी?”
” क्योंकि मेरी सरू रो रही है।”
” हां तो वह हम दोनों मिलकर पता कर लेंगे कि तुम्हारी सरू क्यों रो रही है?”
माफ कीजिएगा लेकिन मैं आपको पहचान नहीं पा रही हूं।”
यह कहते-कहते ही बांसुरी का दिमाग तेजी से चलने लगा। उसे यह भोली निश्चल आंखें याद आने लगी। उसे वह सब याद आ गया, जिसे वह अपनी भाग दौड़ भरी जिंदगी में भूल चुकी थी।
अनिरुकी वासुकी का बंगला, उसे बंगले की अटारी पर बना कृष्ण मंदिर, और उसके साथ परछाई की तरह रहने वाली वह दुबली पतली सी किशोरी, जिसे कभी हाथ पकड़ कर उसके अंधेरे कोनो से बांसुरी निकाल कर सूरज की रोशनी में ले आई थी।
बांसुरी आश्चर्य से आंखें फाड़े सारिका को देख रही थी। उसने सारिका के कंधे पकड़ लिए।
” सारिका तुम सारिका हो ना सरू ?”
सारिका ने धीरे से गार्दन हां में हिला दी। उसका चेहरा मुस्कुरा रहा था लेकिन आंखें रो रही थी…।
उसका दिल मुस्कुरा रहा था, खुशी से पेंगे भर रहा था। लेकिन आंखें थी कि बरसती चली जा रही थी। बांसुरी ने आगे बढ़कर सारिका को जोर से गले से लगा लिया।
” मैंने तो सोचा भी नहीं था कि तुमसे यहां ऐसी मुलाकात होगी। तुम यहां कब चली आई सारिका? तुम तो देहरादून में थी ना?
उस घर का क्या हुआ?
और सुनो वह बच्ची जो वहां थी,”
कहते-कहते बांसुरी का दिमाग अजीब सी उलझन में घिरता जा रहा था।
बांसुरी के साथ अक्सर ऐसा होता था कि जब उसके साथ कुछ भी ऐसा घटित हो जो सामान्य से जरा हटकर हो, तो उसे तुरंत अपने साहब की याद आने लगती थी। उसे लगने लगता था कि इस वक्त साहब को उसके साथ होना था, और उसकी जिंदगी की सबसे कड़वी सच्चाई यही थी कि ऐसे अवसरों पर उसके साहब उसके साथ कभी नहीं होते थे।
वह राजा को फोन करने के लिए लालायित हो उठी।
” रुको मैं अभी इन्हें फोन करके बताती हूं कि तुम यहां हो। मैं उन्हें भी बुला लूंगी।
सारिका मुझे बताओ ना, वह बच्ची कहां गई? वह तो बड़ी हो गई होगी ना? स्कूल जाने लगी है क्या?”
बांसुरी के आश्चर्य का ठिकाना नहीं था।
कली जो एक तरफ खड़ी बांसुरी और सारिका का मिलन देख रही थी, सोच में डूब गई थी कि बांसुरी किस बच्चे के बारे में बात कर रही है ?
सारिका अब तक अपनी भावनाओं से उबर नहीं पाई थी।
उसके सामने उसकी देवी खड़ी थी। उसके मन मंदिर में एक वासुकी और दूसरी बांसुरी की ही तो मूर्ति बैठा रखी थी उसने।
एक उसका देवता था, जो भाई बन कर उसके प्राणों को उबारने आया था और दूसरी देवी थी, जिसने उसके प्राणों को ऑक्सीजन देकर हरा भरा कर दिया था… ।
वह अभी कुछ भी कहने, बोलने बताने की स्थिति में नहीं आ पाई थी।
और बांसुरी लगातार उससे सवाल किये जा रही थी।
उसी वक्त दर्श सीढ़ियां उतरकर उन दोनों के सामने चला आया ।
“आपका स्वागत है हर हाईनेस!”
क्रमशः
जीवनसाथी -3 भाग -150
सबसे पहले तो मेरे जीवनसाथी के पाठकों को डेढ़ सौ भाग पूरे होने की बहुत-बहुत शुभकामनाएं!
जीवनसाथी एक में जहां 103 भाग थे, दो में शायद 112 भाग और अब जीवन साथी तीन 150 वे भाग तक पहुंच चुका है!
अब भी ऐसा नहीं लग रहा कि कहानी खत्म होने वाली है।
पता नहीं जीवनसाथी कहानी कौन सा अमृत पीकर आई है कि खत्म होने का नाम ही नहीं लेती और आप पाठकों के धैर्य की भी दाद देनी पड़ेगी कि आप आज भी उतनी ही उत्सुकता से राजा साहब, बांसुरी और वासुकी का इंतजार कर रहे हैं।
आप सबके प्रेम के कारण ही यह कहानी लिखना संभव हो सका है। और आपके विश्वास के भरोसे ही इसे लिख रही हूं….।
आइये अब कहानी पर चलते हैं…
*****
दर्श के नीचे पहुंचने तक में सारिका दरवाजे पर पहुंच चुकी थी। उसने दरवाजा खोला और कली के साथ खड़ी बांसुरी को अपलक देखती रह गई। उसे समझ नहीं आया कि रानी बांसुरी उनके घर के सामने क्या कर रही है..?
थोड़ी देर के लिए तो वह बांसुरी को पहचान नहीं पाई। लगभग बीस साल पहले उसने इस चेहरे को देखा था, और महीनों तक वह बांसुरी के साथ रही थी।
बांसुरी के साथ रहकर उसका तन ही नहीं मन भी धुल पुंछ कर कांच की तरह साफ हो गया था। बांसुरी और वासुकी यह दो नाम उसके जीवन में ऐसे थे, जिन्होंने उसकी जिंदगी को कलुषता से बाहर निकाला था।
और दर्श ने उसका हाथ पकड़ कर उसे स्वर्ग के सिंहासन पर बैठा दिया था।
जब वासुकी उसे गांव से निकाल कर अपने साथ ले गया था, उस समय वह जानती भी नहीं थी कि उसका आगे का जीवन इतना सुखद इतना सुकोमल हो जाएगा। जब बांसुरी उस घर में रहने आई, तब पहले पहल सारिका उसके बारे में कुछ भी नहीं जानती थी। उसने ना कभी वासुकी से कुछ पूछा और ना वासुकी ने उसे कुछ बताया। सारिका बस इतना जानती थी कि उसे बांसुरी की सेवा करनी है।
बांसुरी की हर जरूरत का ध्यान रखना है। बांसुरी के चेहरे पर कभी शिकन नहीं आनी चाहिए, और बस इस बात का ख्याल रखते रखते वह कब बांसुरी के हाव भाव उसके बर्ताव, उसके स्वभाव में स्वयं भी घुलती चली गई उसे ही मालूम नहीं चला।
बांसुरी के आने के पहले वासुकी के घर में कोई मंदिर नहीं था।
बांसुरी ने एक छोटे से कान्हा जी बैठा कर पूजा करनी शुरू की थी, और आज वही जगह एक पवित्र मंदिर बन गई थी।
वासुकी आज भी भले ही भगवान के सामने हाथ नहीं जोड़ता था, लेकिन बांसुरी के जाने के बाद से आज तक कोई ऐसा दिन नहीं गया जब वह सीढियों पर से उतर कर उस मंदिर के सामने पल भर ठहरता ना हो।
पल भर के लिए कान्हा जी को देखकर वह घर से निकल जाता, जैसे कह कर जा रहा हो कि मैं लौट कर आऊंगा, मेरे घर का ख्याल रखना।
वापस लौटने के बाद भी वह एक बार वहां ठहरता जरूर है। जैसे उन्हें बता रहा हो कि मैं लौट के आ गया हूं।
बांसुरी ने वासुकी के महल को छूकर चंदन का महल कर दिया था, और आज वही चमत्कारी परी उसके सामने खड़ी थी, जिसने उसके जीवन को भी पवित्र कर दिया था।
सारिका की आंखों में आंसू झिलमिलाने लगे।
उसने दोनों हाथ जोड़ दिए…।
बांसुरी पहले तो सारिका को देखती रह गई।
याददाश्त पर बहुत जोर देने पर भी यह चेहरा उसे याद नहीं आ रहा था।
या शायद उस वक्त जब बांसुरी, सारिका के साथ थी, तब उसके दिल दिमाग पर छोटी सी कली इस कदर छाई हुई थी कि उसने कभी किसी और चीज पर ध्यान ही नहीं दिया।
उसके दिल दिमाग पर तो उसके राजा साहब और छोटा सा शौर्य ही छाये रहते थे। उन दोनों से दूर रहते हुए उसने अपने आप को जैसे सजा दी थी, ऐसे शायद ही कोई दे सकता था।
लेकिन नन्ही सी कली को पालने में उसने अपना हर पल इस कदर लगा दिया था कि बाकी दुनिया से वह कट कर रह गई थी।
फिर भी सारिका को देखकर उसे महसूस हो रहा था कि वह कहीं तो, कभी तो, इस चेहरे से मिल चुकी है। वह कुछ देर तक सारिका को देखती रह गई। सारिका के जुड़े हुए हाथों को उसने अपने हाथों में थाम लिया।
” हम इतने भी बुजुर्ग नहीं है कि आप इस तरह नमस्ते करें..।”
“रानी साहिबा आपने मुझे पहचाना..? कांपती सी आवाज़ में सारिका ने पूछा..
भावुकता में लिपटी सारिका बांसुरी के चरणों पर गिर गई। बांसुरी झुक कर उसे उठाने लगी…
सारिका को काँधे से पकड़ कर बांसुरी ने खड़ा कर दिया।
सारिका की आंखों से बहते आंसू देख बांसुरी आश्चर्य में थी। उसने कली की तरफ देखा ।
कली खुद उन दोनों को बड़े आश्चर्य से देख रही थी। उसने आज तक सारिका को हमेशा सिर्फ हंसते मुस्कुराते ही देखा था ।
सारिका कली पर जान लुटाती थी। मजाल कली कुछ कह दे और सारिका ना करे।
और सारिका को तंग करने में कली को बड़ा मजा आता था..।
कली को मनाने में सारिका मिन्नतें करती रह जाती थी, पर हद से ज्यादा तंग करने के बावजूद कली आज तक सारिका की आंखों में आंसू नहीं देख पाई थी, और आज बांसुरी को देखकर सारिका की आंखें आषाढ़ सावन सी बरस रही थी।
कली अपने आसपास किसी को रोते नहीं देख सकती थी। सारिका की आंखों के आंसू उसकी आंखों से भी बरसने लगे। बांसुरी ने अचरज से कली को देखा।
” तुम क्यों रोने लगी?”
” क्योंकि मेरी सरू रो रही है।”
” हां तो वह हम दोनों मिलकर पता कर लेंगे कि तुम्हारी सरू क्यों रो रही है?”
माफ कीजिएगा लेकिन मैं आपको पहचान नहीं पा रही हूं।”
यह कहते-कहते ही बांसुरी का दिमाग तेजी से चलने लगा। उसे यह भोली निश्चल आंखें याद आने लगी। उसे वह सब याद आ गया, जिसे वह अपनी भाग दौड़ भरी जिंदगी में भूल चुकी थी।
अनिरुकी वासुकी का बंगला, उसे बंगले की अटारी पर बना कृष्ण मंदिर, और उसके साथ परछाई की तरह रहने वाली वह दुबली पतली सी किशोरी, जिसे कभी हाथ पकड़ कर उसके अंधेरे कोनो से बांसुरी निकाल कर सूरज की रोशनी में ले आई थी।
बांसुरी आश्चर्य से आंखें फाड़े सारिका को देख रही थी। उसने सारिका के कंधे पकड़ लिए।
” सारिका तुम सारिका हो ना सरू ?”
सारिका ने धीरे से गार्दन हां में हिला दी। उसका चेहरा मुस्कुरा रहा था लेकिन आंखें रो रही थी…।
उसका दिल मुस्कुरा रहा था, खुशी से पेंगे भर रहा था। लेकिन आंखें थी कि बरसती चली जा रही थी। बांसुरी ने आगे बढ़कर सारिका को जोर से गले से लगा लिया।
” मैंने तो सोचा भी नहीं था कि तुमसे यहां ऐसी मुलाकात होगी। तुम यहां कब चली आई सारिका? तुम तो देहरादून में थी ना?
उस घर का क्या हुआ?
और सुनो वह बच्ची जो वहां थी,”
कहते-कहते बांसुरी का दिमाग अजीब सी उलझन में घिरता जा रहा था।
बांसुरी के साथ अक्सर ऐसा होता था कि जब उसके साथ कुछ भी ऐसा घटित हो जो सामान्य से जरा हटकर हो, तो उसे तुरंत अपने साहब की याद आने लगती थी। उसे लगने लगता था कि इस वक्त साहब को उसके साथ होना था, और उसकी जिंदगी की सबसे कड़वी सच्चाई यही थी कि ऐसे अवसरों पर उसके साहब उसके साथ कभी नहीं होते थे।
वह राजा को फोन करने के लिए लालायित हो उठी।
” रुको मैं अभी इन्हें फोन करके बताती हूं कि तुम यहां हो। मैं उन्हें भी बुला लूंगी।
सारिका मुझे बताओ ना, वह बच्ची कहां गई? वह तो बड़ी हो गई होगी ना? स्कूल जाने लगी है क्या?”
बांसुरी के आश्चर्य का ठिकाना नहीं था।
कली जो एक तरफ खड़ी बांसुरी और सारिका का मिलन देख रही थी, सोच में डूब गई थी कि बांसुरी किस बच्चे के बारे में बात कर रही है ?
सारिका अब तक अपनी भावनाओं से उबर नहीं पाई थी।
उसके सामने उसकी देवी खड़ी थी। उसके मन मंदिर में एक वासुकी और दूसरी बांसुरी की ही तो मूर्ति बैठा रखी थी उसने।
एक उसका देवता था, जो भाई बन कर उसके प्राणों को उबारने आया था और दूसरी देवी थी, जिसने उसके प्राणों को ऑक्सीजन देकर हरा भरा कर दिया था… ।
वह अभी कुछ भी कहने, बोलने बताने की स्थिति में नहीं आ पाई थी।
और बांसुरी लगातार उससे सवाल किये जा रही थी।
उसी वक्त दर्श सीढ़ियां उतरकर उन दोनों के सामने चला आया ।
“आपका स्वागत है हर हाईनेस!”
क्रमशः

Very nice part 👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻
💫💫💫💫💫💫💫💫💫💫💫💫
Mind blowing 👌👌
Wow superb episode
Very nice part
सबसे पहले तो जीवनसाथी के 150 भाग तक पहुंचने की बहुत बहुत बधाइयाँ आपको💐💐ऐसे ही खूब आगे बढ़ते जाओ आप 🙌🏻🙌🏻।ये अमृत का प्याला हमेशा भरा रहे और आप बस लिखती जाओ और हम पढ़ते जाए 😊।
आज का भाग वाकई बहुत इमोशनल था, सारिका और बांसुरी का मिलन ओहो बस रुला ही गया कसम से। ये सच है जीवन में कुछ बहुत कम लोग ऐसे होते है जिन्हे हम सच में भगवान की तरह पूजते है ऐसा ही आज सारिका के लिए लगा।
आज सारिका के सामने उसके भगवान ख़डी थी तो कैसे वो खुद को संभाल पाती लाजवाब… डॉक्टरनी… कसम से वो पल 🙏🏻कमाल, बेमिसाल लिखा आपने 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻🙏🏻।
Ab to Bansuri ko pata chal jayega ki kali uski bachpan ki kali hai
Nice…pls part jaldi de ab sabra nai hota
Sach aparna ji lag raha hai jaise ye sab bina ruke chalta rahe .jab tak hame tripti na ho jaye lekin aapki kahani aur khas kar jivan sathi me yah sab sambhav hi nahi hai .aur kaha ja kar roki hai kahani aapne ?? Ab jaldi agla bhag de dijiye Jaan nikal rahi hai ,bina padhe🙏
इन दिनों व्यस्त रहने के कारण आज यह पढ़ पाई… पर उस बात का दुख हुआ की क्यूँ इतना व्यस्त थी खैर मजा आ गया पढ़ कर औऱ फिर हम लोगो की सुविधा के लिए दो बार आपने पार्ट पोस्ट किया बहुत बहुत धन्यवाद… कहानी का तो कहना ही क्या आज भी ताज़ा लगती है आज जो यादो का मौसम सरु औऱ बासुरी के बीच है बहुत ही स्पेशल होगा अपने अकेलेपन के साथी से मिलना बहुत स्पेशल होता है मैडम प्लीज इन दोनों की खूब साड़ी यादे शेयर करवाना